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जीते जी ‘लेट’ हो गए वह
अशोक सण्ड
Updated Wed, 02 Jul 2014 07:43 PM IST
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अगर जरा भी भनक होती कि वह आने वाले हैं, तो उनकी खाली कुर्सी की तस्वीर न उतारी जाती। हमेशा समय से दफ्तर पहुंचने वाले सुकुल जी बस कुछ ही मिनट लेट हुए थे। समय के पाबंद, उसके सदुपयोग में आस्था थी उनकी।
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सुकुल जी ने अपने सभी काम समय से ही किए। समय पर जन्म लेने के साथ समय से पढ़े-लिखे भी। समय से ही अपने पैरों पर खड़े भी हो गए और समय से विवाह संपन्न हो जाने के कारण उन्हें संतान भी समय से हुई। लेकिन उस दिन अपने खराब ‘समय’ के चलते पेशी हो गई मंत्री महोदय के दरबार में। इस सरप्राइज चेक से शॉक्ड थे वह।
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उन्होंने सुन रखा था कि समय की तलवार हमेशा सिर पर लटकती रहती है। आज अपने ‘सर’ की तलवार से ‘हत’ हो घर लौटना पड़ा था उन्हें। एक आकस्मिक अवकाश की बलात बलि। बैरंग घर लौट कराह रहे थे वह। देर रात जागकर मैच देखना भारी पड़ गया उन्हें। आंख देर से खुलने के कारण ही तो लेट हो गए थे वह। यह ‘लेट’ नाम के पहले संयुक्त हो दिवंगत होने की फीलिंग्स दे रहा था उन्हें।
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अपने अच्छे दिनों में जब वह नियमपूर्वक समय से कार्यालय में उपस्थित रह वातावरण की निस्तब्धता के साक्षी रहते, तब अधिकांश ‘लेट लतीफ’ घर बैठ अनुलोम-विलोम और कपाल भाती में व्यस्त रहते। बड़े अधिकारियों के पास भी समय प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था, जिसे जिमखाना और गोल्फ क्लब को ‘दान’ करने के उपरांत ही उन्हें दफ्तर की सुधि आती।
सुकुल जी के फुटबॉल प्रेम ने न केवल उनकी खाली कुर्सी की आत्मा को झकझोरा, बल्कि एक सीएल की बलि भी ले डाली। एक बार फिर हाजिरी पर जोर दिया जा रहा है। लगता है, सारे सरकारी महकमे अनुशासित हो जाएंगे। डीमोरलाइज हो जाएंगी अजगर करे न चाकरी में आस्थावान आत्माएं।
कंप्यूटरधारी चूहा (माउस) पकड़ आंकड़ों की मछलियां खंगालेंगे। कछुआ छाप फाइलें खरगोश हो जाएंगी। दांत और जूतों की पॉलिश में समय बर्बाद करने और रोज दाढ़ी छीलने के दिन चले गए। ऐसे में, अच्छे दिन की कौन कहे, बुरे दिन पीछा नहीं छोड़ने वाले।