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कट्टरता के आगे समर्पण

Fri, 08 Dec 2017 09:27 AM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Fri, 08 Dec 2017 09:27 AM IST
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 bowed down to radicalism
पाकिस्तान के फैजाबाद में धरना

पाकिस्तान के सत्तर वर्ष के इतिहास में कभी भी सरकार ने कट्टरपंथी और एक दक्षिणपंथी इस्लामिक पार्टी की असहिष्णुता के आगे सिर नहीं झुकाया, जैसा कि हाल ही में रावलपिंडी और इस्लामाबाद के बीच एक्सप्रेसवे पर फैजाबाद के चौराहे पर देखा गया। आत्मसमर्पण का यह कृत्य कभी नहीं देखा गया, मुल्लाओं ने मुल्क के हर कानून को तोड़ा और उनके भड़काऊ भाषण ने हर किसी को डरा दिया। उन्होंने किसी को नहीं बख्शा, यहां तक कि अब्दुल सत्तार ईदी को भी नहीं, जो पाकिस्तान के परोपकारी, तपस्वी और मानवतावादी चेहरा थे। उन्होंने उन्हें गैर-मुस्लिम करार दिया।


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इस्लामाबाद हाई कोर्ट इतनी नाराज है कि उसने घोषित कर दिया है कि तहरीक-ए लब्बेक या रसूल अल्लाह (टीएलवाईआर) का धरना 'मुल्क विरोधी गतिविधि' और 'आतंकवादी घटना' है। इसकी पृष्ठभूमि में निर्वाचन सुधार विधेयक, 2017 है, जिसे नेशनल एसेंबली ने पारित किया है। यह सांसदों के संसद सदस्य के रूप में शपथ लेने से संबंधित है। शपथ में एक अनुच्छेद है, जो पैगंबर मोहम्मद के अस्तित्व पर यकीन से संबंधित है। हाल ही में सरकार ने शपथ को सरल बनाने के लिए इसे संशोधित किया था, पैगंबर के अस्तित्व से संबंधित शब्द अब भी हैं, मगर उसकी भाषा बदल गई है। अनपढ़ कट्टरपंथियों की शिकायत है कि सरकार ने शपथ को इस तरह से संशोधित किया है, जिससे लगता है कि पैगंबर अब नहीं हैं। वे इसलिए विरोध कर रहे थे कि यह ईशनिंदा के समान है और वे चाहते थे कि कानून मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए। सरकार ने स्पष्ट किया कि पैगंबर मोहम्मद के अंतिम पैगंबर होने पर यकीन से संबंधित प्रावधान अब भी संविधान का हिस्सा है।

सरकार ने टीएलवाईआर के धरने को गंभीरता से नहीं लिया, जिसने रावलपिंडी और इस्लामाबाद की सड़क को एक महीने तक बाधित रखा। प्रदर्शनकारी बड़े पैमाने पर हथियारों से लैस थे और उनके स्वयं स्थापित तंबुओं के नगर में उनके अपने जेनरेटर थे। समर्थकों द्वारा रोज भोजन की आपूर्ति की जाती थी। अंत में जब सारी वार्ताएं विफल हो गईं, तो सरकार ने इलाके को खाली कराने के लिए पुलिस और फ्रंटियर कांस्टेबलरी का इस्तेमाल किया, लेकिन यह पूरी तरह विफल रहा। टीएलवाईआर के मुल्लाओं ने प्रशिक्षित कमांडो सेना की तरह पलटवार किया और जब पुलिस ने देखा कि मुल्ला पवित्र कुरान का पाठ कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि वे उन पर हमला नहीं कर सकते। शीघ्र ही यह विरोध प्रदर्शन पाकिस्तान के सभी नगरों और शहरों में फैल गया।

मात्र दो हजार प्रदर्शनकारियों को हटाने में बुरी तरह विफल रहने के बाद सरकार ने सेना बुलाई। पर सेना ने कार्रवाई करने से मना कर दिया, क्योंकि अगर वह कार्रवाई करती, तो सैकड़ों लोग मारे जाते। नतीजतन कानून मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और सेना ने हस्तक्षेप किया। सरकार को एक हास्यास्पद समझौते पर हस्ताक्षर करना पड़ा, जिसमें यह गारंटी दी गई कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सारे आरोप हटा दिए गए।

