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अकेले पड़ गए नवाज
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नवाज शरीफ
नवाज शरीफ संभवतः पाकिस्तान के अकेले ऐसे प्रधानमंत्री रहे जोकि पड़ोसी देशों से संबंधों को एक अलग ही नजरिये से देखते थे। उनका हमेशा यह मानना रहा कि पाकिस्तान के आर्थिक विकास का एकमात्र रास्ता पड़ोसी देशों से बेहतर रिश्ते में और आतंकी समूहों को समर्थन बंद करने में ही निहित है। वह आर्थिक विकास और बातचीत को 'राज्य समर्थित आतंकवाद' की राष्ट्रीय नीति को तवज्जो देते थे। इस विषय पर उन्होंने सेना, आईएसआई और अन्य सत्ता केंद्रों के प्रतिगामी विचार को चुनौती देने की कोशिश भी की।
पाकिस्तान के इन सत्ता केंद्रों को लगा कि शरीफ ने खतरे के निशान को पार कर लिया है, लिहाजा उन्हें सत्ता से जाना पड़ा। वहां की सेना को पता है कि तख्तापलट के दिन लद गए हैं। दुनिया इसकी इजाजत नहीं देगी और पाकिस्तान पर प्रतिबंध लाद दिए जाएंगे, यहां तक कि चीन भी उसे बचा नहीं पाएगा। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट भी वहां सत्ता केंद्र से जुड़ गया। वर्तमान में नवाज शरीफ को अनेक मामलों का सामना करना पड़ा रहा है। उनके खिलाफ मुकदमे की कार्रवाई शुरू करवाने लोग उनके कट्टर दुश्मन हैं।
उनका राजनीतिक करियर तब तक तो खत्म ही समझा जाए, जब तक कि पाकिस्तान के राजनीतिक वर्ग को यह एहसास न हो जाए कि उसे सुप्रीम कोर्ट से वे अधिकार वापस लेने की जरूरत है, जिन पर उसने कब्जा कर लिया है। ऐसी घोषणाएं हुई हैं कि कोर्ट ने विधायिका के क्षेत्र में कदम रख दिया है, इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। अक्तूबर, 2016 का 'डॉन लीक्स' सेना के उच्च स्तर के लिए बर्र का छत्ता साबित हुआ, जब इससे पता चला कि नवाज पर आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है।
ऐसे में सेना की ओर से सरकार को धमकी मिली। डॉन की रिपोर्ट में कहा गया था, 'नागरिक सरकार ने सैन्य नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के बढ़ते अलगाव से अवगत कराया और राज्य द्वारा उठाए जाने वाले अनेक कदमों को लेकर सर्वसम्मति की अपील की।'
इस खुलासे के कारण आंतरिक जांच करानी पड़ी, फलस्वरूप सूचना मंत्री परवेज रशीद को इस्तीफा देना पड़ा। इसके अलावा उस दौर में तत्कालीन सेना प्रमुख राहील शरीफ और प्रधानमंत्री के बीच कई बैठकें भी हुई थीं। सत्तारूढ़ दस के प्रतिनिधिमंडलों ने सेना प्रमुख से मुलाकात कर उन्हें बताया कि इसके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं। सरकार का भविष्य दांव पर लग गया। यह मुद्दा आखिरकार ठंडा पड़ गया और नवाज ने उस वक्त राहत की सांस ली।
मौजूदा सेना प्रमुख ने कोई मौका न छोड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट की मदद से नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल करवा दिया, जबकि खुद नवाज ने ही उन्हें नियुक्त किया था। उन्हें बेदखल करने और उन पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की घोषणा उन्हें दोषी ठहराने वाले फैसले के आने से पहले ही कर दी गई। यह सब इसलिए क्योंकि उन्होंने भारत के साथ बातचीत की प्रक्रिया दोबारा शुरू की थी और आतंकी गुटों को विभिन्न सत्ता केंद्रों से मिलने वाली मदद में अड़ंगा लगाया था।
कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तानी सेना के प्रमुख रहे मुशर्रफ अंतरराष्ट्रीय इतिहास में अकेले ऐसे व्यक्ति हैं, जिसने हार को जीत में बदल दिया। कारगिल में पराजित होने के बाद वह सैन्य तानाशाह के साथ देश के राष्ट्रपति भी बन गए और आज वह राष्ट्रद्रोह का आरोप झेल रहे भगोड़ा हैं। वह नवाज पर कारगिल में वापसी का आरोप लगाते हैं, जबकि दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख कभी भी वहां के प्रधानमंत्री की बात नहीं सुनते। इसे समझने के लिए यही एक वाकया काफीः 2013 में जब नवाज शरीफ तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए जा रहे थे, तब उनके काफिले को इसलिए रोका गया, ताकि वहां से सैन्य प्रमुख का काफिला पहले निकल सके। साफ है कि उस मुल्क में सत्ता किसके हाथ में है।
