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अन्नाद्रमुक का सियासी ड्रामा
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एम भास्कर साई
तमिलनाडु की सियासत, जिसका हमेशा से सिनेमा के साथ करीबी रिश्ता रहा है, पिछले सात महीनों से नाटकीय घटनाओं की गवाह रही है। खासकर पिछले सितंबर से, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता अस्पताल में भर्ती हुई थीं। लेकिन अब वहां की राजनीति चरमोत्कर्ष की तरफ बढ़ रही है। और अब अन्नाद्रमुक के दो संघर्षरत गुट आपसी झगड़े सुलझाने की दिशा में बढ़ रहे हैं।
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हालांकि पिछले कुछ हफ्तों से ही इस बात की चर्चा थी कि दोनों गुट, जिसमें एक का नेतृत्व वीके शशिकला (अन्नाद्रमुक अम्मा के नाम से) और दूसरे का नेतृत्व ओ पन्नीरसेलवम (अन्नाद्रमुक पुराची थल्लवी अम्मा के नाम से) कर रहे हैं, का विलय हो जाएगा। बीते सोमवार इस संदर्भ में तेजी से गतिविधियां दिखीं। पहला संकेत पूर्व मुख्यमंत्री पन्नीरसेलवम की तरफ से आया, जिन्होंने फरवरी में शशिकला के खिलाफ विद्रोह कर दिया था, जिससे अन्नाद्रमुक में दरार पड़ गई। पत्रकारों से बात करते हुए पन्नीरसेलवम ने कहा कि अगर उनसे सामंजस्य के लिए संपर्क किया जाता है, तो वह बातचीत के लिए तैयार हैं।
यह इशारा पाते ही दूसरे समूह के शीर्ष नेता मैराथन वार्ता में लग गए। सबसे पहले लोकसभा उपाध्यक्ष एम थंबीदुरई राज्य सचिवालय में मुख्यमंत्री पलानीस्वामी से दो बार मिले। फिर कई मंत्रियों और अन्नाद्रमुक के वरिष्ठ नेताओं ने सोमवार रात बिजली मंत्री पी थांगमनी के आवास पर सामंजस्य पर चर्चा की। बैठक के बाद डी जयकुमार के नेतृत्व में वरिष्ठ मंत्रियों ने मीडिया को बताया कि हमने पन्नीरसेलवम गुट से मेल-जोल करने के मसले पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि हमने पार्टी को एकजुट करने और चुनाव आयोग द्वारा पार्टी के जब्त चुनाव चिह्न दो पत्ती को वापस पाने पर चर्चा की। उन्होंने यह भी बताया कि बैठक में मुख्यमंत्री पलानीस्वामी नहीं थे, लेकिन उन्हें इसके बारे में बताया गया था।
पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि शशिकला और उनके परिजनों को पार्टी और सरकार से बाहर निकालने की पन्नीरसेलवम गुट की मुख्य मांग को पूरा करना क्या आसान और संभव है।
दिलचस्प है कि ये तमाम राजनीतिक गतिविधियां शशिकला के भतीजे दिनाकरन की अनुपस्थिति में हुई हैं, जो फिलहाल अन्नाद्रमुक अम्मा गुट के उप महासचिव हैं। जैसे ही दिल्ली पुलिस ने दो पत्ती चुनाव चिह्न हासिल करने के लिए चुनाव आयोग के अधिकारी को घूस देने की कोशिश में दिनाकरन की मदद करने के आरोपी सुकेश चंद्रशेखर नामक व्यक्ति को गिरफ्तार कर दिनाकरन पर मुकदमा दर्ज किया, तो मीडिया के सामने आकर दिनाकरन ने सुकेश से कोई संबंध होने से इन्कार किया और तुरंत शशिकला से मिलने बंगलूरू चले गए। पर कहानी में रोचक मोड़ तब आया, जब दिल्ली पुलिस बंगलूरू में दिनाकरन से पूछताछ करने पहुंची। अफवाह थी उन्हें भी गिरफ्तार किया जा सकता है। पर न तो वह जेल में शशिकला से मिले और न ही मंगलवार सुबह तक चेन्नई लौटे। इसलिए मेल-जोल की सारी बातें उनकी गैर-मौजूदगी में हुईं।
