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इंडिया इन लव

Sat, 25 Oct 2014 07:36 PM IST
ओम गुप्ता
ओम गुप्ता Updated Sat, 25 Oct 2014 07:36 PM IST
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book review of 'love in india'

सेक्स कोई अपराध नहीं है। लेकिन सेक्स शब्द सुनते ही लोग चौंकन्ने हो जाते हैं। किशोर मन कल्पना के घोड़े दौड़ाने लगता है। इसका खुलापन निषिद्ध माना जाता है।

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महिलाओं की मौजूदगी में इसका जिक्र शिष्टाचार के विरुद्ध है। यह बात अलग है कि स्कूल कॉलेज में दाखिले के फार्म में और नौकरी के आवेदन पत्र में एक खाना आपका सेक्स भी पूछता है, लेकिन उनका आशय आपके स्त्री या पुरुष होने से है।
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हाल ही में एक किताब आई है 'लव इन इंडिया' मैरिज एंड सेक्सुएलिटी इन द ट्वेन्टी फर्स्ट सेंचुरी (भारत में प्यार-21वीं शताब्दी में विवाह और यौन संबंध)। अश्लील कहे जाने वाले विषय पर एक श्लील शोध आधारित गंभीर विवेचन। निहायत ही गंभीर पुस्तक।
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इसकी लेखिका इरा त्रिवेदी जानी-मानी अंग्रेजी उपन्यासकार हैं। उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है। 'देयर इज नो लव ऑन वॉल स्ट्रीट', ‘द ग्रेट इंडियन लव स्टोरी’, ‘वॉट वुड यू डू टू सेव द वर्ल्ड’ जैसी चर्चित कृतियां रची हैं।

इरा का प्रतिपादन है कि सेक्स एक प्रागैतिहासिक विषय है। विवाह की संस्था की आवश्यकता और उसका आधार सेक्स ही है। कृष्ण जिन्हें विष्णु का नौवां अवतार माना जाता है, वे प्रेम के प्रतीक माने जाते है।

उनका राधा से प्रेम मथुरा-वृदांवन की हर ईंट पर खुदा हुआ है। प्राचीन भारत में सेक्स एक सर्वमान्य और सम्मानित अवधारणा थी। वात्सयायन के आदिग्रंथ कामसूत्र को दुनिया ने संदर्भ ग्रंथ के रूप में अपनाया है। रिचर्ड बर्टन जैसे मशहूर सिने अभिनेता ने उसकी अंग्रेजी में व्याख्या की है।

आधुनिक भारत में प्रकाश कोठारी और सुधीर कक्कड़ जैसे दिग्गज सेक्स गुरु के रूप में स्वीकारे जाते हैं। सेक्स संबंधी प्रश्नों के उत्तर लोकप्रिय दैनिक अखबारों में बड़े चाव से पढ़े जाते हैं।

सेक्स से जुड़ा एक व्यापक संसार है। दुनिया भर में इसकी अनिवार्यता को अपरिहार्य माना गया है। कीचड़ कहे जाने वाले इस जोहड़ में हर भाषा के लेखक ने डुबकी लगाई है।

इरा त्रिवेदी का शीर्षक प्रबंध आज के भारतीय संदर्भ में विवाह और यौन संबंधों पर एक स्वस्थ दृष्टि डालता है। उन्होंने साफ शब्दों में सफलतापूर्वक स्थापित किया है कि आज सैक्स को ‘छी-छी’ कहकर नकारा नहीं जा सकता। यह भोजन की तरह एक नैसर्गिक आवश्यकता है, जो बिना खटखटाए हर लड़के-लड़की के जीवन में हौले से प्रवेश कर जाती है।

आज के इंटरनेट के युग में तो सेक्स एक बटन दबाते ही आपके सामने अलादीन के जादुई चिराग वाले जिन्न की तरह हाजिर हो जाता है और फिर यह जीवन भर पीछा नहीं छोड़ता।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, इसका बुखार उतना ही तेज हो जाता है। कुछ भाग्यशालियों को यह पहले ही प्रयास में हासिल हो जाता है। कुछ इसे बाजार से खरीदते हैं और कुछ जोर-जबरदस्ती का सहारा लेते हैं। सुबह दैनिक समाचार-पत्र बलात्कार, अवैध रिश्तों और हत्याओं की खबरों को एक ही तराजू में तोलकर बेचते हैं।

त्रिवेदी की पुस्तक चटकारेदार नहीं है। लेकिन सिर्फ इतने भर से ही इस पुस्तक का महत्व कम नहीं हो जाता। इस पुस्तक को एक अध्ययन कहना ज्यादा उचित होगा।

समलैंगिक संबंधों पर भले ही विवाद होता रहा हो, उन्होंने स्त्री-पुरुष के बीच प्राकृतिक संबंधों के साथ-साथ समलैंगिक अर्थात किसी पुरुष के दूसरे पुरुष और किसी स्त्री के अन्य स्त्री के साथ्य संबंध को भी प्राकृतिक कहा है।

लेखिका ने साफ कहा है कि जो संबंध रजामंदी से हों, उस पर काजी क्या कर सकता है। उनका निष्कर्ष है कि सेक्स के प्रति अब स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसे अंधेरे कोनों से निकालकर रोशनी में उजागर करने की जरूरत है।


उन्होंने वेश्यावृत्ति को लेकर सरकार के रवैये की खुलकर खिंचाई की है। उनका कहना है कि सरकार इसे कानूनी मान्यता भी नहीं देती और इसे देखकर आंख भी मूंद लेती है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि यह किताब मनुष्य के मनुष्य बने रहने की वकालत करती है और किसी जिंदगी की सबसे बड़ी जरूरत की व्याख्या।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया विश्लेषक और संस्कृतिकर्मी हैं।)

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