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खुद अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी: राहुल गांधी का ममता बनर्जी पर हमला इंडिया गठबंधन के लिए साबित हुआ आत्मघाती

Tue, 05 May 2026 08:47 AM IST
rashid Kidwai रशीद किदवई
Updated Tue, 05 May 2026 08:47 AM IST
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सार
पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दूसरे चरण में राहुल गांधी द्वारा ममता बनर्जी पर किया गया हमला इंडिया गठबंधन के लिए आत्मघाती साबित हुआ। उसने भाजपा विरोधी वोटों को विभाजित कर दिया, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला।
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Axing his own foot Rahul Gandhi s attack on Mamata Banerjee proved suicidal for India alliance
राहुल गांधी - फोटो : ANI

विस्तार

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम कांग्रेस के लिए किसी बड़े राजनीतिक सदमे से कम नहीं हैं। केरल को छोड़कर, जहां वाम मोर्चे के खिलाफ दस साल की एंटी-इनकंबेंसी के चलते कांग्रेसनीत यूडीएफ की जीत पहले से ही तय मानी जा रही थी, शेष चार राज्यों के नतीजों ने पार्टी की सांगठनिक कमजोरियों की पोल खोलकर रख दी है। इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस न तो अपनी पुरानी गलतियों से सबक ले रही है और न ही जोखिम उठाकर नई रणनीति बनाने का साहस दिखा पा रही है। यह न केवल कांग्रेस, बल्कि पूरे इंडिया ब्लॉक के लिए करारा झटका है, जिससे उबरना उसके लिए काफी मुश्किल होगा।


पश्चिम बंगाल और असम में कांग्रेस ने जैसा प्रदर्शन किया, वह काफी हद तक अपेक्षित भी था, लेकिन तमिलनाडु के नतीजों ने कांग्रेस नेतृत्व की भारी रणनीतिक खामियों को उजागर कर दिया है। अचरज तो इस बात को लेकर है कि पार्टी नेतृत्व राज्य में द्रमुक के खिलाफ पनप रहे सत्ता विरोधी रुझान को भांपने में हर स्तर पर विफल रहा। कांग्रेस के आंतरिक सर्वे भी राज्य में अभिनेता विजय की नई पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ (टीवीके) के एक मजबूत ताकत के रूप में उभरने के संकेत दे रहे थे। कांग्रेस के पास टीवीके के साथ गठबंधन करने का तब एक सुनहरा अवसर भी था, जब खुद विजय के पिता एसए चंद्रशेखर ने साल की शुरुआत में स्वयं गठबंधन करने का प्रस्ताव दिया था।


विजय की पार्टी के साथ चुनावी तालमेल करने की जोरदार पैरवी करने वाले कांग्रेस नेता प्रवीण चक्रवर्ती ने चुनाव नतीजों के तुरंत बाद एक टीवी चैनल पर कहा भी कि हमने राज्य में एक बड़ा मौका गंवा दिया। उनके मुताबिक, अगर राज्य में कांग्रेस और टीवीके के बीच गठबंधन होता, तो राहुल गांधी और विजय की जोड़ी राज्य में दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आती। बकौल चक्रवर्ती, राज्य के युवा मतदाता बदलाव चाहते थे। ज्योति मणि और मणिकम टैगोर जैसे युवा कांग्रेसी सांसद भी पुराने गठबंधन को छोड़कर टीवीके के साथ जाने के पक्ष में थे। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता पुरानी वफादारी पर अड़ गए। राहुल गांधी और केंद्रीय नेतृत्व ने भी पी चिदंबरम जैसे कुछ दिग्गज कांग्रेस नेताओं की सलाह को तरजीह दी और टीवीके के साथ गठबंधन करने का साहस नहीं दिखा पाए।

असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के प्रखर हिंदुत्ववादी एजेंडे का मुकाबला करना कांग्रेस के लिए पहले से ही आसान नहीं था, लेकिन पार्टी वहां कुछ बेहतर करने की अपेक्षा तो रख सकती थी। किंतु, समस्या यह थी कि वहां भाजपा से लड़ने के बजाय पार्टी के वरिष्ठ नेता आपस में ही सिर-फुटव्वल में लगे रहे। किसी राज्य में चुनावी सफलता के लिए प्रदेश इकाई में जिस तालमेल की दरकार होती है, वह असम में गायब था। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के राज्य प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह और प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई के बीच एक तरह से संवादहीनता की स्थिति बनी रही। केंद्रीय नेतृत्व ने भी समय रहते दखल नहीं दिया, मानो उसने उस नियति को पहले ही स्वीकार कर लिया, जो आज ईवीएम खुलने के बाद सामने आई है।

वहीं पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दूसरे चरण में राहुल गांधी द्वारा ममता बनर्जी पर किया गया सीधा हमला इंडिया गठबंधन के लिए आत्मघाती साबित हुआ। ममता की तीखी आलोचना ने भाजपा विरोधी वोटों को विभाजित कर दिया, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिला। हालांकि, ममता की हार का श्रेय भाजपा के सुनियोजित चुनावी प्रबंधन को ज्यादा दिया जाना चाहिए, लेकिन कांग्रेस की रणनीति ने इस पराजय को और विराट बना दिया। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन ने जो धाक जमाई थी, वह अब दो साल के भीतर ही खत्म-सी होती नजर आ रही है। दोनों एक बार फिर सिफर पर जा खड़े हुए हैं। भाजपा ने हिंदुत्व का जो नैरेशन गढ़ लिया है, उसकी कोई प्रभावी काट किसी भी विपक्षी दल के पास दिखाई नहीं देती। तृणमूल और द्रमुक की इस जबर्दस्त हार के बाद विपक्ष की रही-सही उम्मीद भी चली गई है।

अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड भाजपा के लिए हिंदुत्व की सफल प्रयोगशालाएं रही हैं, जहां यह कार्ड अब और अधिक आक्रामकता के साथ खेला जाएगा। ऐसे में, टूटे हुए मनोबल के साथ कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भाजपा की मशीनरी का मुकाबला कैसे करेंगे, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।
edit@amarujala.com
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