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सद्कर्मों में कभी देर न करें
शिवकुमार गोयल
Updated Tue, 22 Oct 2013 06:39 PM IST
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भगवान महावीर सदाचार का उपदेश देते हुए एक गांव में पहुंचे। तीर्थंकर के आने की सूचना मिलते ही अनेक लोग सत्संग-दर्शन के लिए पहुंच गए।
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गौतम नामक एक भक्त ने उनसे पूछा, पूर्ण निर्वाण किसे प्राप्त होता है? महावीर ने जवाब दिया, जो मनुष्य निष्कपट तथा सरल होता है, वही निर्वाण का अधिकारी बनता है। जिसकी आत्मा शुद्ध होती है, धर्म उसके पास ही ठहर सकता है।
भगवान महावीर ने आगे समझाते हुए कहा, जब तक शरीर सशक्त है, तब तक उसका उपयोग धर्म-साधना के लिए करना चाहिए। कुछ लोग सद्कर्म-साधना में यह कहते हुए देरी करते हैं कि आगे कर लेंगे। ऐसे आलसी लोग भोग-विलास में ही जीवन समाप्त कर लेते हैं। उनके भाग्य में केवल पछताना ही शेष रह जाता है।
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तीर्थंकर ने समझाते हुए कहा, जैसे वृक्ष का पत्ता पीला होकर गिर जाता है, वैसे ही मनुष्य का जीवन भी आयु समाप्त होने पर नष्ट हो जाता है। इसलिए सतत सद्कर्म करते रहने में ही कल्याण है।
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जो मनुष्य अपना जीवन सफल बनाना चाहता है, उसे पाप बढ़ाने वाली मनोवृत्तियों जैसे- क्रोध, मान, माया और लोभ, को सदा के लिए छोड़ देना चाहिए। शांति से क्रोध को मारो, नम्रता से अभिमान को जीतो, सरलता से मोह-माया का नाश करो और संतोष से लोभ को काबू में लाओ।
तीर्थंकर महावीर ने चंद शब्दों में ही मानव जीवन को सफल बनाने के उपाय बता दिए।