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चतुराई है चिदंबरम के बजट में
मनीषा प्रियम
Updated Thu, 28 Feb 2013 11:51 PM IST
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संसद में वित्त वर्ष 2013-14 के लिए पेश बजट को 'चिदंबरम बजट' कहना ज्यादा सही होगा। बजट पेश करने के दौरान वित्त मंत्री की शब्द शैली में गहनता तो खूब थी, लेकिन आर्थिक विस्तार की ठोस पहल कम दिखी। जिस विकास दर के दोहरे अंक में जाने की उम्मीद जताई जा रही थी, चिदंबरम बजट में उस बढ़त दर को पांच फीसदी तक रखने का भरोसा भी नहीं जगा पाए। अलबत्ता दबी जुबान उन्होंने यह स्वीकार किया कि चीन और इंडोनेशिया जैसे देश भी आर्थिक मोर्चों पर भारत से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
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अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने एक बार फिर आर्थिक मंदी का रोना रोया और बताया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की गिरती सेहत की वजह से भारत की बढ़त दर प्रभावित हुई है। लेकिन जब गुजरात जैसा राज्य अंतरराष्ट्रीय बढ़त दरों से लोहा ले सकता है, तो देश की औसत बढ़त दर की लुटिया क्यों डूबती नजर आ रही है? क्या इसे सरकार की नीतिगत चूक नहीं मानना चाहिए?
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यही वजह है कि जब विकास दर पांच फीसदी के आसपास नजर आ रही है, यह आशंका ज्यादा है कि कहीं यह दो या तीन फीसदी पर ही न अटक जाए। अगर ऐसा हुआ, तो इसकी सबसे बड़ी मार रोजगार दर पर पड़ेगी और जिस युवा वर्ग के लिए बजट में विशेष ध्यान दिए जाने का दावा सरकार कर रही है, वह वर्ग बेरोजगारी के दुश्चक्र में फंस जाएगा। इतना ही नहीं, यूपीए-1 की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा भी धन की बंदरबांट की योजना बन जाएगी और बहुप्रतीक्षित खाद्य सुरक्षा दिवास्वप्न के अलावा कुछ और साबित नहीं होगी।
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इस बजट का दूसरा राजनीतिक आयाम इसके लोकलुभावन पक्ष से जुड़ा है। अधिकतर लोग बजट से मुद्रास्फीति कम होने की उम्मीद पालते हैं। सरकार ने आंकड़े पेश कर बताए कि मुद्रास्फीति कम हुई है। लेकिन सरकार के इस दावे में भी चतुराई है। बजट में कहा गया कि मुद्रास्फीति 10 फीसदी से नीचे लाई गई है। बेशक ऐसा हुआ है, लेकिन खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति में कोई अंतर नहीं आया है। खाने-पीने की चीजें महंगी ही हैं। मुद्रास्फीति बढ़ने की बड़ी वजह है, सरकार का ज्यादा खर्च करना। यह बजट सरकारी खर्चों पर लगाम लगाने के उपायों पर निराश ही करता है।
बजट भाषण में वित्त मंत्री उस कड़वी दवा का जिक्र करना नहीं भूले, जिसे उन्होंने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया है और जिसका फायदा होने की बात भी उन्होंने कही। बावजूद इसके वह चालू खाता घाटा को पाटने का ठोस उपाय नहीं बता सके। इसके लिए उन्होंने एक बार फिर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) या बाह्य वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) पर भरोसा जताया, लेकिन यह विश्वास किस धरातल पर कायम है, इसकी रूपरेखा वह बजट में नहीं खींच सके।
कुल मिलाकर यूपीए सरकार का यह आखिरी पूर्ण बजट उद्योग जगत के एक खेमे की प्रशंसा के बाद भी 'इंडिया ड्रीम' को पूरा करने वाला नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के हुक्मरानों को हमारे बजट से जो आशा थी, उस पर वित्त मंत्री खरे नहीं उतर पाए।