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जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कला

Sun, 25 Oct 2015 06:28 PM IST
मूलचंद गौतम
मूलचंद गौतम Updated Sun, 25 Oct 2015 06:28 PM IST
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Art of Sweeping responsibility

सृष्टि के प्रारंभ से ही मनुष्य को यह सवाल परेशान करता रहा है कि खुदा ने किसी भी जीव की जीभ में हड्डी क्यों नहीं लगाई। कम से कम नेताओं की जीभ में तो लगा ही देता, ताकि वह जनता से कभी झूठे वायदे नहीं कर पाता। नेताओं की जीभ में हड्डी होने का लाभ यह होता कि फिर वह अपने कहे पर कायम रहता और बार-बार यू-टर्न नहीं ले पाता। जबकि बिना हड्डी के उसे यह सुविधा रहती है कि अपनी कही बात का जिम्मा दूसरों पर डाल सके। विवाद बढ़ते ही कह सके कि मीडिया तोड़-मरोड़कर उसका गलत अर्थ निकाल रहा है।

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जीभ का यह लचीलापन ही उसे धड़ल्ले से झूठ बोलने की आजादी देता है। जीभ की इस करतूत का नतीजा भी भुगतना पड़ता है। कवि कह ही गए हैं, रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल/ आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल। जीभ में हड्डी होती, तो यह नौबत ही नहीं आती।
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दरअसल स्वाद और वाद-जीभ की यही दो बड़ी कमजोरी हैं। इन्हीं में जीव माया में फंसता है, फिर उसकी वह दुर्गति होती है कि पूछो मत। सतयुग में ऐसा कतई नहीं होता था। तब अगर गलती से भी किसी से गौ हत्या का पाप हो जाता था, तो कलंकी मरी हुई गाय की पूंछ बांधकर गांव-गांव अपने पाप का प्रायश्चित्त करता हुआ तब तक घूमता रहता था, जब तक कि इलाके की जनता उसे माफ नहीं कर देती थी।
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लेकिन कलियुग में ऐसा कुछ नहीं होता। किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं। जो चाहे कहो, जो चाहे करो। मामला तूल पकड़े, तो पल्ला झाड़कर अपना पाप दूसरे के पल्ले बांध दो। इस सरकार की विफलता भी पिछली सरकार के सुपुर्द की जा सकती है।


जिम्मेदारी से पल्ला झड़ने की यह कला ही मॉडर्न मैनेजमेंट का अहम हिस्सा है, जो सिर्फ हार्वर्ड में उपलब्ध है। पुराने जमाने के नेता कुछ गलत होते ही पहला काम पद से इस्तीफा देने का करते थे। अब लोग लाख चिल्लाते रहें, उनके कान पर जूं नहीं रेंगती। यह बेशर्मी वस्तुतः बड़ी अविचल साधना की मांग करती है, जिसे साधकर कोई भी सिद्ध पुरुष हो जाता है।

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