वास्तव में मुल्क में गुस्सा इसको लेकर है कि एक मेजर जनरल ने, जो रेंजरों का डायरेक्टर जनरल है, प्रदर्शनकारियों को एक-एक हजार रुपये उनके यात्रा खर्च के लिए दिए और उनसे बार-बार कहा कि सेना उनके साथ है। हाई कोर्ट ने सरकार के साथ सेना को भी फटकार लगाई कि धरना खत्म करवाने के लिए सेना को मध्यस्थता की भूमिका दी गई। न्यायमूर्ति शौकत अजीज सिद्दीकी ने कहा कि सेना प्रमुख मुख्य कार्यकारी के आदेश का पालन करने के बजाय मध्यस्थ बन गए। उन्होंने पूछा कि कौन ऐसी सेना है, जो मध्यस्थ बनती है? कौन-सा ऐसा कानून है, जो मेजर जनरल को मध्यस्थ की भूमिका सौंपता है? उन्होंने आगे कहा कि मुल्क की कार्यपालिका का हिस्सा होने के कारण सशस्त्र बल मुल्क के संगठित कानून के आधार पर सौंपे गए जनादेश से परे नहीं जा सकता।

राजनीतिक विश्लेषक रसूल बक्श रईस कहते हैं कि 'यह पहली बार नहीं है, जब सरकार ने धार्मिक समूहों की मांगों के आगे घुटने टेक दिए हैं। यह बार-बार दोहराई जाने वाली कहानी है। अगर लोकप्रियता के पैमाने पर देखें, तो धार्मिक पार्टियों के पास व्यापक जन समर्थन नहीं है, पर उनके पास लाठियां और बंदूकें हैं। नफरत फैलाने वाले भाषण और फतवा जारी करने की शक्ति उनके विरोधियों की जान जोखिम में डालती है।'

कोई भी राजनीतिक पार्टी धार्मिक कट्टरता के खिलाफ आवाज नहीं उठाती, वे डरे हुए हैं कि किसी भी तरह के विरोध को धार्मिक समूहों के अनुयायियों द्वारा ईशनिंदा के रूप में देखा जाएगा। मुल्ला कोई आज मजबूत नहीं हुए हैं, बल्कि धीरे-धीरे उन्होंने फतवों के जरिये लोगों को गुमराह किया है। वर्ष 1953 में पाकिस्तान ने अहमदिया-विरोधी दंगा देखा और बाद में सत्तर के दशक में जुल्फीकार अली भुट्टो ने दक्षिणपंथियों मुल्लाओं को खुश करने के लिए अहमदियों को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया। बाद में सैन्य तानाशाह जिया उल हक ने भी अपना हाथ मजबूत करने के लिए इस्लामिक समूहों का इस्तेमाल किया। परवेज मुशर्रफ भी अपने विरोधियों के खिलाफ मुल्लाओं का इस्तेमाल करने से नहीं बच सके। इस समय तो मुशर्रफ कई कदम और आगे निकल गए, जब उन्होंने कहा कि वह लश्कर-ए तैयबा के सबसे बड़े समर्थक हैं। हालांकि अभी उनके पूर्व संस्थान सेना की तरफ से कोई बयान नहीं आया है और आम चुनाव में अब कुछ ही महीने शेष रह गए हैं। ऐसे में इस पूर्व सैन्य प्रमुख ने कहा है कि वह विवादास्पद आतंकी समूह जमात उद दावा और उसके प्रमुख हाफिज सईद के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाने के लिए तैयार हैं।

टीएलवाईआर जैसे बरेलवी संगठनों की शुरुआत कुछ वर्ष पूर्व हुई, जब सरकार ने मुमताज कादरी को फांसी दी। मुमताज कादरी ने पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को गोली मार दी थी। अब यह पाकिस्तानी मतदाताओं पर है कि वे यह सुनिश्चित करें कि ये कट्टरपंथी अगले चुनाव में एक भी सीट न जीत पाएं।

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