इस बात के मजबूत संकेत हैं कि पार्टी नेतृत्व से हटने और सरकार से बाहर रहने के लिए शशिकला के परिवार पर दबाव बढ़ रहा है, ताकि दोनों गुटों को एकजुट कर पार्टी को बचाए रखा जाए, चुनाव चिह्न दो पत्ती को वापस लाया जाए और अगले चार वर्षों तक सरकार के निर्विघ्न कामकाज को सुनिश्चित किया जाए। कहा जाता है कि पश्चिमी तमिलनाडु के कोंगू इलाके (जहां से मुख्यमंत्री पलानीस्वामी भी हैं) के कुछ वरिष्ठ मंत्री पार्टी में शशिकला कुनबे के खिलाफ हैं। वे मानते हैं कि पार्टी में फूट, चुनाव चिह्न जब्त होने, आरके नगर उपचुनाव में मतदाताओं को पैसे बांटने के कारण बदनामी और चुनाव चिह्न के लिए चुनाव आयोग के अधिकारी को घूस देने की कोशिश के लिए शशिकला और दिनाकरन जिम्मेदार हैं। उन्हें लगता है कि दिनाकरन ने पार्टी को भारी क्षति पहुंचाई है और इसका एक ही समाधान है कि उन्हें पार्टी से दूर रहने के लिए कहा जाए और दोनों गुटों को एकजुट किया जाए।
इसी का इशारा करते हुए मंत्री वेलुमणि का कहना है कि अम्मा (जयललिता) ने पार्टी के लिए अपना जीवन दे दिया। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम एकजुट रहकर पार्टी, सरकार और पार्टी के चुनाव चिह्न को बचाएं। लोग अम्मा के नाम पर वोट देते हैं और यह हमारा कर्तव्य है कि हम अम्मा के बताए मार्ग पर लोगों के लिए काम करें। लेकिन कई लोगों का मानना है कि शशिकला के कुनबे को पार्टी से निकालना आसान नहीं है। दिनाकरन से लेकर डॉ वेंकटेश (शशिकला का दूसरा भतीजा) तक और दिवाकरन (भाई) से लेकर नटराजन (पति) तक, हर कोई पार्टी में काबिज है। हालांकि यह भी कहा जाता है कि दिनाकरन से परिवार के कुछ लोग भी नाराज हैं, फिर भी पार्टी से कुनबे को दूर करना आसान नहीं है। अगर ऐसा होता है, तो अन्नाद्रमुक के सभी कार्यकर्ताओं को शशिकला के परिजनों से पूरी तरह से संपर्क तोड़ देना चाहिए, जैसा कि 2011 में जयललिता ने किया था। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक शंकर चिनप्पा का कहना है कि जयललिता की अनुपस्थिति में ऐसा संभव नहीं है।
मेल-जोल की बात करने वालों का कहना है कि अन्नाद्रमुक के दोनों गुट अब भी अम्मा के दिशा-निर्देश पर चल रहे हैं और वे अच्छाई के लिए एकसाथ आएंगे। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि 'किसी परिवार से ज्यादा महत्वपूर्ण है पार्टी और सरकार। हम पहले ही शशिकला और उनके कुनबे से आग्रह कर चुके हैं कि वे दूर रहें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो हम उन्हें बाहर निकालने के लिए मजबूर होंगे।' कहा जाता है कि भाजपा भी चाहती है कि अन्नाद्रमुक के दोनों धड़े एकजुट हो जाएं। इसलिए अगर पार्टी के दोनों गुट एकजुट होते हैं, तो फिर कौन किस पद पर होगा? क्या पलानीस्वामी मुख्यमंत्री बने रहेंगे या पन्नीरसेलवम मुख्यमंत्री बनेंगे? कौन पार्टी का महासचिव बनेगा, जो पार्टी में सबसे ताकतवर पद है। दोनों गुटों के वरिष्ठ नेताओं को कौन-सा पद मिलेगा? खैर, यह सब एक अलग कहानी है।