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पस्त पटरियां, पुरानी प्रौद्योगिकी

Mon, 21 Nov 2016 08:31 PM IST
वी एन माथुर
वी एन माथुर Updated Mon, 21 Nov 2016 08:31 PM IST
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Battered Rail, old technology
वी एन माथुर

कानपुर के पास पुखरायां में हुई रेल दुर्घटना इतनी भीषण थी कि इंदौर-पटना एक्सप्रेस के 14 डिब्बे पटरी से उतर गए और कई डिब्बे तो एक-दूसरे पर चढ़ गए, जिसके चलते जानमाल का भारी नुकसान हुआ। यह हादसा इतना भयानक है कि रेल मंत्रालय को यात्री सुरक्षा के उपायों को और मजबूत करने की जरूरत महसूस हो रही है।

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रेलवे की सुरक्षा को मापने का जो तरीका है, वह एक्सीडेंट पर मिलियन ट्रेन किलोमीटर (प्रति दस लाख किलोमीटर की यात्रा पर होने वाली दुर्घटना) है। वर्ष 2010-11 में एक्सीडेंट पर मिलियन ट्रेन किलोमीटर 0.14 था, जो घटकर 2015-16 में 0.09 रह गया है। इसलिए कहा जा सकता है कि हाल के वर्षों में रेलवे में दुर्घटनाओं में कमी आई है। हालांकि आम जनता इन तकनीकी पहलुओं को नहीं देखती और वह तो उसी आधार पर धारणा बनाती है, जो उसे सामने दिखाई देता है। इसलिए जनता की नजर में दुर्घटनाओं को लेकर रेलवे की छवि अच्छी नहीं है। और जब भी कोई गाड़ी पटरी से उतरती है या दो गाड़ियों के बीच सीधी टक्कर होती है, तो कहा नहीं जा सकता कि कितनी जानें जाएंगी।
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कुछ वर्षों पहले जुलाई, 2011 में जब कालका मेल फतेहपुर में दुर्घटनाग्रस्त हुई थी, जिसमें 71 लोगों की मौत हुई थी और 264 लोग घायल हुए थे, तो रेलवे ने एक उच्चस्तरीय सुरक्षा समीक्षा कमेटी बिठाई थी, जिसे काकोदकर कमेटी कहा जाता है। उस कमेटी ने वर्ष 2012 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें उसने कई अन्य महत्वपूर्ण सुझावों के साथ-साथ सुरक्षा को लेकर भी कई सुझाव दिए थे। कमेटी ने सुझाव दिया था कि शीर्ष स्तर पर सरकार द्वारा एक रेलवे रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट काउंसिल का गठन किया जाना चाहिए, जो रेलवे रिसर्च इंस्टीट्यूट एवं पांच रेलवे रिसर्च सेंटर को उन्नत बनाएगा। कमेटी ने एक सशक्त रेलवे सुरक्षा प्राधिकार गठित करने का भी सुझाव दिया था। इसके अलावा कमेटी ने अगले पांच वर्षों में हर तरह के रेलवे क्रॉसिंग को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने, सिंग्नलिंग को उन्नत बनाने तथा पुराने कोचों को हटाकर नए कोच लगाने का सुझाव दिया था।
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रेल में दो तरह के कोच होते हैं, एक तो आईसीएफ और दूसरा एलएचबी। कमेटी ने सुझाव दिया था कि आईसीएफ कोचों का निर्माण बंद करके एलएचबी कोचों का ही निर्माण किया जाना चाहिए। एलएचबी कोच अच्छे होते हैं और उसके पटरी से उतरने की स्थिति में भी जानमाल के कम नुकसान की आशंका होती है। लेकिन अफसोस कि हमारे देश में ज्यादातर ट्रेनों में आईसीएफ कोच ही हैं। इंदौर-पटना एक्सप्रेस में अगर एलएचबी कोच होते, तो निश्चित रूप से जानमाल का नुकसान बहुत कम होता।

अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए कमेटी ने कहा था कि अक्सर कमेटियों के सुझाव तो मान लिए जाते हैं, लेकिन उस पर अमल नहीं किया जाता। विडंबना देखिए कि काकोदकर कमेटी के ऐसा कहने के बावजूद उसके सुझावों पर पूरी तरह से अमल नहीं हुआ, जबकि अगर उस कमेटी के सभी सुझावों को मान लिया जाता, तो कमेटी के ही मुताबिक, सभी सुझावों पर अमल करने में पांच वर्षों में कुल एक लाख करोड़ रुपये का खर्चा आता। हमारे देश में सुझावों पर अमल नहीं करने और पिछले अनुभवों से सीख नहीं लेने के कारण ही इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियां देखने को मिलती हैं।

लेकिन ऐसा भी नहीं कह सकते कि रेलवे में सुधार नहीं हुआ है। सुधार तो हुआ है, लेकिन जितना अपेक्षित था, उतना नहीं हुआ। मुझे याद है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और नीतीश कुमार रेल मंत्री थे, उस समय 17 हजार करोड़ रुपये का स्पेशल रेलवे सेफ्टी फंड आवंटित किया गया था, जिससे रेल संपत्तियों, जैसे पटरियों, कोचों आदि को बदलने का काम हुआ था। पुरानी परिसंपत्तियों को उन्नत बनाने और बदलने के लिए यह कोष दिया गया था। उसके कारण काफी सारी परिसंपत्तियों को उन्नत किया गया और उन्हें बदला गया, इसलिए सुरक्षा स्थितियों में सुधार हुआ। ऐसा समय-समय पर निरंतर होते रहना चाहिए।

इस हादसे के असली कारण क्या थे, यह तो जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन भविष्य में अगर हम चाहते हैं कि रेल यात्रा को सुरक्षित बनाया जाए, तो उसके लिए नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। पुरानी पटरियों को बदलकर नई पटरियां बिछाई जानी चाहिए। पहियों की सुरक्षा और निगरानी के लिए अल्ट्रासोनिक फ्लो डिटेक्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लंबे समय से एंटी कॉलिजन सिस्टम लगाए जाने की बात हो रही है, पर अब तक उसे नहीं लगाया गया है। इसके अलावा रेलकर्मियों, मसलन ड्राइवर, गार्ड, तकनीशियन आदि को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इसके अलावा सुरक्षा के मामले में फील्ड स्तर पर निर्णय लिए जाने चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि सारे फैसले रेलवे बोर्ड ही ले। कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिए बिना आधुनिकीकरण संभव नहीं है। सुधार या बदलाव के काम ज्यादातर मशीनों के जरिये हो, न कि मैनुअल ढंग से। रेलवे के सामने उसके आधुनिकीकरण की बड़ी चुनौती है और इसमें सबसे बड़ी बाधा बनती है फंड की कमी। लेकिन संतोष की बात है कि हमारे मौजूदा रेल मंत्री अच्छी परियोजनाओं में रेलवे के पैसे का निवेश कर रहे हैं, जिसका भविष्य में अच्छा नतीजा निकलेगा।

सबसे चिंताजनक बात है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष शुरुआती छह महीने में ट्रेनों के पटरियों से उतरने और ट्रेनों की टक्कर, दोनों मामले बढ़े हुए दिखाई देते हैं, हालांकि क्रॉसिंग लेवल गेट पर दुर्घटनाओं में कमी आई है। यह सरकार के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए।


इस हादसे के बाद रेल मंत्रालय और सरकारों की ओर से फौरी तौर पर राहत और बचाव का काम बड़ी मुस्तैदी से किया जा रहा है। विभिन्न सरकारों ने मुआवजे की भी घोषणा की है, लेकिन जिन लोगों के परिजन इस हादसे में बिछड़ गए है, उनका दुख तो जीवन भर का है।

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