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वीरेंद्र सिंधु: भगत सिंह के मृत्युंजय पुरखों की लेखिका
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सार
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Virendra Sindhu
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सोशल मीडिया
विस्तार
वीरेंद्र सिंधु नहीं रहीं। कुलतार सिंह की बेटी और शहीद भगत सिंह की भतीजी वीरेंद्र लंदन में थीं और वहीं 22 फरवरी, 2023 को 83 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। कई वर्ष पूर्व उन्होंने एक अद्भुत पुस्तक लिखी थी- युगद्रष्ट्रा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे, जो भगत सिंह-साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृति है। उन्हीं दिनों उन्होंने सबसे पहले भगत सिंह : पत्र और दस्तावेज का संपादन करके उस शहीद के खुतूत और अदालती बयान, क्रांतिकारी दल के दस्तावेज, जिनमें स्वतंत्रता से लेकर समाजवाद तक का सफर तथा उसके लिए उसका अप्रतिम बलिदान ध्वनित होता है, हमारे हाथों में सौंपा था। एक तरह से यह वीरेंद्र का बुनियादी काम था, जो हमें निरंतर रोशनी देता रहा।
जिस समय उन्होंने अपनी पहली पुस्तक का लेखन आरंभ किया, अनेक स्थानों से सामग्री का संचयन करने में दिन-रात एक कर दिया। भगत सिंह के पत्र और दस्तावेज जुटाते समय वह 125/वैलबैक रोड, साउथ हैरो, मिडिल सेक्स, ब्रिटेन में थीं। यह 1976 की बात है। युगद्रष्ट्रा के रूप में भगत सिंह को प्रस्तुत करते समय वीरेंद्र ने अपने व्यापक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए भगत सिंह के दादा अर्जुन सिंह और दादी श्रीमती जय कौर, पिता सरदार किशन सिंह, माता विद्यावती, भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह-श्रीमती हरनाम कौर, स्वर्ण सिंह-श्रीमती हुकुम कौर सहित पूरे परिवार के जिंदगीनामे और स्वतंत्रता के लिए उनके अप्रतिम योगदान और संघर्ष का प्रामाणिक एवं दुर्लभ, लेकिन मार्मिक विवरण प्रस्तुत किया, जो किसी अन्य से संभव न था।
यहां वह भगत सिंह के संपूर्ण जीवन काल और विप्लवी संग्राम में उनकी अभूतपूर्व भागीदारी को उनके वैचारिक विकास और उष्मा के साथ रेखांकित कर सकी थीं। ऐसा करते हुए वीरेंद्र भगत सिंह को एक जन्मजात क्रांतिकारी और उनके स्वभाव, मनुष्य के रूप, दार्शनिक पक्ष, लेखक तथा मृत्यु-साधक के तौर पर विश्लेषित करते हुए उस उपसंहार तक भी जा पहुंचीं, जहां शहादत के लंबे समय बाद तक उनके कर्म और विचारों की प्रासंगिकता को भरपूर देखा व आंका जा सकता है।
इस पुस्तक की भाषा में गजब का आत्मीय संबोधन है, जो हमें भीतर तक बांधता और प्रेरित करता है। इसमें पीड़ा है, तो उससे उबर कर कर्मपथ पर चलने का अभूतपूर्व संकल्प और सरोकार भी अत्यंत सघनता से विद्यमान है। उन्होंने आदरणीय फूलचंद जैन, मिलाप भवन, सब्जी मंडी, दिल्ली का आभार व्यक्त करते हुए कहा है कि उनके पास संग्रहीत विपुल सामग्री इस पुस्तक के लेखन के लिए बहुत मददगार रही। वीरेंद्र की इस पुस्तक के जरिये ही हमें भगत सिंह और उनके पुरखों के अनवरत संघर्ष की दबी-छिपी इबारत को समझने में मदद मिली, जो अन्यत्र संभव ही न थी और उनके इस प्रारंभिक कार्य के प्रति हम हरदम कृतज्ञ बने रहे।
उन्होंने भगत सिंह की मां विद्यावती को ‘वीरता की अमर स्रोतस्विनी’ कहते हुए जिस शब्द-चित्र की रचना की, वह मार्मिक होते हुए भी असल जिंदगी के बहुत करीब है। अपनी दादी से कितना बतियाई होंगी वह, किस कदर देखा-निहारा होगा उनका चेहरा और कितना प्यार किया तथा पाया होगा, यह उनकी कहन में बखूबी पढ़ा-सुना जा सकता है। वर्ष 1968 में अपने पति के साथ वीरेंद्र ने उनसे आशीर्वाद लेकर विदा ली, लेकिन फिर वह एक जनवरी, 1973 को उनसे मिलीं। इस बीच बहुत कुछ बदल चुका था। पंजाब सरकार ने विद्यावती को ‘पंजाब माता’ की उपाधि दी, तब वीरेंद्र सोचती रहीं कि भगत सिंह पंजाब में जन्मे-पले जरूर और क्रांति की अलख भी उन्होंने वहीं से जगाई, पर उनका लक्ष्य प्रांत के घेरे में नहीं बंधा था। लक्ष्य था समूचे भारत की स्वतंत्रता। क्या ऐसे राष्ट्रपुत्र की मां को ‘राष्ट्रमाता’ की उपाधि अधिक उपयुक्त नहीं थी? नौजवान भी भड़क उठे। भारत की माता को पंजाब की माता बना दिया। यह तो राष्ट्रीय शहीद का अपमान है।
पंजाबी के प्रसिद्ध कवि संतराम उदासी को उसी समय लिखना पड़ा, साडे वीरां नू वरंज के घरां अंदर/जिऊंदी रोलेयो न साडी आव माता/भगतसिंह दी मां बेशक बनेओ, पर हाड़े बनेओ न कोई पंजाब-माता। अर्थात, ऐ पंजाब के नौजवानों की माताओ, जब-जब देश को आवश्यकता पड़े, तब-तब हमारे भाइयों को बलिदान देने से कभी मत रोकना, उन्हें घर में रोके रखकर हमारी बेइज्जती मत करवा देना। अमर शहीद भगत सिंह की मां बनकर अपने नौजवान बेटों को फांसी का फंदा चूमने देना, लेकिन तुम्हारी मेहरबानी होगी कि उसके बाद ‘पंजाब माता’ जैसी कोई उपाधि मत स्वीकार करना।
वीरेंद्र का जन्म 1940 में हुआ था, जब पिता कुलतार सिंह आजादी के संग्राम में जेल में थे, और 1945 में जब वह बाहर आए, तभी उन्होंने पहली बार देखा कि वीरेंद्र पांच वर्ष की हो चुकी थीं। इस माहौल में पली-बढ़ी उनकी इस संतान के भीतर मुल्क के लिए जो कुछ बन-संवर रहा था, उसे हम बहुत बाद में देख पाए।
बड़ी होकर वीरेंद्र ने सचमुच अनोखा और सर्वश्रेष्ठ रचा, जो किताब की शक्ल में हमारे सामने आया और हमारी समझदारी को बढ़ाने में मददगार बना। इसके आखिरी पन्नों में उन्होंने 23 मार्च, 1968 का वह सवेरा भी देखा, जो फिरोजपुर से सात मील दूर सतलज नदी के किनारे हुसैनीवाला में शहीदों की समाधियों के पास एक क्रांतिकारी उम्मीद के साथ उगता और अपना तेज फैलाता है।