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क्यों पढ़ते हो अखबार!
खान अब्दुल गफ्फार खान
Updated Mon, 04 Feb 2013 02:29 PM IST
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मेरे पास जो अखबार आते थे, मैं बैठकों में लोगों को सुनाता। लेकिन कोई उन पर कान नहीं रखता था। सिर्फ ‘अलहिलाल’ पर थोड़ा ध्यान देते, क्योंकि एक तो इसमें खुदा और रसूल की बातें भी होतीं और दूसरा अबुल कलाम आजाद का अखबार था। पठान अब भी अखबार पढ़ने का शौक नहीं रखते हैं। वे झूठी चीजों और व्यर्थ के रिवाजों पर हजारों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन अखबार पर एक पैसा खर्च नहीं करते। यही वजह है कि इतनी साहसी और बड़ी कौम का अपनी भाषा में कोई कौमी अखबार नहीं है।
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हमारा एक बड़ा खान था। एक दिन उसे शहर में एक लड़का दिखाई दिया, जो अखबार लिए ये आवाज लगा रहा था कि अखबार ले लो। खान साहब ने सोचा कि ऐसे ही दे रहा है तो ले लेते हैं और अखबार उससे ले लिया और चल पड़े। मगर जब लड़के ने उनसे पैसे मांगे, तो उन्होंने अखबार वापस कर दिया। चूंकि हमारा अखबार से लगाव नहीं है, इसलिए हमारा अपनी भाषा में अखबार भी नहीं है।
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जिस प्रकार हमारा अखबार के प्रति प्रेम नहीं था, उसी प्रकार अपनी भाषा के साथ भी प्रेम न था। शिक्षित लोगों से मैं जब भाषा के बारे में बातें करता, तो मुझसे कहते कि पश्तो कोई भाषा है? पश्तो में क्या है? मैं उनसे कहता कि भाइयों ये अन्य भाषाएं तो आसमान से उतरकर नहीं आई हैं। प्रत्येक भाषा के बोलने वालों ने ही अपनी भाषा का विकास किया है। यदि पठान अपनी भाषा को महत्व नहीं देते, तो इसमें पश्तो भाषा का क्या दोष है। यह तो हमारा और आपका दोष है।
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शादी होने के बाद जब मैं अखबार पढ़ता, तो मेरी पत्नी मुझसे कहती कि ये अखबार क्यों पढ़ते हो? ये तो सभी झूठ कहते हैं। मैं उससे कहता कि नहीं यह तो प्रोपगंडा है। अखबार पढ़ना जरूरी है। फिर वो चुप हो जाती और कहती कि मैं तो कुछ नहीं जानती। लोग ऐसा ही कहते हैं, फिर वह मुझसे प्रश्न करती कि ठीक है, तो इनमें क्या है? मुझे भी समझाओ। फिर मैं उसको बतलाता कि इन अखबारों में सारी दुनिया की खबरें हैं।
मैं उसको कुछ उदाहरण बताता कि पठान औरतें पुरुषों से अधिक बुद्धिमान हैं। धीरे-धीरे उसकी भी अखबारों और शिक्षा के प्रति रुचि बढ़ी। उसे कुरान और धर्म की जरूरी जानकारी देता। वह पिता को बहुत प्रिय थी। उसका अपने पिता पर बहुत असर था। जिसकी वजह से औरतों के प्रति मेरे ससुर के दृष्टिकोण में बहुत परिवर्तन आया। मेरी हमेशा यह कोशिश थी कि औरतों के मन से हीनता की भावना दूर करूं, क्योंकि यह भावना तो स्वार्थी एवं अज्ञानी लोगों ने पैदा की है। मेरी अपनी पत्नी के साथ इन बातों पर बहस होती कि औरत एवं पुरुष दोनों ईश्वर की दृष्टि में समान हैं, एक हैं।
अच्छे-बुरे की पहचान कार्य के आधार पर होनी चाहिए। और मैं यह भी उससे कहता कि इन भावनाओं को उत्पन्न करने में आप औरतें स्वयं भी जिम्मेवार हैं, क्योंकि लड़के को एक नजर से देखती हैं और लड़की को दूसरी नजर से और बचपन से ही लड़की के मन में यह बात बैठा देती हैं कि ईश्वर ने लड़के एवं पुरुष को लड़कियों एवं औरतों से श्रेष्ठ बनाया है। फिर मैं उसको यह भी कहता कि इन्सान को ईश्वर द्वारा सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनाया गया है, तो इस वजह से दूसरे प्राणियों से दायित्व भी अधिक है।
लेकिन जब मैं अपनी इस कौम को देखता तो मुझे उनमें और जानवरों में अंतर नहीं दिखता है। इन्हें भी अपने पेट की चिंता है और जानवरों को भी अपना पेट भरने की चिंता है। इन्हें भी अपने घर की चिंता है और जानवरों को भी अपने घोंसलों की चिंता। ये भी उनकी तरह बच्चे पैदा करते हैं और बड़ा करते हैं। तो इनमें से कौन श्रेष्ठ प्राणी माना जाएगा?
(खान अब्दुल गफ्फार खान की आत्मकथा मेरा जीवन मेरा संघर्ष का अंश। उनकी जिंदगी की कहानी पहली बार प्रकाशित हो रही है। पश्तो भाषा से हिंदी में अनुवाद किया है अखलाक अहमद ने। प्रकाशक-नई किताब, नई दिल्ली)