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एमनेस्टी का मुखौटा, इसके पीछे का सच बता रहे हैं आलोक मेहता 

Sat, 03 Oct 2020 02:18 AM IST
आलोक मेहता आलोक मेहता 
आलोक मेहता  Published by: आलोक मेहता Updated Sat, 03 Oct 2020 02:18 AM IST
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Alok Mehta is telling the truth behind the amnesty controversy
Amnesty International office in Bangalore - फोटो : PTI

भारत के भोले-भाले लोगों और दुनिया को भ्रमित क्यों किया जा रहा है? केंद्र सरकार ने किसी आतंकवादी संस्था की तरह एमनेस्टी इंटरनेशनल पर प्रतिबंध की घोषणा तो नहीं की है। फिर भारत दुनिया में अकेला तो नहीं है। रूस, इस्राइल और कांगो ने उस पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, तो चीन, अमेरिका और वियतनाम जैसे अनेक देश एमनेस्टी इंटरनेशनल की पूर्वाग्रही गतिविधियों पर कार्रवाई करते रहे हैं। आज एमनेस्टी के लिए आंसू बहा रही कांग्रेस पार्टी या अन्य दलों के प्रभावशाली नेताओं की याददाश्त क्या इतनी कमजोर हो गई है कि 2009 में उनके सत्ता काल में सरकारी कार्रवाई पर भी संस्था ने कुछ महीने अपनी दुकान बंद करने का नाटक किया था।


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यही नहीं, हम जैसे पत्रकार तो अपने देखे-सुने पढ़े-लिखे का रिकॉर्ड भी रखते हैं। पता नहीं फिलहाल कांग्रेस के स्टार शशि थरूर किस पद और देश में थे, लेकिन इंदिरा गांधी के सत्ता काल में हिंदी की प्रमुख साप्ताहिक पत्रिका दिनमान के सात नवंबर, 1982 के अंक में प्रकाशित करीब दो पृष्ठों की मेरी एक विशेष रिपोर्ट का शीर्षक था- 'एमनेस्टी इंटरनेशनल क्या गुप्तचर संस्था है?' इस रिपोर्ट में भी भारत तथा रूस (उस समय सोवियत संघ) की सरकारों द्वारा इस संगठन की संदिग्ध गतिविधियों एवं फंडिंग के गंभीर आरोपों का उल्लेख था।

हाल ही में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने स्वयं किसी कंपनी की तरह आर्थिक संकट के कारण भारत में अपना कामकाज बंद करने की घोषणा की है। वह भी मानव अधिकारों के नाम पर संगठन, ट्रस्ट और कंपनियों के खातों में वैध-अवैध विदेशी फंड के दुरुपयोग के गंभीर मामलों पर प्रवर्तन निदेशालय की जांच-पड़ताल तथा कुछ खाते सील किए जाने से विचलित होकर सरकार विरोधी अभियान के तहत अपने कार्यालय नहीं चलाने की बात की है।

यह बात तो सब जानते-समझते हैं कि अंतरराष्ट्रीय गुप्तचर एजेंसियां, आतंकवादी संगठन और अवैध धंधों वाली संस्थाएं कई छद्म नामों से कामकाज और धन का लेन-देन करती हैं। भारत में किसी भी देशी-विदेशी संस्थाओं को वैधानिक नियमों कानूनों का पालन करते हुए गतिविधियां चलाने की स्वतंत्रता है। बाल मजदूरी की व्यवस्था के विरुद्ध काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी ने अपने छोटे से कस्बे विदिशा से 'बचपन बचाओ आंदोलन' की संस्था से काम शुरू किया और भारत में महत्वपूर्ण समाज सेवा से विश्व को प्रेरणा देकर नोबेल पुरस्कार का सम्मान पाया है।

एमनेस्टी ने विदेशी फंड/पूंजी लेने के लिए बड़ी चालाकी से रास्ते निकाले। उसने अपना जाल फैलाने के लिए चार नामों से कामकाज चलाया- एमनेस्टी इंटरनेशनल फाउंडेशन, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, इंडियंस फॉर एमनेस्टी इंटरनेशनल ट्रस्ट और एमनेस्टी इंटरनेशनल साउथ एशिया फाउंडेशन। फिर बैंकों में इन नामों से कई खाते खुलवाए। दूसरी तरफ 2010 से बने कानून के अनुसार, अपनी मानव अधिकार संस्था के लिए विदेशी फंड अभिदाय नियम के तहत रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया।

