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बेहतर आबोहवा : पटाखों का कचरा भी कम घातक नहीं

Sat, 06 Nov 2021 01:37 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Sat, 06 Nov 2021 01:37 AM IST
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सार
दीपावली की आतिशबाजी ने राजधानी दिल्ली की आबोहवा को इतना जहरीला बना दिया है कि बाकायदा एक सरकारी सलाह जारी की गई थी कि यदि जरूरी न हो, तो घर से न निकलें।
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Better climate: The waste of firecrackers is no less dangerous
दिवाली की अगली सुबह दिल्ली में कुछ ऐसा रहा हाल - फोटो : पीटीआई

विस्तार

अमावस की गहरी अंधियारी रात में इंसान को बेहतर आबोहवा देने की सुप्रीम कोर्ट की उम्मीदों का दीप खुद ही इंसान ने बुझा दिया। शाम आठ बजे के बाद जैसे-जैसे रात गहरी हो रही थी, केंद्र सरकार द्वारा संचालित सिस्टम-एयर क्वालिटी ऐंड वेदर फोरकास्टिंग ऐंड रिसर्च अर्थात सफर के एप पर दिल्ली-एनसीआर का एआईक्यू (एयर क्वालिटी इंडेक्स) बदतर होता चला गया। गाजियाबाद में गैस चैंबर जैसे हालात थे, यहां पीएम 2.5 और 10 का स्तर 700 के पार था। 



कार्बन डाईऑक्साइड 400 से अधिक, पर आधी रात तक पूरी तरह प्रतिबंधित पटाखे धड़ल्ले से चलते रहे। साफ हो गया कि बीते वर्षों की तुलना में इस बार दीपावली की रात का जहर कुछ कम नहीं हुआ, कानून के भय, सामाजिक अपील, सबकुछ पर सरकार ने खूब खर्च किया, पर भारी-भरकम मेडिकल बिल देने को राजी समाज ने सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद भी समय, आवाज की कोई भी सीमा नहीं मानी। 


दुर्भाग्य यह है कि जब प्रधानमंत्री शून्य कार्बन उत्सर्जन जैसा वादा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने कर रहे हैं, तब एक कुरीति के चलते राजधानी सहित समूचे देश में वह सब कुछ हुआ, जिस पर पाबंदी है, और उस पर रोक के लिए न ही पुलिस और न ही अन्य कोई निकाय मैदान में दिखा। एनसीआर में आतिशबाजी की दुकानों की अनुमति नहीं थी। कई जगह ग्रीन आतिशबाजी की अनुमति थी, पर केवल आठ से दस बजे तक। 

परंतु न प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी निभाई और न ही पटाखेबाजों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी। अकेले दिल्ली में 300 से ज्यादा जगह आग लगने की घटनाएं हुई हैं। पूरे देश में आतिशबाजी के कारण आग की घटनाओं की संख्या हजारों में हैं। इसका आंकड़ा रखने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि कितने लेाग आतिशबाजी के धुएं से हुई घुटन के कारण अस्पताल गए। दीपावली की रात प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी व देश के लिए अनिवार्य ‘स्वच्छता अभियान’ की दुर्गति भी सड़कों पर देखी गई। 

दीपावली की आतिशबाजी ने राजधानी दिल्ली की आबोहवा को इतना जहरीला बना दिया है कि बाकायदा एक सरकारी सलाह जारी की गई थी कि यदि जरूरी न हो, तो घर से न निकलें। फेफड़ों को जहर से भरकर अस्थमा व कैंसर जैसी बीमारी देने वाले पीएम (पार्टिक्यूलर मैटर) अर्थात हवा में मौजूद छोटे कणों की निर्धारित सीमा 60 से 100 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है, जबकि दीपावली के बाद यह सीमा कई जगह एक हजार के पार चली गई। 

यही हाल अन्य महानगरों और प्रदेशों की राजधानी तथा मंझोले शहरों के भी थे। पटाखे जलाने से निकले धुएं में सल्फर डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, शीशा, आर्सेनिक, बेंजीन, अमोनिया जैसे कई जहर सांसों के जरिये शरीर में घुलते हैं। इनका कुप्रभाव पशु-पक्षियों पर भी होता है। यही नहीं, इससे उपजे करोड़ों टन कचरे का निबटान भी बड़ी समस्या है। 

यदि इसे जलाया जाए, तो भयानक वायु प्रदूषण होता है। यदि इसके कागज वाले हिस्से को रिसाइकल किया जाए, तो भी जहर घर, प्रकृति में आता है। और यदि इसे डंपिंग क्षेत्र में यूं ही पड़ा रहने दिया जाए, तो इसके विषैले कण जमीन में जज्ब होकर भूजल व जमीन को स्थायी व लाइलाज स्तर पर जहरीला कर देते हैं। सरकार और समाज, दोनों को पता था कि रात 10 बजे के बाद पटाखे चलाना अपराध है। कार्रवाई होने पर छह माह की सजा भी हो सकती है। 

यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2005 में दिया था, जो अब कानून की शक्ल ले चुका है। इसमें छह माह का कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। पुलिस विभाग में हेड कांस्टेबल से लेकर वरिष्ठतम अधिकारी को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई का अधिकार है। लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। दीपावली असल में प्रकृति पूजा का पर्व है, यह समृद्धि के आगमन और पशुधन के सम्मान का प्रतीक है। आदेशों का क्रियान्वयन करवाना है, तो अब उसे ऐसे जिले के आला अफसरों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी, जिनके यहां आतिशबाजी के धमाकों ने कानून की धज्जियां उड़ाई हैं।

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