फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Add slums to development

झुग्गियों को भी जोड़ें विकास से : आज हर 3 भारतीयों में से एक व्यक्ति शहरों या कस्बों में रहने लगा है

Fri, 12 Jul 2019 06:27 AM IST
Raman Singh प्रदीप श्रीवास्तव
प्रदीप श्रीवास्तव Published by: Raman Singh Updated Fri, 12 Jul 2019 06:27 AM IST
विज्ञापन
Add slums to development
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : self

आधुनिक जीवनशैली के लिए शहरीकरण जरूरी है। लेकिन, अराजक तरीके से बढ़ते शहरों के झुग्गी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाना सरकारों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, आज हर तीन भारतीयों में से एक व्यक्ति शहरों या कस्बों में रहने लगा है। 2050 तक भारत की आधी आबादी महानगरों में रहने लगेगी। ऐसे में सबको बराबर सुविधाएं तो नहीं दी जा सकती हैं, लेकिन सभी की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करना सरकार की जिम्मेदारी भी है और समग्र सामाजिक विकास की जरूरत भी।


loader

आधुनिक जीवनशैली के लिए शहरीकरण जरूरी है। लेकिन, अराजक तरीके से बढ़ते शहरों के झुग्गी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाना सरकारों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, आज हर तीन भारतीयों में से एक व्यक्ति शहरों या कस्बों में रहने लगा है। 2050 तक भारत की आधी आबादी महानगरों में रहने लगेगी। ऐसे में सबको बराबर सुविधाएं तो नहीं दी जा सकती हैं, लेकिन सभी की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करना सरकार की जिम्मेदारी भी है और समग्र सामाजिक विकास की जरूरत भी।

रोजगार की तलाश में गांवों या कस्बों से पलायन करने वाले लोग ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक धन कमाते हैं। इस हिसाब से वे राष्ट्रीय आय में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इधर, सभी का बैंक एकाउंट, बढ़ता टैक्स का दायरा और रोजगार के क्षेत्र में कुशलता की मांग के कारण स्लम्स एरिया के लोग भी अब सामाजिक तौर पर ज्यादा मुखर हुए हैं। वहीं, वैश्विक स्तर पर सतत विकास लक्ष्य को हासिल करने के लिए भी शहरी गरीबों के हालत में सुधार बहुत जरूरी है। इसीलिए, विगत दशकों में शहरी विकास के ढांचे में धीरे-धीरे विकसित होती झुग्गी बस्तियों के अस्तित्व को वैध किए जाने और वहां बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की मांग बढ़ने लगी है।

आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1983 में शहरी क्षेत्रों में निवास करने वालों का अनुपात 31.6 प्रतिशत था। 2007-08 में यह बढ़कर 35.4 प्रतिशत हो गया। इसी तरह से 2001 तक भारत की कुल आबादी का 27.81 प्रतिशत हिस्सा शहरों में रहता था, जो, 2011 तक 31.16 प्रतिशत और 2018 में 33.6 प्रतिशत हो गया।

2001 की जनगणना में शहर-कस्बों की कुल संख्या 5,161 थी, जो वर्ष 2011 में बढ़ाकर 7,936 हो गई। उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि भारत में शहरों के विस्तार के साथ ही मलिन बस्तियां बढ़ रही हैं। लेकिन, शहरों के विस्तार को लेकर कोई खास नीति नहीं है, जिस कारण से इनका विस्तार पूंजी की मांग के हिसाब से होता है।

शहरी विकास के लिए बने प्रशासनिक ढांचे भी मात्र शहरों के मध्यवर्ग या उच्चवर्ग की जरूरतों या सुविधाओं तक ही सीमित रहते हैं। उनकी कार्य योजनाओं में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले निम्नवर्ग का विकास शामिल नहीं होता है। सिविल सोसाइटी के दबाव में जिला प्रशासन नामामत्र की योजनाओं को संचालित करता है, जिससे झुग्गियों में रहने वालों को बुनियादी सार्वजनिक सेवाएं, जैसे पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि उपलब्ध हो सके।

आज देश में लगभग सात करोड़ लोग शहरी झुग्गी-बस्तियों में रहते हैं, जहां न तो साफ पानी है, न सफाई और न अन्य मूलभूत सुविधाएं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग पुलों के नीचे, सड़कों पर और जहां-तहां जीवनयापन को मजबूर हैं। वर्तमान में शहरी बेघरों की संख्या गांवों के बेघरों से ज्यादा है। देश की राजधानी दिल्ली के हालात और भी ज्यादा खराब हैं। सेंटर फॉर रीजनल ऐंड अर्बन एक्सीलेंस (क्योर) की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 880 से ज्यादा छोटे-बड़े स्लम एरिया हैं, जिनकी कुल आबादी करीब बीस लाख है।

सीवर व्यवस्था आधुनिक शहर प्रणाली की जान होती है। बिना उसके या जल निकासी व कूड़ा निष्पादन के किसी भी शहर का अस्तित्व कुछ दिनों तक ही संभव है। बावजूद इसके दिल्ली के स्लम्स बिना सीवर के दशकों से चुनौती बने हैं। क्योर ने सरकार के साथ मिलकर सीवर व्यवस्था को लेकर कुछ अनोखे प्रयोग किए हैं। गीता कॉलोनी स्थित सफेदा बस्ती में समुदाय की पहल पर सीवर लाइन डाली गई है, जिसका रखरखाव वहीं के लोग करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed