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विज्ञान को मनुष्यता से जोड़ें

anil prakash joshi अनिल प्रकाश जोशी
Updated Wed, 27 Feb 2019 07:53 PM IST
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Add science to humanity
अनिल प्रकाश जोशी

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर हम यह भूल नहीं सकते कि नई सभ्यता और विकास की नींव विज्ञान ने ही रखी है। हमारे चारों तरफ की तमाम सुविधाएं, बेहतर जीवन सब में विज्ञान ने अहम भूमिका निभाई है। बेंजामिन फ्रेंकलिन का लाइटनिंग का अध्ययन हो या बैटरी की खोज या प्लास्टिक का आविष्कार, सब विज्ञान का ही परिणाम रहा। वर्ष 1700 में एडवर्ड जेनर ने वैक्सीन का प्रयोग तय किया और 1800 तक वैज्ञानिकों ने यह स्वीकार कर लिया कि बीमारियों के पीछे बड़ा कारण बैक्टीरिया और वायरस हैं, और 1900 तक आते-आते कई तरह की एंटीबायोटिक तैयार हो गई, जिन्होंने हैजा और चेचक पर अंकुश लगाया। पिछले कई दशकों से सूचना प्रौद्यौगिकी का लाभ भी हम देख ही रहे हैं। इसने सूचना के आदान-प्रदान को जहां त्वरित किया, वहीं कागज के अत्यधिक उपयोग पर भी अंकुश लगा दिया।


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लेकिन विज्ञान अब मात्र विकास का ही नहीं, बल्कि विकार का भी रास्ता तैयार कर रहा है। हम विज्ञान और विचार को जोड़ नहीं पाए, इसलिए कई तरह के वैज्ञानिक विकार हमारे बीच में हैं। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि विज्ञान के जरिये हमने भोगवादी सभ्यता को ज्यादा बढ़ावा दिया। जैसे, सड़कों पर अंधाधुंध दौड़ती गाड़ियों को आवश्यकता नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये विलासिता का हिस्सा बन चुकी हैं। कार के नए से नए मॉडल इस सच्चाई को मिटा नहीं सकते कि देश-दुनिया के कई हिस्सों में आज भी आवाजाही संभव नहीं है। खाद्य सुरक्षा अपनाए जाने वाले तमाम रास्ते विज्ञान आधारित हैं, पर इससे एक विसंगति भी पनपी है। नई खोजें पुरानी चीजों को खत्म कर देती हैं। ट्रैक्टर के प्रचलन ने बैल की परंपरा समाप्त की है, खेतों की गूल (छोटी नहर) भूमिगत पंपों में बदल चुकी है और जंक फूड ने भोजन की आदत बदल दी है।

विज्ञान की जो सबसे विक्षिप्त खोज मनुष्य ने रची है, वे हथियार हैं। आत्मसुरक्षा के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बहाने के नाम पर हम पृथ्वी को बर्बाद करने से मात्र एक बटन दूर हैं, जिसके दबते ही विनाश हो जाएगा। राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में बड़े व्यापार भी खड़े हो गए और इस ताकत ने वैसे देशों को महत्वपूर्ण बना दिया, वैचारिक विकास में जिनकी कोई बड़ी भूमिका नहीं है। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि हमने विज्ञान से आचार-विचार को अलग-थलग कर दिया। हम उन्हीं खोजों की तरफ दौड़ पड़े, जिनसे तत्कालिक लाभ मिल सके। मोबाइल को सूचना क्रांति लाने का श्रेय भले दे दिया जाए, लेकिन यह मोबाइल ही है, जिसने कई मामलों में शून्य पैदा कर दिया है। घर में ही बैठे लोग आपसी बातचीत से हटकर मोबाइल में व्यस्त रहते है। बस, रेल कहीं भी देखें, तो यही दृश्य दिखाई देता है। हमारी पारस्परिक चर्चा पर विराम लग गया। पागलपन का यह दौर खत्म नहीं होने वाला, बल्कि हम इसके आदी बन चुके हैं। सुविधा के लिए जुटाए गए यंत्र और तंत्र ने शारीरिक श्रम छीन लिया है। अब भोजन तैयार करना, कपड़े धोना, साफ-सफाई सभी में यंत्रों के प्रवेश ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जो हमारे स्वास्थ्य पर बड़ी चोट करती है।

विज्ञान के साथ विचार की पहल आज की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जीवन बेहतर रखने के वैज्ञानिक व तकनीकी सहारों का निश्चित रूप से उपयोग होना चाहिए, पर उस पर आश्रित होना भूल है। रोबोट सब काम कर सकता है, पर उसे मनुष्य का विकल्प नहीं समझा जा सकता। इसलिए विज्ञान को मनुष्यता के साथ जोड़कर देखना चाहिए। अपने हित में हम जिस गति से विज्ञान का दुरुपयोग कर रहे हैं, वह एक दिन विघटनकारी साबित होगा।

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