फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   BJP ignores farmers and lost

भाजपा को भारी पड़ी किसानों की उपेक्षा

Tue, 11 Dec 2018 08:42 PM IST
manisha priyam मनीषा प्रियम
Updated Tue, 11 Dec 2018 08:42 PM IST
विज्ञापन
BJP ignores farmers and lost
मनीषा प्रियम, राजनीतिक विश्लेषक
लोकसभा चुनाव के लिए सेमी फाइनल माने गए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों से स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति में नेता जनता के मुद्दों के लिए चुने जाते हैं, न कि किसी राजशाही के लिए। हिंदी पट्टी के दो प्रमुख राज्य, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में पिछले पंद्रह वर्षों से भारतीय जनता पार्टी की दो लोकप्रिय सरकारें शासन कर रही थीं। छत्तीसगढ़ में चाउर वाले बाबा की पहचान रखने वाले रमन सिंह ने अपने लंबे कार्यकाल में ठीक-ठाक काम किया, लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस की ओर से किए गए किसान हितैषी वायदों के आगे उनकी एक न चली। जिस राज्य के बारे में माना जाता था कि बहुत कम अंतर से जीत-हार तय होती है, वहां कांग्रेस की एकतरफा जीत वहां की जनता में बड़े बदलाव की आकांक्षाओं का प्रतिफल है, जो दर्शाता है कि लोग रमन सरकार से ऊब चुके थे।

loader


मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की अपनी सामाजिक व राजनीतिक पूंजी है। इसके अलावा सड़क व बिजली के क्षेत्र में किए गए काम, लाडली-लक्ष्मी योजना और गरीबों के लिए कैश ट्रांसफर जैसी लोकप्रिय योजनाएं उनके पक्ष में थीं। लाडली स्कीम के लिए उन्हें 'मामा' की उपाधि भी मिली। लेकिन मंदसौर समेत पूरे राज्य में पनपा किसानों का गुस्सा उनकी भावांतर भुगतान योजना से ज्यादा असरकारक रहा। हालांकि इस योजना के तहत सरकार ने किसानों का गुस्सा कम करने की कोशिश की, पर तब तक बहुत देर चुकी थी। किसानों ने न सिर्फ मध्य प्रदेश, बल्कि तीनों बड़े राज्यों में अहम भूमिका निभाई है।

राजस्थान में जाटों के समर्थन से सत्ता में आई वसुंधरा सरकार लोगों से संवाद बनाने में पूरी तरह विफल रही। कृषि व बेरोजगारी यहां भी प्रमुख मुद्दे रहे। इसके अलावा पार्टी की गुटबाजी भाजपा की हार का प्रमुख कारण रही। गुजरात विधानसभा चुनाव में भारतीय ट्राइबल पार्टी का गठन करने वाले छोटू भाई वसावा को राजस्थान में भले ही एक फीसदी के आसपास वोट मिले हों, पर उन्होंने आदिवासी बहुल इलाकों में सत्तारूढ़ दल की मुश्किलें बढ़ाने में जरूर मदद की।

राजस्थान के आंकड़ों में 'अन्य' की दमदार मौजूदगी सीधे तौर पर भाजपा का नुकसान है। बावजूद इसके राज्य में प्रधानमंत्री के चुनाव प्रचार ने यह जरूर दर्शाया है कि वह किसी भी स्थिति में पार्टी को मजबूत करने की क्षमता रखते हैं। यह मेहनत दूसरे राज्यों में क्यों नहीं दिखी, इसका जवाब भाजपा ही दे सकती है। 

तेलंगाना में कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव ने तय समय से पहले विधानसभा भंग करके जो दांव खेला था, उसमें वह सफल रहे। दरअसल टीआरएस सरकार ने अपने कार्यकाल में कई ऐसी योजनाएं चलाईं थी, जिसके आधार पर यह चुनावी जोखिम लिया जा सकता था। राज्य में बेहतर बिजली व्यवस्था, किसानों के लिए रायतु बंधु योजना, हर जिले में दस बेड वाले आईसीयू की स्थापना व शादी मुबारक योजना के जरिये बेटियों की शादी के लिए सरकारी मदद गेम चेंजर साबित हुईं।

तेलुगू देशम पार्टी के साथ कांग्रेस का गठजोड़ इसलिए भी असरदार साबित नहीं हुआ, क्योंकि इस राज्य में टीडीपी की छवि तेलंगाना विरोधी है। भाजपा के लिए तेलंगाना चुनाव एक सबक की तरह है, क्योंकि उनके स्टार प्रचारक आदित्यनाथ को वहां का मिजाज समझने में चूक हुई। उन्हें तो उत्तर प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था के लिए तेलंगाना का अनुसरण करना चाहिए। मिजोरम की सचेत जनता ने बदलाव लाकर पूरे पूर्वोत्तर को कांग्रेस मुक्त कर दिया है, जो कि इन चुनावों में कांग्रेस के लिए एकमात्र झटका है और इस पर उसे गौर करने की जरूरत है। 

एनडीए सरकार को समझना होगा कि किसानों व गरीबों की उपेक्षा करके, बिना किसी नई सोच के सिर्फ मोदी के चेहरे के सहारे बेड़ा पार नहीं होने वाला। मतदाता अपने मुद्दों के आधार पर वोट करता है, हार व जीत बाद की बात है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed