{"_id":"5fbae0098ebc3e9bd0126cb5","slug":"aung-san-suu-kyi-victory-in-myanmar-india-hope-may-bring-socio-economic-development-of-northeast","type":"story","status":"publish","title_hn":"म्यांमार में आंग सान की जीत से भारत को उम्मीद, हो सकता है पूर्वोत्तर का सामाजिक-आर्थिक विकास","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
म्यांमार में आंग सान की जीत से भारत को उम्मीद, हो सकता है पूर्वोत्तर का सामाजिक-आर्थिक विकास
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
आंग सान सू की
- फोटो : File Photo
आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) ने हाल ही में संपन्न म्यांमार के संसदीय चुनाव में सैन्य समर्थित यूनियन सॉलिडरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) को हराकर शानदार जीत दर्ज की है। इससे म्यांमार में चीन का असर घट सकता है, जबकि भारत और म्यांमार के बीच सामरिक, आर्थिक, सैन्य, सांस्कृतिक, शैक्षिक सहयोग और तालमेल में तेजी आने की उम्मीद है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
म्यांमार के चुनाव में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों समेत कई यूएसडीपी उम्मीदवारों की हार से संतुलन भारत के पक्ष में इसलिए रहने की आशा है, क्योंकि कई यूएसडीपी उम्मीदवारों के, जो म्यामांर की सेना में शामिल थे, चीन के साथ करीबी रिश्ते रहे हैं। अगर वे जीत जाते, तो बीजिंग के हितों को बढ़ावा मिलता। चीन कुछ विद्रोही समूहों का भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता रहा है। जैसे, अराकान सेना भारत द्वारा पूर्वोत्तर भारत में सामान की आसान ढुलाई के लिए कलादान मल्टी मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के खिलाफ काम कर रही है। म्यांमार में कई जातीय समूह दशकों से विद्रोह कर रहे हैं और सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। अराकान सेना जैसे विद्रोही समूह बीजिंग द्वारा समर्थित हैं और एनएलडी की उन तक पहुंच से विद्रोहियों के साथ शांति वार्ता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
म्यांमार की सेना पर दबाव बनाने के लिए बीजिंग म्यांमार के विद्रोहियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, एनएलडी सरकार ने चीन से दूरी बनाई है और ड्रैगन की घातक पकड़ को खारिज कर दिया है, जिसका मतलब है भारत के लिए सकारात्मक विकास। इसके अलावा, काचिन, करेन और कुछ अन्य जातीय समूहों के विद्रोही संगठन पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादियों को शरण दे रहे हैं, जो म्यांमार के विद्रोहियों के माध्यम से चीन से हथियार और अन्य समर्थन प्राप्त करते हैं।
दरअसल पिछले दो दशकों से भारत ने म्यांमार की सेना से सहयोग बढ़ाया है, जिस कारण बीजिंग से उसकी दूरी संभव हुई है। आंकड़ों से पता चलता है कि भारत और म्यांमार के बीच सैन्य सहयोग में काफी वृद्धि हुई है। लेकिन चीन का, जो म्यांमार के बाकी हिस्सों में जातीय विद्रोही समूहों को समर्थन और वित्तीय सहायता देता है, अब भी म्यांमार की सेना पर प्रभाव है। लेकिन सू की जीत से एनएलडी की जातीय दलों के साथ संपर्क स्थापित करने की क्षमता बढ़ेगी, जो भारत के हित में होगी।
भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के लिए आंग सान सू की की जीत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे म्यांमार में भारत द्वारा वित्त पोषित कई बड़ी संपर्क परियोजनाओं में निर्बाध प्रगति हो सकती है। भारत ने पूर्वोत्तर में कई उग्रवादी समूहों को कुचल दिया है, लेकिन वे म्यांमार में शरण पाते हैं, जिसे सू की के नए शासन द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है और इससे
पूर्वोत्तर का सामाजिक-आर्थिक विकास हो सकता है। सू की को भारत का नजदीकी माना जाता है, क्योंकि उनकी उच्च शिक्षा दिल्ली में हुई थी। बाद में जब सेना ने उन्हें नजरबंद किया था, तब भी भारत ने उनकी परोक्ष मदद की थी।
चीन ने 2015 के आम चुनाव में म्यांमार के सैन्य गठबंधन का समर्थन किया था, लेकिन इस बार वह खुले तौर पर लोकतंत्र समर्थक आंग सान सू की का समर्थन कर रहा है। चीनी सरकारी अधिकारियों को म्यांमार के जनरलों को समझाने में मुश्किल होती रही, जबकि लोकतंत्र समर्थक एनएलडी के नेता लचीले हो सकते हैं। हाल के वर्षों में सू की की पार्टी रोहिंग्या संघर्ष से निपटने और वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए चीन के करीब रही है।
चीन चाहता है कि म्यांमार उसके बेल्ट ऐंड रोड प्रोजेक्ट के लिए कई परियोजनाओं को मंजूरी दे। भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला और सेना प्रमुख एमएम नरवणे विगत अक्तूबर में सू की से मिले थे और सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर बातचीत की थी। उन्होंने नौसैनिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए म्यांमार नौसेना को किलो क्लास पनडुब्बी-आईएनएस सिंधुवीर उपहार में दिया था। अब वह एनएलडी का नेतृत्व करेंगी, जिसे सेना को अपने पक्ष में रखना होगा और भारत की पहल कामयाब हो सकती है।
चुनावों में जीत के बावदूद सू की को सैन्य शासन के साथ संतुलन बनाने के लिए जूझना पड़ेगा। उन्हें भारत और चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाना होगा, क्योंकि चीनी आक्रामकता के कारण भारत-चीन के रिश्ते खराब चल रहे हैं। तीसरी बात, चीन और म्यांमार के बीच कई इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए करार हुआ है। ये परियोजनाएं चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे से जुड़ी हुई हैं, जो बीजिंग के विशाल बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) का हिस्सा हैं। सू की को इन परियोजनाओं पर सावधानी से विचार करना होगा, क्योंकि भारत बीआरआई का विरोध कर रहा है, जो एशिया में चीन की विस्तारवादी नीति का एक हिस्सा है।
भारत ने म्यांमार में एक बंदरगाह का निर्माण किया है, और निजी क्षेत्र की कंपनियों को म्यांमार में थाई सीमा तक राजमार्ग बनाने का काम सौंपा है, पर दूसरे देश में अपना प्रभाव जमाने के लिए भारत के पास न तो चीन के बराबर धन है और न ही उसके जैसा आक्रामक, अपारदर्शी नेतृत्व। पर अब नई दिल्ली भारत-प्रशांत निर्माण के तहत म्यांमार को लाने के लिए गंभीर है। भारत-प्रशांत पहल में म्यांमार का प्रवेश एक 'सफल रणनीति' का हिस्सा साबित होगा। हालांकि रोहिंग्या प्रत्यावर्तन का मुद्दा, जिससे बांग्लादेश भी जुड़ा हुआ है, भारत और म्यांमार के बीच एक समस्या बन सकता है।
सू की रोहिंग्या मुद्दे पर हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में नरसंहार के आरोपों का सामना कर रही हैं, हालांकि इस आरोप से उन्होंने इनकार किया है। बड़े पैमाने पर उत्पीड़न के बाद लाखों रोहिंग्याओं ने बांग्लादेश और भारत में शरण ली। कुल मिलाकर, लोकतांत्रिक ताकतों को प्रोत्साहित करने की भारत की नीति बेहतर परिणाम दे सकती है, जो सू की और सेना के साथ संबंधों को मजबूत बनाने तथा चीन का प्रभाव कम करने में मदद कर सकती है।