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दृष्टिकोण: आइंस्टीन के नैतिक विचारों की ताकत, विज्ञान के बाहर भी देखते थे दुनिया

Sun, 30 Jul 2023 07:28 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 30 Jul 2023 07:28 AM IST
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सार
अपने काम में जुनून की हद तक डूबे रहने वाले ज्यादातर मशहूर वैज्ञानिकों के ठीक उलट आइंस्टीन विज्ञान से बाहर की दुनिया में भी गहरी रुचि रखते थे। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दों पर उनका अपना नजरिया था। वह दोस्त बनाने में माहिर थे और उन्हें शास्त्रीय संगीत काफी पसंद था।
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Albert Einstein Distinctive vision power of moral thoughts philosophy making friends loved classical music
अल्बर्ट आइंस्टाइन - फोटो : Social media

विस्तार

मैं ने इस हफ्ते की शुरुआत में क्रिस्टोफर नोलन द्वारा निर्देशित फिल्म ओपेनहाइमर देखी। फिल्म में मुख्य पात्र जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर एक भौतिक विज्ञानी थे, जिनका परिवार यहूदी था, और जिन्होंने प्रिंस्टन में इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज में कई वर्षों तक काम किया। इन मामलों में वह अल्बर्ट आइंस्टीन के समान थे, जो खुद फिल्म के कई दृश्यों में दिखाई देते हैं। उनके बीच कुछ बौद्धिक असहमति जरूर थी। फिर भी ओपेनहाइमर आइंस्टीन का काफी सम्मान करते थे। दिसंबर,1965 में पेरिस में यूनेस्को हाउस में बोलते हुए, ओपेनहाइमर ने टिप्पणी की थी कि, विज्ञान में अपने महान योगदान के अलावा, आइंस्टीन एक सद्भावनापूर्ण और मानवता से ओतप्रोत शख्सियत के तौर पर जाने जाते हैं, जो मुझे लगता है कि सही भी है।' ओपेनहाइमर ने यह भी कहा था, 'अगर मुझे मानवीय समस्याओं के प्रति उनके (आइंस्टीन के) नजरिये को एक शब्द में कहना हो, तो मैं संस्कृत शब्द 'अहिंसा' को चुनूंगा।



आइंस्टीन को सामान्यतया 20 वीं सदी के सबसे महान वैज्ञानिक के रूप में जाना जाता है। अपने काम और कॅरिअर में डूबे रहने वाले ज्यादातर मशहूर वैज्ञानिकों के ठीक उलट आइंस्टीन विज्ञान के बाहर की दुनिया में भी गहरी रुचि रखते थे। उन्हें शास्त्रीय संगीत बहुत पसंद था। वह खुद एक कुशल वायलिन वादक थे। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर उनकी गहरी नजर रहती थी। विभिन्न राष्ट्रों के बीच और उनके भीतर मानवीय संबंधों का संचालन कैसे किया जाना चाहिए, इस पर उनका नजरिया बेहद मजबूत और अमूमन सुविचारित होता था। बतौर वैज्ञानिक आइंस्टीन के बारे में कुछ भी लिख सकने में मैं खुद को वाकई असमर्थ पाता हूं। हालांकि यह लेख एक नैतिकतावादी के रूप में आइंस्टीन के बारे में है। जर्मन-अमेरिकी इतिहासकार फ्रिट्ज स्टर्न की एक पुस्तक है, आइंस्टीन'स जर्मनी। वर्ष 1999 में प्रकाशित यह पुस्तक 20वीं सदी के जर्मनी और खासकर उस काल के इतिहास में यहूदियों के स्थान का व्यापक सर्वेक्षण करती है।


मेरा यह लेख इसी पुस्तक पर आधारित है। पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण निबंध आइंस्टीन पर केंद्रित है। हालांकि किताब के दूसरे अध्यायों में भी उनका जिक्र आता है। पुस्तक आइंस्टीन के पत्रों व भाषणों जैसे प्राथमिक स्रोतों पर आधारित है। स्टर्न के विश्लेषण को प्रामाणिकता इस तथ्य से भी मिलती है कि आइंस्टीन उनके माता-पिता के घनिष्ठ मित्र थे।

मैं फ्रिट्ज स्टर्न के विश्लेषण में से अल्बर्ट आइंस्टीन की प्रभावशाली टिप्पणियों का उल्लेख जरूर करना चाहूंगा। ये टिप्पणियां विज्ञान से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक और नैतिक जीवन से संबंधित हैं। मेरे द्वारा चुनी गई उनकी पहली टिप्पणी 1901 की है, जब आइंस्टीन ने उम्र के दूसरे दशक में पैर रखा ही था। वह कहते हैं, 'सत्ता में मूर्खतापूर्ण विश्वास सत्य का सबसे बड़ा दुश्मन है।' कोई यह मान सकता है कि इस कथन में आइंस्टीन दरअसल वैज्ञानिक सत्ता की बात कर रहे हैं। लेकिन फिर भी बालिग युवाओं का अपने अभिभावकों की सत्ता पर मूर्खतापूर्ण विश्वास भी गलत हो सकता है। इसके अलावा, किसी भी उम्र या नागरिकता वाले पुरुषों व महिलाओं का किसी राजनीतिक सत्ता पर आंख मूंदकर भरोसा करना समझदारी हरगिज नहीं।

