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औरों से अलग नहीं हैं केजरीवाल
तवलीन सिंह
Updated Sun, 15 Mar 2015 08:07 PM IST
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राजनीति का एक पुराना नियम है कि खुद को औरों से अच्छा होने का दावा नहीं करना चाहिए। जो ऐसा करने का घमंड रखते हैं,उनको अक्सर इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है, जैसे इन दिनों अरविंद केजरीवाल भुगत रहे हैं।
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केजरीवाल ने खुद को अलग किस्म का नेता कहने से पहले राजीव गांधी को याद किया होता, तो शायद थोड़ा फूंक-फूंककर चलते। मिस्टर क्लीन कहा करते थे हम पत्रकार राजीव गांधी को, क्योंकि उन्होंने रक्षा सौदों में दलालों को हटाने का प्रयास किया था। उस समय ऐसा लगता था हमें कि राजीव गांधी वास्तव में वह खराबी हटाने का काम करना चाहते थे, जो हर सरकारी महकमे में आ चुकी थी। सो जब स्वीडन से खबर मिली कि बोफोर्स सौदे में भारत सरकार के उच्च स्तर के अधिकारियों को रिश्वत दी गई थी बोफोर्स की तोपें खरीदने के लिए, तो राजीव गांधी की सारी इज्जत मिट्टी में मिल गई।
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इसी तरह केजरीवाल ने बार-बार कहा होता अगर कि आम आदमी पार्टी अन्य राजनीतिक दलों से अलग है, तो शायद इतना नुकसान नहीं होता उनकी छवि को, जितना पिछले सप्ताह हुआ। राजनीति में छल-कपट, जोड़-तोड़, सौदेबाजी आम चीजें हैं, सो छह कांग्रेसी विधायकों को तोड़ना इतनी बड़ी बात नहीं थी। वह भी उस समय, जब आप के बुरे दिन आए हुए थे। एक तो दिल्ली के लोग नाराज थे आप से, क्योंकि उनचास दिनों के बाद ही मुख्यमंत्री केजरीवाल इस्तीफा देकर बनारस चले गए थे नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने। ऊपर से लोकसभा में सिर्फ चार सीटें हासिल कर सकी थी आप। ऐसे में क्यों न दिल्ली में दोबारा सरकार बनाने की कोशिश करते केजरीवाल?
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समस्या केजरीवाल साहिब की सिर्फ यही है कि उन्होंने खुद को नैतिकता का ठेकेदार होने का दावा किया। अब नौबत यह आ पड़ी है कि हर दूसरे-तीसरे दिन कोई न कोई घटना घटती है, जो साबित करती है कि केजरीवाल सिर्फ एक राजनेता हैं। सो वीआईपी सभ्यता का विरोध करने वाले केजरीवाल मुख्यमंत्री बनते ही वीआईपी कोठी में प्रवेश कर गए बेझिझक।
पिछली बार उन्होंने खूब नखरा किया सरकारी मकान लेने से पहले। बड़ी कोठी सौंपी गई, तो समर्थकों को बुरा लगा, तब दो छोटी कोठियां ले ली उसके बदले जनता की नजरों में आम आदमी साबित होने के लिए। इस बार छोटी और बड़ी कोठी का सिलसिला चला ही नहीं। और न ही केजरीवाल मेट्रो में गए रामलीला मैदान शपथ ग्रहण करने। ऐसा लगता है कि समझ गए हैं कि इन तमाशों को जनता पसंद नहीं करती।
केजरीवाल राजनेता हैं, देवता नहीं, यह तो हम जान गए। सवाल अब यह है कि केजरीवाल किस तरह के राजनेता हैं। लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं या तानाशाही में? ये सवाल पूछना जरूरी हो गया है, क्योंकि जिस तरह से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की छउट्टी कर दी गई है पीएसी से पिछले दिनों, उससे तो ऐसा लगता है कि वह इन मामलों में सोनिया गांधी से भी आगे निकल चुके हैं। सोनिया गांधी का नियंत्रण कांग्रेस पर इतना मजबूत है कि लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद भी किसी की हिम्मत नहीं हुआ श्रीमतीजी पर दोष डालने की। लेकिन यह भी सच है कि सोनिया गांधी किसी वरिष्ठ नेता को पार्टी से इतनी आसानी से नहीं निकाल सकती हैं, जैसे केजरीवाल ने अपने पुराने साथियों को निकाला। इससे अगर साबित होता है कि केजरीवाल किसी किस्म का विरोध बर्दाश्त नहीं कर सकते, तो दिल्ली में आगे क्या होगा, भगवान ही जानते हैं।