वहीं अपने ब्रिटेन स्थित मुख्यालय से कभी समाज सेवा गतिविधि के नाम पर भारी धनराशि मंगवाई। लगभग दस करोड़ रुपये विदेशी पूंजी निवेश (एफडीआई) की तरह दिखाए। इसी तरह करीब छब्बीस करोड़ रुपये भारतीय संस्थाओं के नाम पर दिखाए। नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाने की गंभीर शिकायतें मिलने पर प्रवर्तन निदेशालय ने पड़ताल कर बैंक खतों पर फिलहाल रोक लगवा दी। यह कार्रवाई भी रिजर्व बैंक के नियमों के तहत हुई है। संस्था कानूनी लड़ाई लड़कर संभवतः बचाव कर सकती है, लेकिन वह अनर्गल तर्कों से दुनिया को धोखा क्यों देना चाहती है? 

रही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की नाराजगी की, तो एमनेस्टी गड़बड़ियां करेगी, तो कौन-सी सरकार उन पर मेहरबानी कर सकती है? तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु बिजली घर के विरुद्ध आंदोलन को एमनेस्टी पीछे से सहायता कर रही थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सार्वजानिक रूप से आरोप लगाया था कि इस आंदोलन के पीछे विदेशी शक्तियां हैं। इस संदर्भ में एक बार फिर 1982 में सरकारी सूत्रों से मिली जानकारियों के आधार पर लिखी गई मेरी रिपोर्ट की कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना चाहूंगा। मेरी रिपोर्ट में लिखा था, 'एमनेस्टी इंटरनेशनल पर साम्राज्यवादी देशों की गुप्तचर संस्थाओं का हिस्सा होने के आरोप लगते रहे हैं।

ब्रिटिश सरकार की विशेष गुप्तचर एजेंसी के लिए काम करने का गंभीर आरोप भी है। संगठन की वार्षिक रिपोर्ट में पाकिस्तान के सैनिक शासन द्वारा बनाए गए हजारों राजनीतिक बंदियों और मृत्युदंडों का नाम मात्र उल्लेख तक नहीं है। लेकिन भारत में मानव अधिकारों के नाम पर अनावश्यक बातें प्रचारित की गई हैं।' यह सिलसिला वर्षों से जारी है। तभी तो कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों से सैकड़ों पंडितों के मारे जाने और उनके घर नष्ट किए जाने पर भी एमनेस्टी इंटरनेशनल उसे केवल 'हथियारबंद समूह के हमले' बताती रही। आतंकवादियों को मौत की सजा न देने की अपीलें करती रही हैं। 

जम्मू-कश्मीर, पंजाब, पूर्वोत्तर राज्यों में अतिवादी संगठनों या छत्तीसगढ़, झारखंड और आंध्र प्रदेश जैसे प्रदेशों में नक्सली संगठनों की हिंसक गतिविधियों को सहयोग देने वाले कथित नेताओं, तथा पत्रकार, प्रोफेसर और डॉक्टर के चोले पहने लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहायता उपलब्ध कराती रही है। पिछले वर्ष केवल पश्चिम बंगाल को प्रभावित
करने के लिए संसद द्वारा पारित समान नागरिकता अधिकार कानून या जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने पर एमनेस्टी को बड़ी आपत्ति रही। 

सबसे मजेदार बात यह है कि मानव अधिकारों के लिए काम करने का दवा करने वाले एमनेस्टी के पदाधिकारी निजी कंपनी के मालिकों या मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की तरह मोटी तनख्वाह, पांच सितारा होटलों और बिजनेस क्लास की हवाई यात्राओं पर भारी खर्च करते हैं। मानव अधिकारों की रक्षा, समाज सेवा के नाम पर संस्था को कर मुक्त करने की सुविधा मांगते हैं। दुनिया को अधिकारों का ज्ञान बांटने वाले अपने बैंक खातों और हिसाब-किताब को नियम कानून के तहत ठीक क्यों नहीं करते? विदेशी धन से भारत विरोधी गतिविधियों और प्रचार को रोकने के लिए सरकार ही नहीं, समाज की अन्य संस्थाओं को भी अधिक कड़े कदम क्यों नहीं उठाने चाहिए? 


 
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