जर्मन साम्राज्य में जन्मे आइंस्टीन किशोरावस्था में स्विट्जरलैंड चले गए। उन्होंने अपने वैज्ञानिक कार्यों की शुरुआत ज्यूरिख में की। 1913 में, जब वह अपनी उम्र के तीसरे दशक में थे, तब उन्हें जर्मनी और वहां के विज्ञान की राजधानी माने जाने वाले बर्लिन जाने के लिए राजी किया गया। वहां आइंस्टीन को अपने नए वैज्ञानिक सहयोगी काफी पसंद आए। लेकिन वहां के लोगों की अपने राजा और पितृभूमि के प्रति जो अतार्किक श्रद्धा थी, उससे आइंस्टीन को समस्या थी। जनवरी, 1914 में उन्होंने लिखा, 'जर्मनी के वयस्कों में स्वतंत्र चिंतन दुर्लभ ही दिखता है।' आइंस्टीन ने जर्मनी के लोगों में निहित चापलूसी की जन्मजात प्रवृत्ति के बारे में भी कहीं लिखा है। (उनकी ये टिप्पणियां आज के भारत और भारतीयों की स्थिति से मेल खाती हैं।)

उसी वर्ष पहला विश्वयुद्ध छिड़ गया। आइंस्टाइन अपने चारों ओर व्याप्त अंधराष्ट्रवाद से भयभीत थे। 1915 में इस भौतिक विज्ञानी ने युद्ध-ग्रस्त जर्मनीवासियों से 'सत्ता की भूख और लालच' के साथ-साथ 'घृणा और युद्धप्रियता' को 'घृणित बुराइयों' के रूप में देखने के लिए कहा। जर्मनी के लोगों ने ईसाई धर्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का दावा किया और इस धर्म के अनुरूप ही व्यवहार करने का दावा किया। आइंस्टाइन ने इस पाखंड पर आवाज उठाते हुए कहा, 'अपने स्वामी ईसा मसीह का आदर शब्दों से न करके अपने कार्य व व्यवहार से करो'।

1915 में ही बर्लिन के वैज्ञानिकों और कलाकारों के एक मंच ने आइंस्टीन से युद्ध के बारे में उनके विचार पूछे। आइंस्टीन का जवाब यह था,' मेरी राय में युद्ध की मनोवैज्ञानिक जड़ें पुरुषों की जैविक आक्रामकता में निहित होती हैं।' हालांकि, हिंसा के प्रति पुरुषों की प्रवृत्ति केवल राष्ट्रों के बीच युद्धों से प्रकट नहीं होती। आज के भारत पर विचार करें, जहां धर्म और/या राजनीति के नाम पर की जाने वाली हिंसा में युवक सबसे आगे दिखते हैं।

अल्बर्ट आइंस्टीन का पत्र-व्यवहार जिन शख्सियतों के साथ होता था, उनमें से एक स्विस-फ्रेंच उपन्यासकार रोमां रोलां भी थे, जो संयोग से महात्मा गांधी और टैगोर के भी मित्र थे। अगस्त, 1917 में आइंस्टीन ने रोमां रोलां को लिखा कि 19वीं सदी के अंत में जर्मनी की सैन्य जीतों ने देश को 'सत्ता के प्रति एक धार्मिक आस्था में झोंक दिया था, जिसका समर्थन अति-राष्ट्रवादी और यहूदी विरोधी इतिहासकार हेनरिक वॉन ट्रेइट्स्के के लेखन में भी मिलता है। यह धर्म सुसंस्कृत अभिजात वर्ग के दिमाग पर हावी था। कमोबेश यह निराशाजनक स्थिति वर्तमान भारत में भी दिखती है। सत्ता की चाह रखने वाली हिंदुत्व की अवधारणा इतनी प्रभावशाली हो गई है कि इसने टैगोर-गांधी युग के आदर्शों को दरकिनार कर दिया है।

आइंस्टीन ने जर्मनों के नस्ल आधारित राष्ट्रवाद का विरोध किया था। अरबों और फलस्तीनी यहूदियों के बीच 1929 में हुई हिंसक झड़पों के बाद आइंस्टीन ने चैम वीजमैन (जो बाद में इस्राइल के पहले राष्ट्रपति बने) को लिखा कि अगर हमने अरबों के साथ ईमानदारीपूर्ण सहयोग और वार्ता का मार्ग नहीं खोजा, तो इसका मतलब होगा कि हमने 2000 साल के कष्टों से कुछ नहीं सीखा। आज इस्राइल में जो कुछ हो रहा है, वह आइंस्टीन की टिप्पणियों के महत्व को दर्शाता है। सत्ता में एक कट्टर दक्षिणपंथी सरकार और उदारवादी यहूदियों को पीछे हटते देखकर यही लगता है कि इस्राइल अरबों के साथ ईमानदार सहयोग की राह से काफी दूर आ गया है। अपनी पूरी जिंदगी में आइंस्टीन ने इस बात पर काफी ध्यान दिया कि कोई एक व्यक्ति खुद को दुनिया से कैसे जोड़ सकता है। वह जानते थे कि कोई व्यक्ति अपने जीवन को अर्थ तभी दे सकता है, जब वह संबंध बनाना जानता हो। उन्होंने खुद कई दोस्त बनाए।

इस लेख का अंत मैं आइंस्टीन के बजाय फ्रिट्ज स्टर्न के शब्दों से करना चाहूंगा, जो खुद हिटलर व नाजियों द्वारा निर्वासित किए गए थे। अपने समय के दर्दनाक, नफरत और हिंसा से भरे इतिहास पर विचार करते हुए स्टर्न लिखते हैं, 'कोई भी देश या समाज उन बुराइयों से महफूज नहीं रह सकता, जो वहां के सभ्य नागरिकों की उदासीनता की देन होती हैं।' 20वीं सदी के जर्मनी की यह सीख हम सभी के लिए है।

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