फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   AAP should not give priority to the power, but struggle

सत्ता नहीं, संघर्ष को प्राथमिकता दे आप

Wed, 10 Sep 2014 07:16 PM IST
मनोज मिश्र
मनोज मिश्र Updated Wed, 10 Sep 2014 07:16 PM IST
विज्ञापन
AAP should not give priority to the power, but struggle

दिल्ली में सरकार के गठन को लेकर चल रही कवायद रोज नए रूप धर रही है। अरविंद केजरीवाल दोबारा मुख्यमंत्री बन पाएंगे या नहीं, यह तो भविष्य बताएगा, पर इस सियासी खींचतान में उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी के अलावा और भी बहुत कुछ गंवा दिया है। राजनीति में शुचिता के जो मापदंड उन्होंने स्थापित किए थे, वे दरक गए हैं। चुनावी तैयारियों के तहत केजरीवाल का जनता के समक्ष कसम खाना कि अगली बार मौका मिला, तो वह इस्तीफा नहीं देंगे, उनके कद को कमतर ही करता है। वह इस गफलत में हैं कि यदि उन्होंने पद से इस्तीफा नहीं दिया होता, तो उनकी लोकप्रियता बरकरार रहती। यहीं पर केजरीवाल की राजनीतिक समझ पर सवाल उठने लगते हैं। लगता है कि देश और समाज की कोई ठोस समझ उन्हें नहीं है। उनका इतिहासबोध कमजोर है और वह देशज व वैश्विक परिदृश्य में आए बदलावों को समझने में नाकाम हैं।

विज्ञापन


लोकसभा चुनाव में केजरीवाल की हार इस वजह से नहीं हुई कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया था, बल्कि सच्चाई यह थी कि बड़ी पूंजी की ताकतें उन पर दांव खेलने के लिए तैयार नहीं थीं। ये ताकतें देश में ऐसा शासन चाहती थीं, जो उन्हें निर्बाध ढंग से काम करने का अवसर दे सके। वे इस बात से आश्वस्त नहीं थीं कि सत्ता में आने के बाद केजरीवाल श्रम कानूनों को उनके हक में शिथिल कर देंगे और भूमि अधिग्रहण कानून में, जिसकी वजह से उनके तमाम प्रोजेक्ट अटके हुए थे, मनमाफिक बदलाव के लिए सहमत हो जाएंगे। वे बाधक बनने वाले पर्यावरण संबंधी कानूनों को भी ध्वस्त कर देना चाहती थीं। वे जानती थीं कि बजट घाटे को कम करने के नाम पर तमाम बेशकीमती सरकारी संपत्तियों को औने-पौने दाम पर बेचने के लिए केजरीवाल राजी नहीं होंगे। लिहाजा जिस राजनीतिक धारा से उन्हें ऐसे मसलों में समर्थन की उम्मीद थी, उसे उन्होंने आगे बढ़ाया और उसकी छवि चमकाने के लिए सारे संसाधन झोंक दिए। सीमित संसाधनों के भरोसे चुनावी समर में उतरे केजरीवाल का इस आंधी में उड़ना स्वाभाविक ही था।
विज्ञापन


वैश्विक परिस्थितियां भी उसी राजनीतिक धारा के पक्ष में थीं, जिसके समर्थन में देशी-विदेशी पूंजी काम कर रही थी। पाकिस्तान में पस्त, अफगानिस्तान में परास्त और चीन से त्रस्त अमेरिका को भारत में ऐसी राजनीतिक शक्ति की दरकार थी, जो दक्षिण एशिया में उसके हितों का पोषण कर सके। यूपीए सरकार इस मामले में अमेरिका की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


हो सकता है कि अरविंद केजरीवाल इनमें से कुछ शर्तों को पूरा करने को राजी भी हो जाते, पर क्या उनके वामपंथी या समाजवादी सहयोगी उन्हें ऐसा करने देते? जाहिर है, नहीं। केजरीवाल को यदि इन परिस्थितियों की समझ होती, तो माफी मांगने के बजाय वह डंके की चोट पर कहते कि उन्होंने इस्तीफा देकर ठीक किया।


आज देश की राजनीति जिस दौर में प्रवेश कर चुकी है, उसमें असहमतियों के लिए कोई स्थान नहीं है। बदली परिस्थितियों में केजरीवाल के दोबारा मुख्यमंत्री बनने की कोई संभावना नहीं है और यदि बन भी गए, तो तय है कि तमाम तरह के छल-प्रपंच और दुष्प्रचार के जरिये उनकी छवि खराब की जाएगी। इसलिए बेहतर होगा कि वह सत्ता के बजाय संघर्ष को प्राथमिकता दें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed