राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर

‌‌शिवदान ‌सिंह Updated Sat, 01 Feb 2014 01:15 AM IST
At the cost of national safety
हर राष्ट्र की प्रतिष्ठा का मानक केवल उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा ही होती है। इसके महत्व को समझते हुए प्रायः हर देश में एक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद होती है। हमारे यहां भी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद है, जिसके प्रमुख राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं और विदेश, गृह, रक्षा, वित्त व परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिवों के अलावा तीनों सेनाओं के अध्यक्ष एवं आईबी व संयुक्त इंटेलिजेंस कमेटी के अध्यक्ष इसके सदस्य हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में गैर सरकारी क्षेत्रों के प्रख्यात लोगों के विचार जानने के लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा बोर्ड भी है। दरअसल देश की विदेश नीति, आंतरिक हालात व कानून व्यवस्था, आर्थिक स्थिति तथा सीमाओं की सुरक्षा सब मिलकर राष्ट्रीय सुरक्षा कहलाती है। जब ये मानक अच्छी हालत में होते हैं, तब जाकर देश की प्रतिष्ठा और मनोबल उच्च श्रेणी का होता है।

लेकिन इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे अहम घटक सीमाओं की सुरक्षा से ही जुड़ा है, जिसकी जिम्मेदारी सेना पर है। मगर अमूमन इस बात को नजरंदाज कर दिया जाता है कि सैनिकों को कितनी विषम परिस्थितियों में अपना काम करना पड़ता है। अपने परिवार से दूर रहने की पीड़ा वे भोगते हैं, सो अलग। मगर हाल ही में जिस तरह से शहीद हेमराज से संबंधित एक क्लिपिंग को कुछ समाचार चैनलों ने प्रसारित किया, वह सैनिकों के प्रति उनकी कुत्सित मानसिकता को ही दर्शाता है।

वह घटना भी पुरानी नहीं हुई है, जब बिहार में एक मंत्री ने दो शहीद जवानों का अपमान किया और कहा था कि वे तो शहीद होने के लिए ही गए थे। कहने की जरूरत नहीं है कि सिर्फ सीमाओं की सुरक्षा ही नहीं, आपदा के समय भी सेना ही समाज और देश का सहारा बनती रही है। पिछले वर्ष उत्तराखंड आपदा में सेना के जवानों ने जिस जांबाजी से राहत और बचाव कार्य किया था, वह किसी से छिपा नहीं है।

केंद्र एवं राज्य सरकारों ने भले ही सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास की योजनाएं एवं मंत्रालय बना रखे हैं, परंतु जिला एवं तहसील स्तर पर सैनिकों के परिवारों की समस्याओं के निवारण की कोई उचित एवं नीतिगत व्यवस्था नहीं है। इसी कारण आए दिन सैनिकों की पत्नी, माता-पिता और बच्चे उनकी अनुपस्थिति में अपने ही रिश्तेदारों और असामाजिक तत्वों द्वारा सताए जाते हैं। शहीदों की विधवाओं को मिलने वाली आर्थिक सहायता पर भी अक्सर परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा विवाद किए जाते हैं और उन्हें घर से निकालने तक की घटनाएं सामने आई हैं। वास्तव में सैनिकों के कल्याण से संबंधित व्यापक नीति बनाने की जरूरत है, ताकि उनका मनोबल ऊंचा बना रहे।

इसके अलावा शहीद सैनिकों को समुचित सम्मान और उनके परिजनों के सुरक्षित भविष्य के लिए भी जरूरी है कि उनके मुआवजों और अन्य भुगतान से संबंधित मामलों के जल्द निपटारे की कोई नीति बनाई जाए। विभिन्न राज्यों की नीतियों में भी अंतर और विसंगतियां हैं, जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है। इससे नए युवा भी सेना में जाने के लिए प्रेरित होंगे।

इसके लिए जरूरी यह भी है कि राजनीतिक वर्ग का नजरिया भी बदले। यह समझने की भी जरूरत है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पाकिस्तान या चीन से सटी सीमाएं ही चुनौती नहीं हैं, बल्कि देश के भीतर से भी कम खतरा नहीं है। आतंकी संगठनों और माओवादियों की सक्रियता के साथ ही हाल के वर्षों में नकली नोट फैलाने वाले रैकेट भी बड़ी चुनौती बनकर सामने आए हैं। और इन सबके तार कहीं न कहीं सीमा पार से भी जुड़े हुए हैं। जाहिर है कि इन सबसे निपटने में सैन्य और सुरक्षा बलों की अहम भूमिका है।

आज विकसित देश इसलिए विकसित हुए कि उन्होंने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा पर पूरा ध्यान दिया। राष्ट्रीयता की भावना को सर्वोपरि समझा तथा राष्ट्र पर गर्व किया। हमारे देश में 26 जनवरी या 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता जताकर कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है। जबकि देश के प्रति सच्चे अर्थों में कर्तव्य होगा कि हम राष्ट्रीय सुरक्षा में कोई चूक न होने दें। यदि देश इसके लिए सजग रहेगा, तो राष्ट्र के मनोबल के साथ राष्ट्र की प्रतिष्ठा भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ेगी।

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