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मोदी सरकार की विदेश नीति का एक साल
रहीस सिंह
Updated Fri, 22 May 2015 09:01 PM IST
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नरेंद्र मोदी जब देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे, तब लग रहा था कि अब भारत 21वीं सदी की वास्तविक ताकत बनने जा रहा है। पर विदेश नीति के मोर्चे पर भारत कमोबेश अब भी वहीं खड़ा है, जहां वह एक साल पहले था। विगत एक वर्ष में विदेश नीति के आयाम कम स्पष्ट हुए हैं, उपलब्धियों के आंकड़े भी अभी सामने नहीं आए हैं, पर विदेश नीति के मोर्चे पर नरेंद्र मोदी का वैसा ही प्रभाव दिख रहा है, जैसा नेहरू जी का दिखता था।
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मोदी सरकार के सामने पाकिस्तान और चीन को हद में रहने के लिए सख्त संदेश देने, रूस के साथ सुस्पष्ट रणनीतिक संबंध बनाने, हिंद महासागर में चीनी गतिविधियों पर अंकुश लगाने और उसकी रणनीति का मुकाबला करने, अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ बराबरी पर आधारित द्विपक्षीय रिश्ते कायम करने, आतंकवाद पर स्पष्ट वैश्विक जनमत तैयार करने तथा सीमा विवादों का स्थायी समाधान खोजने की चुनौतियां थीं।
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हमारे पड़ोसी दक्षिण एशियाई देश आर्थिक दृष्टि से उतने लाभदायक नहीं हैं, पर इनकी सामरिक महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री की भूटान और नेपाल के साथ की गई कूटनीतिक पहल को इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। हालांकि नेपाल में भूकंप के बाद मदद करने के बावजूद काठमांडू के दिल में उतरने में भारत उतना सफल नहीं हो सका।
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इसी तरह जापान के साथ नया रणनीतिक रिश्ता बनाने की कोशिश की गई, पर यह पहल इंफ्रास्ट्रक्चर विकास तक ही सीमित रह सकती है, सामरिक क्षेत्र में नहीं, क्योंकि चीन के ऐतराज को देखते हुए जापान को संभवतः ‘मालाबार’(युद्धाभ्यास) में शामिल नहीं किया जाएगा। ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की यात्राएं कर मोदी ने नई सामरिक साझेदारी की बुनियाद रखी है, पर इसमें अमेरिका की भूमिका और प्रशांत महासागर में उसके हित अधिक निर्णायक तत्व हैं। मोदी ने फिजी, सेशेल्स और मॉरीशस की यात्राएं भी कीं।
हकीकत यह है कि पिछले एक साल में मोदी ने अमेरिका और चीन को ही सर्वाधिक महत्व दिया। इन दो देशों के राष्ट्रपति एक वर्ष के अंदर भारत आए और प्रधानमंत्री मोदी ने भी इन देशों की यात्राएं की। हालांकि अमेरिका से भारत को कुछ मिला नहीं, तो बूढ़े होते चीन की घरेलू मांग की संभाव्यता न्यून स्तर पर पहुंच रही है।
यदि यूरोप की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाती रही, तो भारत का बाजार उसकी अर्थव्यवस्था को थामने में सबसे मददगार होगा। पर ओबामा के साथ सिर्फ मन की बात साझा हो सकी और शी जिनपिंग के साथ सांस्कृतिक उत्सवों की साझेदारी।
इसी तरह जर्मनी और फ्रांस से व्यापारिक साझेदारी हुई, तथा फ्रांस से राफेल विमान खरीदने का सौदा भी, पर परिणाम आने अभी बाकी हैं। फ्रांस के साथ हुए समझौतों से भारत की बुनियादी संरचना के गति पकड़ने के अलावा अंतरिक्ष अनुसंधान, परमाणु ऊर्जा, विज्ञान और तकनीकी तथा मैरीन टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में आगे बढ़ने का मौका मिल सकता है।
हालांकि जर्मनी में मेक इन इंडिया के बजाय ‘टू मेक स्ट्रांग जर्मन कंपनीज’ का उद्देश्य ज्यादा पूरा होता दिखा।
बहरहाल नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले तक भारत की विदेश नीति बाह्य केंद्रित अधिक लग रही थी, पर अब यह भारत केंद्रित होती दिखी है। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को कूटनीतिक क्षमता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की है। इसके बावजूद करीब एक वर्ष पुरानी मोदी सरकार के पास बताने के लिए ठोस उपलब्धियां नहीं हैं।