किक मारने की कला
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फुटबॉल हो या जीवन, किक मारने का अपना महत्व है। जिसने किक मारने का महत्व नहीं जाना, वह जीवन में गोल हो गया। यह मत समझें कि किक मारने की कला का महत्व सिर्फ फुटबॉल में है। जीवन में भी किक मारने वाला खिलाड़ी और बाकी सब अनाड़ी समझे जाते हैं। 'गोल के लिए कुछ भी करेंगे' की मानसिकता रखने वाला आदमी फुटबॉल के मैदान में भी सफल होता है और जीवन के मैदान में भी। किक मारने की कला में दरअसल वही माहिर हो सकता है, जो सामाजिक बंधन और मर्यादा को तोड़ सके और स्वहित की भावना का विकास कर सके। जैसे फुटबॉल के मैदान में सामने वाले खिलाड़ी को गिराने और कोहनी मारने वाला खिलाड़ी ही गोलपोस्ट तक पहुंच पाता है, उसी तरह जीवन के मैदान में दूसरों को गिराकर ही हम सफलता के सम्मुखीन हो सकते हैं।
फुटबॉल से राजनीति में आए एक सज्जन से मैंने यह पूछा कि फुटबॉल खेलते-खेलते आप आखिर नेता कैसे बन गए। उन्होंने हंसते हुए कहा, किक मारने की कला का उपयोग राजनीति में जितने अच्छे तरीके से किया जा सकता है, उतना फुटबॉल में भी नहीं। खेल में तो भाईचारा रखना पड़ता है, लेकिन राजनीति में तो सब कुछ सिर्फ दिखावे का चाहिए। सफलता का सूत्र यही है कि जनता से वायदे करो, बड़े-बड़े सपने दिखाओ और बाद में सब को किक मार दो।
नेताजी कहे जा रहे थे, फुटबॉल में तो विपक्ष के खिलाड़ी को ही निशाना बनाया जाता है। पर राजनीति में सफल होने के लिए अपने ही साथियों को किक मार दी जाती है। जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह ज्ञान दिया था कि युद्धक्षेत्र में कोई अपना नहीं, उसी तरह राजनीति में भी कोई सगा नहीं, इसमें कोई भी दगा दे सकता है। मनुष्य में किक मारने की प्रवृत्ति सहजात होती है। मां की गोद से ही बच्चा किक मारना सीख जाता है। इसके बावजूद हम फुटबॉल में किक मारने की कला में अब तक पारंगत नहीं हो पाए हैं, तो यह शर्मनाक है। वह तो शुक्र है कि नेताओं ने किक मारने की कला को थोड़ा-बहुत बचाए रखा है।