हाल ही में डॉन को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने पाकिस्तान स्थिति और समर्थित आतंकी समूहों के बार में जो टिप्पणी की, उससे एक बार फिर वहां के सैन्य हलकों में हड़कंप मच गया। इसमें नवाज शरीफ ने स्वीकार किया कि मुंबई में 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकी हमले को पाकिस्तान से अंजाम दिया गया था, जिसमें 150 लोग मारे गए थे। उन्होंने सवाल भी किया कि इस हमले के मुख्य अभियुक्त हाफिज सईद के खिलाफ मुकदमा क्यों नहीं चलाया जा रहा है।
दरअसल उनके जिन शब्दों ने सेना को नाराज किया वह थे, आतंकी संगठन सक्रिय हैं। आप उन्हें नॉन स्टेट एक्टर कहें या कुछ भी, क्या हम उनको सीमा पार जाकर मुंबई में 150 लोगों को मारने की इजाजत दे सकते हैं? हम इस मामले में सुनवाई क्यों नहीं पूरी कर सकते? उन्होंने यह कहते हुए सीधे सेना को निशाना बनाया कि पाकिस्तान विदेश नीतियों ने हमें अलग-थलग कर दिया है। अफगानिस्तान की बात सुनी जा रही है, हमारी नहीं। इस पर सेना ने वहां के प्रधानमंत्री से कहा कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (एनएससी) की बैठक बुलाएं और नवाज शरीफ के आरोप का विरोध करें। इस बैठक के बाद सबने दावा किया कि नवाज शरीफ जो कह रहे हैं, वह सही नहीं है।
यहां तक कि वहां के प्रधानमंत्री ने कहा कि नवाज शरीफ के बयान को मीडिया ने तोड़-मरोड़ कर पेश किया। हकीकत यह है कि नवाज शरीफ ने सच बयान किया और इससे वहां की सरकार को इतनी तकलीफ हुई कि उसने डॉन अखबार का वितरण प्रभावित किया और उस पर साक्षात्कार का अगला हिस्सा प्रकाशित करने पर रोक लगा दी। उसे इस बात का भय है कि शरीफ के खुलासे के बाद भारत अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जा सकता है।
नवाज शरीफ आज अपनी लड़ाई में अकेले पड़ गए हैं। इस बात की आशंका है कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाकर जल्द ही उन्हें जेल में डाल दिया जाए। यह भी संभव है कि सऊदी अरब दखल दे और उन्हें अपने यहां शरण दे दे। एक बात तय है कि इस घटनाक्रम से पाकिस्तान को ही नुकसान होगा।
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पाकिस्तान के इन सत्ता केंद्रों को लगा कि शरीफ ने खतरे के निशान को पार कर लिया है, लिहाजा उन्हें सत्ता से जाना पड़ा। वहां की सेना को पता है कि तख्तापलट के दिन लद गए हैं। दुनिया इसकी इजाजत नहीं देगी और पाकिस्तान पर प्रतिबंध लाद दिए जाएंगे, यहां तक कि चीन भी उसे बचा नहीं पाएगा। ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट भी वहां सत्ता केंद्र से जुड़ गया। वर्तमान में नवाज शरीफ को अनेक मामलों का सामना करना पड़ा रहा है। उनके खिलाफ मुकदमे की कार्रवाई शुरू करवाने लोग उनके कट्टर दुश्मन हैं।
उनका राजनीतिक करियर तब तक तो खत्म ही समझा जाए, जब तक कि पाकिस्तान के राजनीतिक वर्ग को यह एहसास न हो जाए कि उसे सुप्रीम कोर्ट से वे अधिकार वापस लेने की जरूरत है, जिन पर उसने कब्जा कर लिया है। ऐसी घोषणाएं हुई हैं कि कोर्ट ने विधायिका के क्षेत्र में कदम रख दिया है, इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। अक्तूबर, 2016 का 'डॉन लीक्स' सेना के उच्च स्तर के लिए बर्र का छत्ता साबित हुआ, जब इससे पता चला कि नवाज पर आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है।
ऐसे में सेना की ओर से सरकार को धमकी मिली। डॉन की रिपोर्ट में कहा गया था, 'नागरिक सरकार ने सैन्य नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के बढ़ते अलगाव से अवगत कराया और राज्य द्वारा उठाए जाने वाले अनेक कदमों को लेकर सर्वसम्मति की अपील की।'
