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शर्म छोड़ने के फायदे
पूरन सरमा
Updated Wed, 02 Oct 2013 07:19 PM IST
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गांव में थे, तो कुएं पर नहाना होता था। खुले में नहाने के कारण हया, शर्म और संकोच का पर्दा दिमाग पर पड़ा रहता था। मैं धीमे-धीमे बोलता और सामने वालों से डरता था। शहर में आने पर मेरे एक मित्र ने कहा, यहां शर्म करने की जरूरत नहीं है। शर्म-हया का दामन छोड़ोगे, तभी जिंदगी में सुखी रह पाओगे। मित्र के सुझाव के बाद मैं बिंदास और मुंहफट हो गया। शर्म-हया सब जाती रही। मैं किसी से भी लड़ लेता। इतना निर्भीक हो गया कि डिप्रेशन की जो गोली लेता था, उसकी आदत भी छूट गई।
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एक दिन वही मित्र फिर आए और बोले, अब कैसा महसूस कर रहे हो? मैंने कहा, भाई, आपने तो गजब का सूत्र दिया। जीने का मजा आ गया। भय, शर्म और संकोच सब खत्म हो गया। आत्मविश्वास इतना आ गया है कि पड़ोसी तक डरने लगे हैं। मित्र बोले, अब अपना दायरा थोड़ा और बड़ा करो। सभा-संगोष्ठियों में जाना सीखो और भाषण देना शुरू करो। मैंने भाषण देना प्रारंभ किया। मैं बेतुकी बातें करता, उस पर भी तालियां बजतीं और लोग खूब हंसते। इसका सीधा-सीधा फायदा यह हुआ कि लोग मुझे कार्यक्रमों में भाषण देने के लिए बुलाने लगे। मैं कहीं अध्यक्षता करता, तो कहीं मुख्य अतिथि बन जाता।
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हौसला अफजाई इतनी हुई कि राजनेताओं में उठना-बैठना शुरू होने से मेरा जीवन राजनीति में रंगने और जमने लगा। पार्टी के युवा मोर्चे का मैं प्रदेश अध्यक्ष बन गया। पार्टी में धाक और साख जम गई। अखबारों में मेरे वक्तव्य छपने लगे। मित्र बहुत खुश हुए और एक दिन वह अपने साथ एक अन्य व्यक्ति को लेकर आ गए। आते ही बोले, अब काम की बात सुनो। यह अमुकराम जी हैं। इनका तबादला घर से बहुत दूर हो गया है। यह लो बीस हजार रुपये और मंत्री से कहकर इनका तबादला निरस्त कराओ। मैंने नोट कुर्ते की जेब में रखकर कहा, यह तो बाएं हाथ का खेल है। कल की तारीख में इनका तबादला कैंसिल हो जाएगा। दूसरे दिन मैं मंत्री जी को उनका एप्लीकेशन देकर बोला, सर, यह मेरे मिलने वाले हैं। जरा चिड़िया बैठा दो। मंत्री जी ने हंसते हुए दस्तखत किए और मैं ऑर्डर निकलवा कर घर ले आया।
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दोस्तो, जबसे मैंने शर्म-हया छोड़ी है, तबसे खुश हूं। मैं अगर इसी तरह निडर होकर पार्टी के लोगों को निपटाता रहा और विरोधियों की ऐसी-तैसी करता रहा, तो देश की जनता मुझे प्रधानमंत्री मान लेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।