फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   ai impact on indian it sector jobs and hiring trends

तस्वीर के दो पहलू: AI और डाटा सेंटर पर बरस रहा पैसा, इंसानों के लिए घट रहे अवसर

Wed, 22 Jul 2026 05:31 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Wed, 22 Jul 2026 05:31 AM IST
विज्ञापन
सार
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीकों के तेजी से प्रसार से आईटी सेक्टर और वैश्विक टेक बाजार में दो विरोधाभासी तस्वीरें सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां एआई, डाटा सेंटर और कंपनियों के वैल्यूएशन में भारी बढ़त देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत समेत दुनियाभर में इंजीनियरों और आईटी पेशेवरों की नौकरियों पर संकट गहरा गया है। टीसीएस, विप्रो और टेक महिंद्रा जैसी दिग्गज भारतीय कंपनियों के वित्तीय नतीजे डॉलर के मुकाबले भले बेहतर दिख रहे हों, लेकिन कर्मचारियों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। एआई द्वारा ऑटोमेशन और कोडिंग संभाले जाने से लागत तो घट रही है, पर भारत का पारंपरिक ‘लागत-आधारित’ प्रतिस्पर्धी रोजगार मॉडल तेजी से बदल रहा है।
 
loader
ai impact on indian it sector jobs and hiring trends
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ( प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : @AI/अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

दुनिया अब तेजी से बंटी हुई स्क्रीन पर दिखाई दे रही है। एक तरफ एआई, डाटा सेंटर, मार्केट वैल्यूएशन और कैपिटल में निवेश की भारी बढ़ोतरी दिख रही है, तो दूसरी तरफ यह पता चलता है कि जॉन एफ कैनेडी के जमाने में जिन्हें ‘मूनशॉट’ कहा जाता था, वे कैसे भारत व दुनियाभर में तकनीकी कंपनियों द्वारा इंजीनियरों की भर्ती कम कर रहे हैं।


दरअसल, पिछले हफ्ते चीनी स्टार्टअप मूनशॉट एआई ने एक नया मॉडल (किमि के3) पेश किया, जिसने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। के3 के लॉन्च को एआई इकोसिस्टम में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, क्योंकि यह अमेरिकी दिग्गज कंपनियों के बराबर नतीजे बहुत कम लागत में देने का वादा करता है। मूनशॉट इस दौड़ का अकेला खिलाड़ी नहीं है। कई और कंपनियां भी हैं। ऐसे में, अगर बेहद कम लागत पर उच्च स्तर की एआई क्षमता उपलब्ध होने लगे, तो मौजूदा कारोबारी मॉडल तेजी से अप्रासंगिक हो सकते हैं।


भारत की तस्वीर फिलहाल दो हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है। एक ओर आईटी कंपनियां डाटा सेंटर, एजेंटिक एआई, बढ़ते निवेश और बेहतर वित्तीय नतीजों की खबरों से उत्साह पैदा कर रही हैं। दूसरी ओर, एक शांत, लेकिन चिंताजनक स्थिति भी है, जहां कर्मचारियों की संख्या घट रही है और नई भर्तियां दो साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। ये खबरें कमाई और रोजगार के बीच एक खामोश अलगाव की ओर इशारा करती हैं।

अगर पहली तस्वीर को ध्यान से देखें, तो कंपनियों की निवेशक बैठकों और विश्लेषकों के बीच सबसे अधिक चर्चा सिर्फ दो अक्षरों (ए और आई) की रही। टीसीएस, एचसीएल टेक, विप्रो और टेक महिंद्रा जैसी कंपनियों ने मजबूत ऑर्डर बुक और बढ़ती आय का दावा तो किया, लेकिन इस उत्साह के पीछे एक सच्चाई छिपी थी। कंपनियों की आय रुपये में जरूर दो अंकों की दर से बढ़ी, कुछ मामलों में 14 प्रतिशत से भी ज्यादा, पर असलियत यह है कि आईटी और सॉफ्टवेयर कंपनियां डॉलर में कमाई करती हैं। इसलिए, रुपये के कमजोर होने से यह वृद्धि ज्यादा दिखाई दी। अगर रुपये और डॉलर के बीच कीमत में आए इस बदलाव के असर को हटा दें, तो डॉलर के हिसाब से कमाई में बहुत कम बढ़ोतरी हुई, जो लगभग एक से छह प्रतिशत के बीच ही रही।

