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इमरान के खिलाफ एक मौलाना, सियासत से जुदा जमीनी हकीकत

Fri, 11 Oct 2019 03:43 AM IST
मरिआना बाबर मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Published by: मरिआना बाबर Updated Fri, 11 Oct 2019 03:43 AM IST
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A Maulana Against Imran Khan
मौलाना फजलुर रहमान - फोटो : a

भारत के लोगों को पाकिस्तानी राजनेता और जमीयत उलेमा-ए इस्लाम के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान याद होंगे, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के आमंत्रण पर 25 जुलाई, 2003 को और फिर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के आमंत्रण पर शिष्टमंडल के साथ 19 मई, 2006 को नई दिल्ली की यात्रा की थी। पूर्व विदेश सचिव और पाकिस्तान में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त जे एन दीक्षित का मीडिया में तब बयान छपा था, जिसमें उन्होंने कहा कि रहमान के पास पेशकश के लिए कोई नई बात नहीं थी। इसके साथ ही उन्होंने कहा था, 'फिर भी, वह महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनकी यात्रा भारत को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रही है और भारत उनके विचारों को जानना चाहता है।' उसी समय भारतीय मीडिया ने ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के पाकिस्तान अध्ययन के निदेशक सुशांत सरीन का भी बयान प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'रहमान ने तब सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने कहा कि कश्मीर और भारत को विभाजित करने वाली नियंत्रण रेखा अंतरराष्ट्रीय सीमा बन सकती है, बशर्ते भारत, पाकिस्तान और कश्मीरी सहमत हों। बाद में वह अपने बयान से मुकर गए।'


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सरीन फिर भी रहमान को संदेह का लाभ देना चाहते थे- 'हर कोई इस बात से सहमत होगा कि वह एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो भारत के साथ शांति में विश्वास करते हैं। भारत के लिए इस आदमी को सुनना फायदेमंद और जरूरी है, जो भारत विरोधी और अमेरिकी समर्थक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के विपरीत जमीनी हकीकत से वाकिफ है।'

इन दिनों मौलाना इस्लामाबाद में सुर्खियों में हैं, जहां उन्होंने आगामी 27 अक्तूबर को इस्लामाबाद के चारों ओर घेराबंदी करने के लिए लाखों समर्थकों को लाने की धमकी दी है और कहा है कि जब तक प्रधानमंत्री इमरान खान की पीटीआई सरकार को उखाड़ नहीं फेंकेंगे, तब तक हटेंगे नहीं। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार एक सत्तारूढ़ सरकार को केवल संसद के माध्यम से अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया जा सकता है, लेकिन स्पष्ट है कि नेशनल एसेंबली और सीनेट, दोनों मौजूदा राजनीतिक ढांचे को बदलना नहीं चाहते। यहां तक कि जब कुछ वर्ष पहले इमरान खान ने नवाज शरीफ सरकार के खिलाफ कुछ महीने के लिए इस्लामाबाद को घेर लिया था और इस्लामाबाद एवं रावलपिंडी के नागरिकों के जीवन को दयनीय बना दिया था, तब भी ऐसा नहीं हो सका और उन्हें हार माननी पड़ी। उस समय यह चर्चा थी कि पाकिस्तानी सेना इमरान खान का समर्थन कर रही है, लेकिन यह सच नहीं था और अंततः इमरान खान को अपने राजनीतिक तमाशे को खत्म करना पड़ा।

आज लोग गुपचुप तरीके से सवाल पूछ रहे हैं कि क्या रावलपिंडी के किसी व्यक्ति (सेना) ने मौलाना को शह दी है और अगर नहीं, तो क्या उन्हें 27 अक्तूबर का मार्च रोकने के लिए राजी किया जा सकेगा?

