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आर्थिक संकट के पच्चीस साल बाद

Tue, 19 Jan 2016 07:24 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Tue, 19 Jan 2016 07:24 PM IST
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25 years after economic crisis

यह एक ऐसी खासियत है, जो समकालीन इतिहास को बदल सकती है। अक्सर नेतृत्व की गुणवत्ता के बजाय शासन की लंबी अवधि की पूर्वाग्रहपूर्ण प्रशस्ति गाई जाती है। भारत की आर्थिक वृद्धि पर समकालीन भारतीय लेखन पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के प्रति बहुत कम निष्पक्ष रहा है। जनवरी, 2016 भारतीय इतिहास में एक मील का पत्थर है। इस महीने लाइसेंस राज से मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के 25 वर्ष हो चुके हैं। जनवरी एक और दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है-इसी महीने में शीतयुद्ध कालीन धुंधली रूमानियत से हटने और विदेशी संबंधों में गुटनिरपेक्षता से प्रबुद्ध व्यावहारिकता की तरफ पहला कदम बढ़ाया गया था। और यह रणनीतिक बदलाव सदाबहार युवा तुर्क, प्रखर समाजवादी और बेहद मुंहफट चंद्रशेखर के कारण हुआ था।

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इस बदलाव की सराहना करने के लिए जनवरी, 1991 की घटनाओं पर एक बार फिर से विचार करना प्रासंगिक होगा। आर्थिक संकट किसी से छिपा नहीं था। तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने दिसंबर,1989 में दुनिया के सामने खजाना खाली होने की घोषणा की थी। नवंबर,1990 में जब चंद्रशेखर ने पदभार संभाला, तो भारत की माली हालत खराब थी। भारत के पास मुश्किल से सप्ताह भर के आयात के लिए कोष था, प्रवासी भारतीय अपना डॉलर खींच रहे थे, मुद्रास्फीति तेजी से बढ़ रही थी और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर मात्र एक फीसदी थी। भारत के संकटमोचक-यशवंत सिन्हा, रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर एस वेंकटरमणन, डॉ सी रंगराजन, गोपी अरोड़ा और दीपक नैय्यर संसाधन बढ़ाने के लिए जूझ रहे थे। अंतरराष्ट्रीय भुगतान, खासकर कच्चे तेल के आयात के लिए भारत को डॉलर की जरूरत थी। अर्थव्यवस्था की झाड़-फूंक करने वालों ने चंद्रशेखर को डिफॉल्ट (दिवालिया) होने की सलाह दी। चंद्रशेखर शब्दों के सम्मान की कीमत समझते थे। गंगा के मैदानी क्षेत्र की नैतिकता रघुकुल रीति से निर्धारित होती है-प्राण जाए पर वचन न जाए।
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एक ऐसी राजनीतिक अर्थव्यवस्था में, जहां कोई भी सरकार आर्थिक संकट को कभी स्वीकार नहीं करती है, चंद्रशेखर ने घोषणा की कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से राहत की गुहार लगाएंगे, ताकि अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सकें। राहत पैकेज मंजूर होना आसान नहीं था। आईएमएफ में जिस तरह से राहत मंजूर करने के लिए वोटिंग होती है, उसमें भारत को अमेरिका के समर्थन की दरकार थी। भारत का तब अमेरिका के साथ उतना सौहार्दपूर्ण रिश्ता नहीं था। अमेरिका उस समय कुवैत से इराक को खदेड़ने के लिए खाड़ी युद्ध की तैयारी कर रहा था और चाहता था कि भारत फिलीपींस से उड़ान भरने वाले उसके युद्धक विमान को अपने यहां ईंधन लेने की अनुमति दे।
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चंद्रशेखर समझ गए कि भारत के सामने दो विकल्प थे-या तो वह मौके का फायदा उठाए और रणनीतिक बदलाव करे या दिवालिया होने की बदनामी झेले। उन्होंने दूसरे लोगों से पहले यह समझ लिया कि बर्लिन की दीवार गिरने और सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरण में काफी बदलाव आ गया है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी बदलेगा।

चंद्रशेखर ने तत्कालीन कानून एवं वाणिज्य मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी से कहा कि वह अपने संपर्कों का इस्तेमाल करें। चार जनवरी को स्वामी ने इसका फायदा उठाया और आईएमएफ में भारत को अमेरिकी समर्थन सुनिश्चित किया। चंद्रशेखर ने न केवल अमेरिकी युद्धक विमानों को भारत में ईंधन लेने की अनुमति दी, बल्कि इराक को कुवैत से निकल जाने की बात कहते हुए इस्राइल पर हमले की निंदा भी की। 18 जनवरी, 1991 को आईएमएफ की एक विशेष बैठक हुई। तब वाशिंगटन में दिन के तीन बज रहे थे। भारतीय प्रतिनिधि गोपी के अरोड़ा ने 30 से ज्यादा प्रतिनिधियों के भारतीय अर्थव्यवस्था से संबंधित सवालों का सामना किया और अच्छे इरादों के बारे में बताया। भारतीय समय के अनुसार सुबह के तीन बजे राहत पैकेज की पहली किस्त मंजूर की गई। इस राहत के साथ भारत को एक और वचन देना पड़ा, कि वह लाइसेंस राज खत्म करेगा और अर्थव्यवस्था का उदारीकरण करेगा।

इस एक महीने में भारत ने दो प्रतिज्ञाओं-सरकारी अर्थव्यवस्था में भरोसा और गुटनिरपेक्षता को तोड़ दिया। दोनों कांग्रेस के शासन की प्रतिज्ञाएं थीं। याद कीजिए कि मात्र 52 सांसदों वाली चंद्रशेखर की सरकार कांग्रेस के समर्थन पर टिकी थी, फिर भी उसने आर्थिक नीति और विदेशी रिश्ते से संबंधित कांग्रेस की पारंपरिक नीति को चुनौती दी। यह भी गौरतलब है कि परिवर्तन का यह वायदा उस चंद्रशेखर के शासन में हुआ, जो प्रखर समाजवादी थे और जिन्होंने 1960 के दशक में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए संघर्ष की अगुवाई की थी।

बाद की सरकारों ने सुधारों को पेश किया, जो अनिवार्य रूप से संकट प्रेरित थे-रणनीतिक लाभ और जरूरी राहत के लिए। यह सही है कि साठ के दशक में बी आर शेनॉय, सत्तर के दशक में टीएन श्रीनिवासन और जगदीश भगवती से लेकर अस्सी के दशक में विजय केलकर, मोंटेक सिंह अहलुवालिया और राजीव कुमार ने सरकारी नियंत्रण खत्म करने की वकालत की थी। लेकिन परिवर्तन के लिए संकट और चंद्रशेखर सरीखे साहसी नेतृत्व की जरूरत होती है।


जनवरी, 2016 में इसका जिक्र शिक्षाप्रद है, क्योंकि देश की अभी की करीब आधी आबादी का 1991 में जन्म नहीं हुआ था। वे शायद ही यह जानते होंगे कि भारत कभी सरकारी कतारों में अटक गया था, देश दिवालिया होने के कगार पर एक अभूतपूर्व संकट में फंस गया था। यदि इतिहास को नहीं दोहराना है, तो संकट के समय के निर्णायक राजनीतिक नेतृत्व को अवश्य याद किया जाना चाहिए। लेकिन त्रासदी यह है कि मुक्त अर्थव्यवस्था और विदेशी रिश्तों से संबंधित समकालीन भारत के तमाम लेखन में चंद्रशेखर को उनकी बुद्धिमत्ता और राजनीतिक साहस का वाजिब श्रेय नहीं दिया गया है।

-वरिष्ठ पत्रकार और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक

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