इस खुलासे के कारण आंतरिक जांच करानी पड़ी, फलस्वरूप सूचना मंत्री परवेज रशीद को इस्तीफा देना पड़ा। इसके अलावा उस दौर में तत्कालीन सेना प्रमुख राहील शरीफ और प्रधानमंत्री के बीच कई बैठकें भी हुई थीं। सत्तारूढ़ दस के प्रतिनिधिमंडलों ने सेना प्रमुख से मुलाकात कर उन्हें बताया कि इसके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं। सरकार का भविष्य दांव पर लग गया। यह मुद्दा आखिरकार ठंडा पड़ गया और नवाज ने उस वक्त राहत की सांस ली।
मौजूदा सेना प्रमुख ने कोई मौका न छोड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट की मदद से नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल करवा दिया, जबकि खुद नवाज ने ही उन्हें नियुक्त किया था। उन्हें बेदखल करने और उन पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की घोषणा उन्हें दोषी ठहराने वाले फैसले के आने से पहले ही कर दी गई। यह सब इसलिए क्योंकि उन्होंने भारत के साथ बातचीत की प्रक्रिया दोबारा शुरू की थी और आतंकी गुटों को विभिन्न सत्ता केंद्रों से मिलने वाली मदद में अड़ंगा लगाया था।
कारगिल युद्ध के समय पाकिस्तानी सेना के प्रमुख रहे मुशर्रफ अंतरराष्ट्रीय इतिहास में अकेले ऐसे व्यक्ति हैं, जिसने हार को जीत में बदल दिया। कारगिल में पराजित होने के बाद वह सैन्य तानाशाह के साथ देश के राष्ट्रपति भी बन गए और आज वह राष्ट्रद्रोह का आरोप झेल रहे भगोड़ा हैं। वह नवाज पर कारगिल में वापसी का आरोप लगाते हैं, जबकि दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख कभी भी वहां के प्रधानमंत्री की बात नहीं सुनते। इसे समझने के लिए यही एक वाकया काफीः 2013 में जब नवाज शरीफ तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए जा रहे थे, तब उनके काफिले को इसलिए रोका गया, ताकि वहां से सैन्य प्रमुख का काफिला पहले निकल सके। साफ है कि उस मुल्क में सत्ता किसके हाथ में है।
हाल ही में डॉन को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने पाकिस्तान स्थिति और समर्थित आतंकी समूहों के बार में जो टिप्पणी की, उससे एक बार फिर वहां के सैन्य हलकों में हड़कंप मच गया। इसमें नवाज शरीफ ने स्वीकार किया कि मुंबई में 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकी हमले को पाकिस्तान से अंजाम दिया गया था, जिसमें 150 लोग मारे गए थे। उन्होंने सवाल भी किया कि इस हमले के मुख्य अभियुक्त हाफिज सईद के खिलाफ मुकदमा क्यों नहीं चलाया जा रहा है।
दरअसल उनके जिन शब्दों ने सेना को नाराज किया वह थे, आतंकी संगठन सक्रिय हैं। आप उन्हें नॉन स्टेट एक्टर कहें या कुछ भी, क्या हम उनको सीमा पार जाकर मुंबई में 150 लोगों को मारने की इजाजत दे सकते हैं? हम इस मामले में सुनवाई क्यों नहीं पूरी कर सकते? उन्होंने यह कहते हुए सीधे सेना को निशाना बनाया कि पाकिस्तान विदेश नीतियों ने हमें अलग-थलग कर दिया है। अफगानिस्तान की बात सुनी जा रही है, हमारी नहीं। इस पर सेना ने वहां के प्रधानमंत्री से कहा कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (एनएससी) की बैठक बुलाएं और नवाज शरीफ के आरोप का विरोध करें। इस बैठक के बाद सबने दावा किया कि नवाज शरीफ जो कह रहे हैं, वह सही नहीं है।
यहां तक कि वहां के प्रधानमंत्री ने कहा कि नवाज शरीफ के बयान को मीडिया ने तोड़-मरोड़ कर पेश किया। हकीकत यह है कि नवाज शरीफ ने सच बयान किया और इससे वहां की सरकार को इतनी तकलीफ हुई कि उसने डॉन अखबार का वितरण प्रभावित किया और उस पर साक्षात्कार का अगला हिस्सा प्रकाशित करने पर रोक लगा दी। उसे इस बात का भय है कि शरीफ के खुलासे के बाद भारत अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जा सकता है।
नवाज शरीफ आज अपनी लड़ाई में अकेले पड़ गए हैं। इस बात की आशंका है कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाकर जल्द ही उन्हें जेल में डाल दिया जाए। यह भी संभव है कि सऊदी अरब दखल दे और उन्हें अपने यहां शरण दे दे। एक बात तय है कि इस घटनाक्रम से पाकिस्तान को ही नुकसान होगा।