इसमें कोई रहस्य नहीं है कि ऐसा होने पर मौलाना को कुछ राजनीतिक राहत मिलेगी और कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि उनकी पार्टी को बलूचिस्तान में कुछ मंत्री पद देकर संतुष्ट किया जा सकता है। मैं एक पल के लिए भी विश्वास नहीं कर सकती कि सेना हिंसा और कानून व्यवस्था में सेंध लगाकर इमरान खान को हटाने के लिए मौलाना का समर्थन करेगी, क्योंकि इस्लामाबाद एक छोटा शहर है, जिससे वहां व्यवसाय व शिक्षण संस्थान ठप पड़ जाएंगे। कश्मीर में नियंत्रण रेखा और अफगानिस्तान सीमा पर स्थिति ठीक नहीं है, इसलिए सेना उधर से अपना ध्यान नहीं हटा सकती। इसके अलावा अर्थव्यवस्था की हालत भी ठीक नहीं है। यहां तक कि पाकिस्तान के प्रमुख व्यवसायियों ने सेना प्रमुख जनरल बाजवा से मुलाकात कर इमरान खान की नीतियों की शिकायत की है, जिनसे अर्थव्यवस्था को कोई मदद नहीं मिल रही है।

लेकिन कुछ सूत्रों से खबरें आ रही हैं कि सत्तारूढ़ सरकार की कार्य अवधि को पांच साल से घटाकर तीन साल करने के लिए सरकार को संसद में संविधान संशोधन विधेयक लाने के लिए प्रेरित किया जाएगा। तो क्या इमरान खान पांच साल पूरे कर पाएंगे? अभी यह एक अनुत्तरित सवाल है।

पिछले आम चुनाव में जनता द्वारा खारिज कर दिए जाने के बाद मौलाना पाकिस्तान की सियासत में पूरी तरह अप्रासंगिक हो गए थे। वर्ष 2007 में उन्होंने पाकिस्तान स्थित अमेरिकी राजदूत एनी पैटर्सन को रात्रिभोज पर आमंत्रित कर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के लिए उनका समर्थन मांगा था। इस तथ्य के बावजूद कि वह अमेरिका और इस्राइल के कट्टर विरोधी हैं और पाकिस्तान में तालिबान समर्थक राजनेता माने जाते हैं, उन्होंने अमेरिका का दौरा करने की इच्छा जताई।

उनका गढ़ खैबर पख्तूनख्वा में है और पख्तूनों ने काफी मुल्ला राजनीति कर ली है और अब वे आगे बढ़ना चाहते हैं। वास्तव में पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम) के संस्थापक मंजूर पश्तीन के अनुयायी बढ़ रहे हैं और एक बार अगर यह आंदोलन राजनीतिक दल के रूप में उभर गया, तो लोगों को प्रगतिशील राजनीति प्रदान करेगा।

दिलचस्प बात यह है कि मौलाना फजलुर रहमान अब तक पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) का समर्थन नहीं जुटा पाए हैं। दोनों पार्टियों के कुछ लोगों से बात करने पर पता चला कि उन्हें संदेह है कि मौलाना अपने धरने/बैठक में इस्लामी कार्ड का इस्तेमाल करेंगे और वे उसका हिस्सा नहीं बनना चाहते। मौलाना का कथन यह होगा कि इस्लाम खतरे में है और पवित्र पैगंबर का सम्मान नहीं किया जा रहा है। इस्लाम के नाम पर वह अपने समर्थकों को जागृत कर कुछ और समर्थक बढ़ाएंगे तथा कुछ शिक्षित पाकिस्तानी इस पर उनका साथ दे सकते हैं। असल में यही वह चीज है, जिससे पीपीपी और पीएमएल बचना चाहते हैं। प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक जाहिद हुसैन कहते हैं, 'सरकार के खिलाफ धार्मिक कार्ड, जो दावा करता है कि हम 'मदीना की रियासत' स्थापित करना चाहते हैं, के काम करने की संभावना नहीं है। लगता है कि मौलाना के पास कोई प्रभावी मुद्दा नहीं है और उनके राजनीतिक दुस्साहस ने विपक्ष को और विभाजित कर दिया है।'

भले ही मौलाना कानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं, लेकिन न तो वह सरकार को झुका सकते हैं और न ही ताजा चुनाव कराने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

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