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नैनीताल की जिंदगी का एक दिन : पहाड़ों का प्राकृतिक सौंदर्य और जल, जंगल, जमीन के प्रति सरकारी उदासीनता

Sun, 25 Sep 2022 06:23 AM IST
Shekhar Pathak शेखर पाठक
Updated Sun, 25 Sep 2022 06:23 AM IST
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सार
यह वही क्षेत्र है, जहां 26 मार्च, 1974 को गौरा देवी और बहिनों ने रेणी में अपने जंगल को कटने से बचाया और चिपको आंदोलन को नया अर्थ दिया था। हेलंग की घटना ने पूरे उत्तराखंड को जगा दिया। जब पुलिस वालों से बहस करती मंदोदरी और रोती हुई उनकी बहू को वीडियो में देखा गया, तो आक्रोश स्वाभाविक था।
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A day in Nainital: natural beauty of mountains and governments indifference towards water, forest, land
नैनीताल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विगत एक सितंबर उत्तराखंड और नैनीताल के इतिहास में एक यादगार दिन बना, जब विभिन्न जिलों से आकर सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने हेलंग की घटना के विरोध में प्रदर्शन किया। ऐसे अनेक दिन इस शहर के नाम हैं। हेलंग गांव कर्णप्रयाग-बद्रीनाथ मार्ग पर जोशीमठ से कुछ पहले उर्गम घाटी के प्रवेश द्वार पर है। पास में कल्पगंगा-अलकनंदा का संगम है। 1990 के बाद विष्णुप्रयाग परियोजना के साथ अलकनंदा, उसकी सहायक नदियों तथा पास के ग्रामीणों के दुर्दिन शुरू हुए। यह निजी हाथों में पहली परियोजना थी। इसके सुरंग पर स्थित चांई गांव ध्वस्त हुआ। 2013 में विष्णुप्रयाग परियोजना नष्ट हुई। फिर धौली और ऋषिगंगा की बारी आई।



फरवरी, 2021 में तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना की सुरंगों में जान खोने वाले 200 से अधिक श्रमिकों में से अधिकांश के शरीर सुरंगों में ही हैं। इन परियोजनाओं ने अलकनंदा की सहायक नदियों की घाटियों को बहुत बेरहम तरीके से काटने-खोदने के साथ सुरंगबद्ध कर दिया। भूकंपों का डरावना इतिहास अलग से है, पर न पर्यावरण और वन कानूनों का पालन होता है, न आपदा के सामाजिक अनुभवों और कार्यकताओं के सुझावों की ओर योजनाकार ध्यान देते हैं। सुरंगों से आया मलबा ‘डंप जोन्स’ में डाला जा रहा है। स्थानीय लोगों के छोटे से चरागाह और उससे भी छोटी खेती की जमीन पर कंपनियों ने कब्जा कर लिया है या ऐसा मनोविज्ञान रच दिया गया है कि वहां ग्रामीण न जाएं।


हेलंग में यही हुआ। विगत 15 जुलाई को हेलंग गांव की मंदोदरी देवी तीन साथिनों के साथ चरागाह से घास लेकर घर जा रही थी। सड़क पर पुलिस और औद्योगिक सुरक्षा बल के जवानों ने घास छीनकर उन्हें थाने में बिठाया। जबकि महिलाओं के साथ एक छोटी बच्ची भी थी। शराब पीकर शांति भंग करने के आरोप में मंदोदरी देवी और उनकी साथियों का चालान कर उन्हें छोड़ा गया। इस गांव में कंपनी या ठेकेदार की खरीद से बचे ग्रामीणों का जीवन दूभर हो गया है। मंदोदरी और उनकी साथिनों के चरागाह में टीएचडीसी (टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड) ने डंपिंग जोन और फुटबॉल फील्ड के नाम पर घुसना शुरू किया था।

यह वही क्षेत्र है, जहां 26 मार्च, 1974 को गौरा देवी और बहिनों ने रेणी में अपने जंगल को कटने से बचाया और चिपको आंदोलन को नया अर्थ दिया था। हेलंग की घटना ने पूरे उत्तराखंड को जगा दिया। जब पुलिस वालों से बहस करती मंदोदरी और रोती हुई उनकी बहू को वीडियो में देखा गया, तो आक्रोश स्वाभाविक था। इसके खिलाफ एक सितंबर (खटीमा शहादत दिवस) को नैनीताल में प्रदर्शन का निर्णय लिया गया।

हेलंग एकजुटता मंच ने पांच मांगें की हैं। दोषी पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जाय। उत्पीड़ित महिलाओं के खिलाफ अभियान चलाने वाले चमोली के जिलाधिकारी को उनके पद से हटाया जाय। वन पंचायत नियमावली तथा वनाधिकार कानून उल्लंघन कर दी गई स्वीकृति रद्द की जाए, इस आधार पर पेड़ काटने वालों पर कार्रवाई की जाए। टीएचडीसी के विरुद्ध नदी में मलबा डालने और पेड़ काटने का मुकदमा चलाया जाय। ऐसी परियोजनाओं की जनभागीदारी से मॉनीटरिंग हो और हेलंग प्रकरण की उच्च न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश से जांच कराई जाए। 

नैनीताल प्रदर्शन के बैनर जल, जंगल, जमीन, शिक्षा तथा स्वास्थ्य के साथ भ्रष्टाचार और सरकारों की नाकामी को उजागर करते थे। सरकार द्वारा इस मामले में गंभीरता से कार्रवाई न करना दुखद और निराशा भरा है। देर रात जब प्रदर्शनकारी लौट रहे थे, तब अल्मोड़ा जिले के सल्ट क्षेत्र में दलित युवक और राजनीतिक कार्यकर्ता की नृशंस हत्या कर दी गई, जिसने एक सवर्ण युवती से शादी की थी। उत्तराखंड की स्थिति का यह दूसरा कोण है। जाति का घमंड इस समाज को कभी पूरी तरह लड़ाकू समाज नहीं बनने देता।

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