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जैसी भावना होगी, वैसा गायन होगा

Fri, 07 Dec 2012 09:19 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Fri, 07 Dec 2012 09:19 PM IST
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article of shiv kumar goyal
हमारे नीतिग्रंथों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिनमें यह बताया गया है कि भावना का हमारी बोली पर कितना प्रभाव पड़ता है। इसलिए कहा जाता है कि यदि भगवद्भजन कर रहे हों, तो भावना और मनोयोग से करना चाहिए, तभी ईश्वर तक आवाज पहुंचती है।
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तानसेन के प्रशंसकों में सम्राट अकबर भी थे। वह जब कभी तानसेन के गायन की प्रशंसा करते, तो तानसेन कह देते, यह सब मेरे गुरुदेव संत हरिदास महाराज के चरणों का प्रताप है। उन जैसा संत गायक पृथ्वी पर दूसरा नहीं है।
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अकबर हरिदास जी के दर्शन के लिए व्याकुल हो उठे। तानसेन के साथ आश्रम में पहुंचकर उन्होंने हरिदास जी के दर्शन किए तथा उनके भक्ति पदों को सुनकर शरीर की सुध-बुध खो बैठे। अकबर ने तानसेन से पूछा, तानसेन, आप भी बहुत अच्छा गाते हैं, परंतु जो रस आपके गुरु संत हरिदास के गायन को सुनकर मिला, वह आपका गायन सुनकर कभी नहीं मिला। इस अंतर का कारण क्या है?
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तानसेन ने उत्तर दिया, हुजूर, संत हरिदास जी ईश्वर की प्रशंसा के गीत निःस्वार्थ भाव से गाते हैं। जबकि मैं दरबारी गायक होने के नाते धन के लोभ में आपकी प्रशंसा का राग अलापता हूं। अतः दोनों की वाणी में अंतर होना स्वाभाविक है। यह सुनते ही अकबर संत हरिदास जी के समक्ष नतमस्तक हो उठे।
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