Air India: महाराजा की मुक्ति, लेकिन सवाल बाकी
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विस्तार
आखिरकार महाराजा को सरकार ने मुक्त कर दिया! जून, 2017 में इस स्तंभकार ने कहा था कि सरकार को नागरिक उड्डयन में अपनी भूमिका पर विचार करना चाहिए और अगर इस राष्ट्रीय वाहक का भविष्य बनाना है, तो एयर इंडिया का स्वामित्व टाटा को सौंप देना चाहिए। इस फैसले को आने में थोड़ा वक्त लगा है, लेकिन जिस तरह से यह फैसला आया है, वह काबिलेतारीफ है। महाराजा दीर्घायु हो। अब सवाल उठता है कि अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के बारे में सरकार का क्या विचार है। केंद्र संचालित सार्वजनिक उद्यम (सीपीएसई) में अक्षमता और मूल्य विनाश की स्थिति तत्काल निजीकरण की मांग करती है। सार्वजनिक उद्यम सर्वेक्षण 2019-20 से पता चलता है कि केंद्र द्वारा संचालित 256 सार्वजनिक उद्यमों में से 84 ने 44,817 करोड़ रुपये तक के नुकसान की सूचना दी–यानी हर घंटे पांच करोड़ रुपये का घाटा।
पिछले पांच वर्षों में औसतन 75 सीपीएसई ने भारी घाटा दर्ज किया है। वर्ष 2015-16 और 2019-20 के बीच, इन सीपीएसई द्वारा 1,61,142 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जो प्रति वर्ष औसतन 32,000 करोड़ रुपये से अधिक है। दरअसल, सरकार ने अगस्त 2021 में संसद को सूचित किया था कि '30 सीपीएसई लगातार 1,06,879 करोड़ रुपये के संचयी नुकसान के साथ घाटे में चल रहे थे।' हमारे सामने बढ़ते नुकसान की काली छाया है और फिर धन का क्षरण होता है-करदाताओं के स्वामित्व वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के सूचीबद्ध शेयरों को प्रबंधन छूट का सामना करना पड़ता है। बीएसई में सूचीबद्ध 90 से अधिक संस्थाओं के साथ सरकार देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना है। 31 दिसंबर, 2021 को सभी सूचीबद्ध शेयरों का बाजार मूल्य 266 लाख करोड़ रुपये
था, जबकि पीएसई शेयरों का बाजार मूल्य 22.01 लाख करोड़ रुपये था।
सरकार देश के वित्तीय क्षेत्र में बड़े भाई की भूमिका में है, क्योंकि पूरे बैंकिंग क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) की संख्या दो तिहाई से ज्यादा है। सभी सूचीबद्ध पीएसबी के शेयरों का कुल बाजार मूल्य लगभग 7.7 लाख करोड़ रुपये है। इसके विपरीत, निजी क्षेत्र के एचडीएफसी बैंक का बाजार पूंजीकरण 8.11 लाख करोड़ रुपये है, जो सभी सूचीबद्ध पीएसबी के बाजार मूल्य से अधिक है। दरअसल, सभी पीएसबी का बाजार मूल्य निजी बैंकों के बाजार मूल्य का बमुश्किल एक तिहाई है।
भारत के सार्वजनिक क्षेत्र का प्रबंधन अपर्याप्त वैचारिक स्पष्टता से ग्रस्त है कि सरकार के पास क्या होना चाहिए, और क्या प्रबंधन करना चाहिए तथा उसे क्या विनिवेश करना चाहिए। ऐतिहासिक गलतियां हुई हैं, जिसके पीछे विरासत एक बड़ा कारण है। 1950 में एयर इंडिया के अधिग्रहण के विफल होने की भविष्यवाणी की गई थी। न्यायमूर्ति राजाध्यक्ष की अध्यक्षता वाली वायु परिवहन समिति ने चेतावनी दी थी कि हवाई परिवहन अत्यधिक विशिष्ट है और 'सरकार से जुड़ी धीमी और सख्त नौकरशाही विधियां हवाई परिवहन उद्योग की जरूरतों के लिए अनुपयुक्त हैं।' सरकारी स्वामित्व का परिदृश्य तब और खराब हो गया, जब राजनीतिक और प्रणालीगत सुविधा से प्रेरित फैसले लिए गए। मसलन, सत्तर के दशक में कपड़ा मिलों के राष्ट्रीयकरण को देखा जा सकता है।