वहीं, कर्मचारियों की संख्या पर नजर डालें, तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। टीसीएस ने इस तिमाही में लगभग 9,000 कर्मचारी जोड़े हैं। लेकिन, असल बात यह है कि कुल कर्मचारियों की संख्या 5.93 लाख है, जो एक साल पहले के 6.13 लाख के आंकड़े से कम है। विप्रो ने भी घोषणा की है कि वह इस साल नए इंजीनियरिंग स्नातकों को नौकरी पर नहीं रखेगी। टेक महिंद्रा में कर्मचारियों की संख्या 1.46 लाख है, जो एक साल पहले के मुकाबले कम है। एचसीएल टेक में भी एक वर्ष में करीब 3,200 कर्मचारियों की कमी आई है। यदि राजस्व वृद्धि और कर्मचारियों की वृद्धि को एकसाथ देखा जाए, तो एक तरह का ‘आर्बिट्राज इंडेक्स’ बनता है, जो बताता है कि कमाई बढ़ रही है, लेकिन रोजगार नहीं।

यह स्पष्ट है कि भारत की आईटी कंपनियां टिके रहने की होड़ में हैं और वे खुलकर दांव लगा रही हैं। निवेश अब लोगों के बजाय एआई पर हो रहा है। कभी सस्ती और बड़ी कार्यशक्ति भारत की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धी ताकत थी, पर अब विकास के लिए उसकी जरूरत पहले जैसी नहीं रही। अब नई और क्रांतिकारी तकनीकों के आने से वह मॉडल बदल रहा है। नौकरियों की मांग व पूर्ति से पता चलता है कि भर्ती में कमी आई है। कॉलेज प्लेसमेंट पहले ही कमजोर पड़ चुके थे, अब अनुभवी पेशेवरों के लिए भी अवसर तेजी से घट रहे हैं। यानी, कॅरिअर की शुरुआत से लेकर ऊंचे पदों तक, हर स्तर पर रोजगार के मौके कम होते जा रहे हैं।

जून 2026 की चैलेंजर रिपोर्ट, जो भर्ती के रुझान पर नजर रखती है, बताती है कि उस महीने में एआई से जुड़ी 14,000 से ज्यादा नौकरियों में कटौती की घोषणा की गई थी। इस वर्ष अब तक 1,01,743 नौकरियों में कटौती के पीछे एआई को वजह बताया गया है, जो कुल घोषित छंटनी का लगभग एक-चौथाई हिस्सा है। किसी बात को समझने के लिए संदर्भ बहुत जरूरी है। यह बदलाव केवल अमेरिका या यूरोप तक सीमित नहीं है। वैश्विक कंपनियों में होने वाला ऑटोमेशन सीधे भारत के रोजगार पर असर डालता है। न्यूयॉर्क या न्यू जर्सी में कोई कंपनी एआई अपनाती है, तो उसका असर भारत में कर्मचारियों की छंटनी के रूप में दिख सकता है, क्योंकि मशीनें अब तेजी से इन्सानी काम अपने हाथ में ले रही हैं।

एआई का असर कंपनियों के दावों में भी दिखाई देता है। माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला ने कहा कि एआई 30 प्रतिशत कोड लिख रहा है। ओरेकल ने अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया कि एआई की वजह से 21,000 नौकरियां कम हो गईं। सेल्सफोर्स के सीईओ मार्क बेनिऑफ ने बताया कि एआई ‘एजेंटफोर्स’ अब कंपनी की लगभग आधी सर्विस कॉल संभाल रहा है और इसके बाद 4,000 से अधिक पद समाप्त किए गए। जब एआई नया कोड लिखने लगे, तो बिल योग्य घंटे और लागत, दोनों घटते हैं, जिससे ऑटोमेशन की रफ्तार और तेज हो जाती है।


यह बदलाव केवल आईटी उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की दिशा बदल रहा है। आईटी सेवाएं भारत का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र हैं और मध्यम वर्ग के लिए रोजगार का प्रमुख आधार भी। लेकिन, जिस लागत-आधारित प्रतिस्पर्धी मॉडल ने भारतीय मध्यम वर्ग को मजबूत बनाया, उसकी कीमत अब हर तिमाही नए सिरे से तय हो रही है। सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार के नए मॉडल तैयार करने की है। यह ‘स्प्लिट स्क्रीन’ (दो हिस्सों वाली स्थिति) हमेशा नहीं रहेगी। एआई क्रांति के असल आर्थिक नतीजे साफ दिखने लगेंगे और उन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन हो जाएगा।


लेखक एफ स्कॉट फिट्जगेराल्ड ने श्रेष्ठ बुद्धिमत्ता की पहचान यह बताई थी कि व्यक्ति एक साथ दो विरोधी विचारों को अपने दिमाग में रखकर भी प्रभावी ढंग से काम करता रहे। आज भारत समेत दुनिया की सरकारों के सामने इससे भी कठिन चुनौती है-मशीनों को मजबूत बनाते हुए लोगों को कमजोर न होने देना। असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि एआई लोगों की क्षमता बढ़ाए, उनके अवसर न छीने; बेशक मशीनों में निवेश बढ़े, पर इन्सानों पर होने वाला निवेश कम न हो।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed