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भिक्षा मांगने से अहंकार दूर
शिव कुमार गोयल
Updated Fri, 14 Jun 2013 09:17 PM IST
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एक सम्राट समय-समय पर एक विरक्त संत के सत्संग के लिए जाया करता था। संत अपने उपदेश में सदाचारी जीवन बिताने, अहंकार से दूर रहने, प्रजाजनों के दुख-दर्द में सहायता करने की प्रेरणा दिया करते थे। राजा सदाचारी था, परंतु राज्य और धन के अहंकार के कारण कई बार वह नगर के विद्वानों का अपमान कर देता था।
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संत जी को राजा के इस दुर्गुण का पता लग गया। वह चाहते थे कि सदाचारी व विवेकी राजा को अहंकार से मुक्त किया जाए, ताकि वह जाने-अनजाने कर रहे पाप कर्म करने से बच सके।
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एक दिन राजा उनके सत्संग के लिए पहुंचे। उसने कहा, महाराज, मेरे मन को पूर्ण शांति नहीं मिल पा रही है। कोई ऐसी कमी जरूर है, जो मुझे परेशान रखती है। संत जानते ही थे कि अहंकार के कारण राजा का मन अशांत रहता है।
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उन्होंने कहा, यदि मेरी बात मानने का वचन दो, तो उपाय बता देता हूं। उससे तुम्हारा एक दुर्गुण दूर हो जाएगा। राजा ने वचन दे दिया। संत ने कहा, कल से नगर में जाकर सात दिन तक विद्वानों व श्रेष्ठजनों के घर से भिक्षा मांगो। सात दिन में तुम इसका चमत्कार देखोगे। राजा ने कहा, जिन लोगों को मैं देता हूं, उनके आगे हाथ पसारना बहुत मुश्किल होगा। संत ने जवाब दिया, इसी प्रयोग से तुम दुर्गुण से मुक्त हो पाओगे।
राजा ने विद्वान पंडितों और अन्य श्रेष्ठ जनों के द्वार पर पहुंचकर भिक्षा मांगी। उनका अहंकार पूरी तरह नष्ट हो गया। उन्हें शांति की अनुभूति होने लगी।
शिवकुमार गोयल