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चुनावी नारों से आगे

Wed, 06 Mar 2019 07:33 PM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Wed, 06 Mar 2019 07:33 PM IST
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Ahead of electoral slogans
ग्रामीण श्रमिक

जैसे-जैसे चुनाव का मौसम नजदीक आता है, राजनीतिक वर्ग के पास करने के लिए बहुत से काम होते हैं। लेकिन आम नागरिकों को अपने काम में कटौती करनी पड़ती है, क्योंकि उनके ऊपर नारों की बमबारी की जाती है। साधारण नागरिकों को अलग-अलग राजनीतिक दलों से आने वाली सूचनाओं और आख्यानों को चुपचाप नहीं सुनना चाहिए। उन्हें उन मुद्दों पर निश्चित रूप से कठिन सवाल करने चाहिए, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं।


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निश्चित रूप से नारों का महत्व है, वे लोगों की भावनाओं को उभारते हैं। लेकिन चुनावी मौसम के दौरान लोगों को नारों के बजाय तथ्यों पर भरोसा करना सीखना चाहिए।

वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के साथ 'अबकी बार मोदी सरकार' के नारे पर दांव लगाया था। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के प्रति भारी असंतोष के कारण यह नारा काम कर गया। संप्रग के प्रति लोगों में असंतोष भ्रष्टाचार के आरोपों, बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने में विफलता और नीतिगत अपंगता आदि के कारण था। भाजपा के उम्मीदवार मोदी 'सबका साथ-सबका विकास', अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और रोजगार के वायदे के साथ सत्ता में आए-ये ऐसे मुद्दे थे, जो पूरे देश के निराश मतदाताओं, खासकर युवाओं की भावनाओं के साथ प्रतिध्वनित होते थे।

लेकिन सभी नारे हमेशा कामयाब नहीं होते। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रसिद्ध इंडिया शाइनिंग नारे के साथ चुनाव लड़ा, जबकि कांग्रेस लोगों के पास यह नारा लेकर गई कि 'आम आदमी को क्या मिला'? लोगों ने कांग्रेस को चुना, क्योंकि कुछ ही लोगों के लिए इंडिया चमक रहा था और ज्यादातर लोगों के जीवन में अंधेरा पसरा था।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव का सबसे यादगार नारा कौन होगा? निस्संदेह भाजपा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा, मोदी द्वारा सुरक्षित मजबूत राष्ट्रवाद और उनका नेतृत्व महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। पुलवामा आतंकवादी हमले और पाकिस्तान के खैबर पख्तुनख्वा के बालाकोट में भारत द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई की पृष्ठभूमि में, भाजपा इस बात पर जोर देगी कि भारत ने पाकिस्तानी क्षेत्र में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया है।

लेकिन भारतीय मतदाताओं के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दे कहां हैं? हमें अब तक यह नहीं पता कि आने वाले दिनों या हफ्तों में विपक्ष किस तरह से भाजपा के आख्यानों की बराबरी करेगा। लेकिन एक साधारण नागरिक के नाते हरेक राजनीतिक दल से, जो हमारा वोट चाहता है, कुछ कठिन सवाल पूछना जरूरी है।

आम नागरिक अपने देश की सीमा की सुरक्षा के प्रति चिंतित है और आतंकवादी हमलों के कारण हुई मौतों से हिंसा से घृणा करता है। देश के आम नागरिक अपने सशस्त्र बलों के साथ खड़े हैं, लेकिन उसके साथ ही विभिन्न वर्गों, धर्मों और जातियों के हरेक भारतीय को अपने कार्यस्थलों और घरों में सुरक्षा का एहसास दिलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्या ऐसा हुआ है?

हमारा देश एक गहरे कृषि संकट की गिरफ्त में है। भारत के किसान खुद को बेहद असुरक्षित महसूस करते हैं। हाल के वर्षों में अनेक किसानों ने खुदकुशी की है। किसानों की दुर्दशा मोदी सरकार के कार्यकाल में ही नहीं शुरू हुई है, लेकिन यह पूछना महत्वपूर्ण है कि पिछले पांच वर्षों में उनकी स्थिति में सुधार के लिए क्या किया गया है और अगर भाजपा फिर से चुनाव जीतकर सत्ता में लौटती है, तो किसानों के लिए उसके पास क्या प्रस्ताव हैं।

यहां कुछ तथ्य पेश करना प्रासंगिक लगता है। हमारे देश की 70 फीसदी ग्रामीण आबादी अब भी अपनी आजीविका के लिए जमीन और जमीन से जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सर्वे-2011 के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 54 फीसदी ग्रामीण आबादी के पास अपनी जमीन नहीं है।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) पांच एकड़ या उससे कम जमीन पर खेती करने वाले लघु और सीमांत किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपये प्रत्यक्ष आय सहायता के रूप में हस्तांतरण का प्रस्ताव करता है। इससे 12 करोड़ से अधिक छोटे किसानों को फायदा होने की उम्मीद है। लेकिन क्या वह पर्याप्त होगा?

भारत ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि दर्ज की है, लेकिन रोजगार की स्थिति उतनी उज्ज्वल नहीं है। हमारे देश में ज्यादातर श्रमिक अनियोजित क्षेत्र में काम करते हैं। अखिल भारतीय निर्माता संगठन (एआईएमओ) के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, देश भर के व्यापारियों, लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्यमों ने पिछले साढ़े चार वर्षों में मुख्य रूप से नोटबंदी और जीएसटी के कारण करीब 35 लाख नौकरियों के नुकसान की सूचना दी है।

भाजपा के प्रति निष्पक्ष होकर कहें, तो 2014 में सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार ने कई महत्वाकांक्षी योजनाओं की शुरुआत की है। उदाहरणस्वरूप कुछ के नाम हैं-अटल पेंशन योजना, उज्ज्वला योजना, ग्रामोदय, भारत उदय, सेतु भारती योजना, अमृत योजना, स्मार्ट सिटी परियोजना, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत, व्यापक स्वास्थ्य योजना-आयुष्मान भारत, जिसके दो घटक हैं। इन योजनाओं से बहुत से लोगों को फायदा हुआ है। मसलन, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, जो आयुष्मान भारत का ही हिस्सा है, का काफी प्रचार हुआ है। यह योजना भारत के लगभग 40 फीसदी गरीब लोगों को अस्पताल में भर्ती होने पर स्वास्थ्य बीमा के रूप में पांच लाख रुपये के कवर का आश्वासन देता है। हालांकि, हम आयुष्मान भारत के दूसरे घटक के बारे में बहुत कम जानते हैं, जो दिसंबर 2022 तक 1,50,000 स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को मजबूत करने से संबंधित है।

इसलिए अब जबकि लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं और विभिन्न राजनीतिक दल आम मतदाताओं से वोट मांगने उनके पास आएंगे, हमें उनसे सवाल पूछने चाहिए, जो शासन कर रहे हैं और उनसे भी सवाल पूछने चाहिए, जो शासन करने के आकांक्षी हैं।

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