अर्थव्यवस्था के बंद होने पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की एकाधिकार स्थिति से समाजवादी पैटर्न कायम था। आदर्श रूप में, 1990 के दशक में अर्थव्यवस्था के खुलने के बाद नीति को धुरी पर लाना चाहिए था। निजी क्षेत्र के लिए खुले डोमेन में सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के सह-अस्तित्व ने सभी क्षेत्रों में करदाताओं द्वारा वित्तपोषित सार्वजनिक संपत्ति के त्वरित क्षरण को तेज कर दिया। हालांकि पिछले दशकों के दौरान सत्ताधारी शासन के भीतर और बाहर से सरकार को व्यवसाय से बाहर करने के प्रतिरोध ने अस्पष्ट और सुविधाजनक परिभाषाएं बनाईं, जिसे रणनीतिक रूप में परिभाषित किया गया। उदाहरण के लिए, भारत पेट्रोलियम, जो 2021 में बिक्री के लिए तैयार था, को रणनीतिक माना गया, भले ही सरकार ने निजी कंपनियों के लिए पेट्रोलियम क्षेत्र को लंबे समय से खोल दिया था। और जिन कंपनियों का निजीकरण किया गया, उन्होंने भले ही अच्छा प्रदर्शन किया हो, पर अटल बिहारी वाजपेयी के शासन में निजीकरण की सफलता के बावजूद, विनिवेश/निजीकरण के खिलाफ राजनीतिक सहमति दो दशकों से कायम है। आमतौर पर, विपक्षी दलों ने सत्ता में रहते हुए जो प्रस्ताव रखा था, ठीक-ठीक उसी का विरोध किया है।
विनिवेश और/या निजीकरण की राजनीतिक स्थिति राजकोषीय घाटे को पाटने के एक तंत्र के रूप में है, यानी यह राजनीतिक अर्थव्यवस्था का वह अनाथ है, जो सरकारी खर्च और आय के बीच के अंतर को परिभाषित करता है। यह स्थिति अपव्यय को लक्षित करने में विफलता को वैध बनाती है और बजट में घोषित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए क्रमिक शासनों की विफलता में प्रकट होती है। संप्रेषण का गायब हिस्सा यह तथ्य है कि सरकार के व्यवसाय से बाहर निकलने की आवश्यकता बेहतर सार्वजनिक हित से प्रेरित है।
एयर इंडिया के निजीकरण की सफलता इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। एलआईसी की लिस्टिंग में हो रही देरी, और वास्तव में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी का कमजोर पड़ना, दृष्टिकोण में संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता को प्रकट करता है। वर्ष 2021 में, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने राजनीतिक रूप से ज्वलंत शब्द 'निजीकरण' को राजनीतिक आख्यान में शामिल किया। यह आवश्यक था, लेकिन पर्याप्त नहीं था। भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था प्रतिस्पर्धी संकटों और परस्पर विरोधी मजबूरियों से घिरी हुई है। भारत की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए केंद्रीय चुनौती संसाधनों को बचाना, क्षमता निर्माण और उत्पादकता को बढ़ावा देना है। यह महत्वपूर्ण है कि सरकारी प्रबंधन के दायरे से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को संसद के प्रति जवाबदेह सार्वजनिक न्यास में स्थानांतरित करने के लिए एक खाका तैयार किया जाए, ताकि सरकार, किसका स्वामित्व रखना और किसे निवेश करना चाहिए, किसे प्रबंधित करना और किसे बेचना चाहिए, के पुनर्गठन में सक्षम हो सके।