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साल 2024: पाकिस्तान में कल भी बीते कल जैसा, पड़ोस में पत्रकारों की कुछ कड़वी यादें
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पाकिस्तान सुरक्षा बल (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो :
ANI
विस्तार
चाहे युद्ध का वक्त हो या शांति का, दुनिया भर की प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए पत्रकारिता एक जानलेवा पेशा बन गया है। अपने काम के दौरान मारे जाते हैं, वे अपने पीछे एक विरासत छोड़ जाते हैं। इसके बावजूद अब तक न तो लोगों को इस खतरनाक पेशे को छोड़ते देखा गया है, और न ही नए लोगों में इसके प्रति अनिच्छा देखी गई है। हर मौत के साथ मुझे यह देखकर हैरत होती है कि नए युवा बगैर डरे पत्रकारिता के पेशे को अपना रहे हैं।
जैसे-जैसे वर्ष 2024 का सूरज ढल रहा है, पाकिस्तानी पत्रकारों के लिए यह वर्ष घातक और कड़वी यादें छोड़कर जा रहा है और आने वाले वर्ष 2025 में भी उनके लिए कोई उम्मीद की रोशनी नहीं दिखती है। दरअसल, पाकिस्तान में पत्रकार होना ही अपने आप में एक सजा है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान की ओर से दुनिया भर में मारे गए पत्रकारों की जो सूची जारी की गई, उसे देखकर हैरानी हुई कि गाजा के बाद सबसे ज्यादा मारे गए पत्रकारों की संख्या पाकिस्तान में थी। गाजा के हालात को तो फिर भी समझा जा सकता है। वहां युद्ध चल रहा है। लेकिन पाकिस्तान में क्या बहाना है, जहां 2024 में अब तक आठ पत्रकार मारे जा चुके हैं। वहां न तो युद्ध चल रहा है, न ही अशांति और न ही ये आठों पत्रकार किसी सैन्य अभियान या आतंकी हमले को कवर कर रहे थे।
न केवल पाकिस्तानी पत्रकारों, बल्कि दुनिया भर के मीडिया पेशेवरों का समर्थक एक संगठन है, कमिटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे), जो दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है। गर्मियों में खैबर पख्तूनख्वा के नौशेरा में जब चालीस वर्षीय पाकिस्तानी पत्रकार मलिक हसन जैब की हत्या कर दी गई, तो इसके विरोध में सीपीजे के प्रोग्राम डायरेक्टर कार्लोस मार्टिनेज डी ला सेर्ना ने पाकिस्तानी सरकार को चेतावनी दी। उन्होंने सरकार से कहा, ‘पाकिस्तान में तत्काल इस तरह की हिंसाओं पर रोक लगाई जाए और मलिक हसन जैब के हत्यारों को पकड़ा जाए। पत्रकारों के हमलावरों को छूट मिलने से पाकिस्तान में भय का माहौल है, जो पत्रकारों को स्वतंत्र पत्रकारिता करने से रोकता है।’
आप सवाल कर सकते हैं कि पाकिस्तानी पत्रकारों को क्यों मारा जा रहा है? इसका जवाब एकदम स्पष्ट है। पहला उनकी हत्या की कोई जिम्मेदारी नहीं लेता और कई पत्रकार अपनी बहादुरी भरी रिपोर्टिंग के कारण मारे जाते हैं। कई रिपोर्टों में आरोप लगाए गए हैं कि पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसियां उनकी आलोचना करने वाले पत्रकारों पर हमले करवाती हैं। यही नहीं, प्रभावशाली लोगों और राजनेताओं पर भी उनके क्षेत्रों में पुलिस के साथ मिलकर पत्रकारों को निशाना बनाने के आरोप लगाए जाते हैं। पत्रकारों के खिलाफ हो रही हिंसा को रोकने और इसमें संलिप्त सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जांच करवाने की आवाजें उठ रही हैं, लेकिन पाकिस्तानी सरकार मीडिया समुदाय के इस आक्रोश को अनदेखा कर रही है।
कई बार इस्लामाबाद में राजनयिक समुदाय की ओर से पत्रकारों की परेशानियों को लेकर सार्वजनिक रूप से ट्वीट किए गए हैं। हाल ही में एक वी-ब्लॉगर, जो पीटीआई के राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या को लेकर खोजी वीडियो बना रहा था, सुरक्षा बलों ने उसका अपहरण कर लिया और उसके कब्जे से ड्रग की बरामदगी बता दी, जबकि वह बेचारा गरीब पत्रकार सिगरेट भी नहीं पीता है। यूरोपीय संघ की राजदूत राइना कियोनका ने सरकार को भी चौंका दिया, जब उन्होंने ट्वीट के जरिये यह जानकारी मांगी कि पत्रकार कहां है। राजदूत कियोनका 28 यूरोपीय राजधानियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, इसलिए यह केवल एक आवाज नहीं थी। उन्होंने सरकार को याद दिलाया कि पाकिस्तान जीएसपी+ (यूरोपीय संघ की जनरलाइज्ड स्कीम ऑफ प्रेफरेंस प्लस) का हिस्सा है, जो पाकिस्तान को बड़े व्यापार लाभ प्रदान करता है। इन लाभों को लेने के लिए कई शर्तें हैं, मीडिया की स्वतंत्रता भी उनमें से एक है।
सोशल मीडिया पाकिस्तानी मीडिया के लिए बहुत बड़ा स्रोत है और इस मामले में यूरोपीय संघ की राजदूत का ट्वीट वायरल हो गया, जिससे गायब पत्रकार के लिए बड़ा समर्थन मिला। उसे बड़ी मुश्किल से छुड़ाया गया। अब वह ‘आतंकवाद के आरोप’ में जमानत पर है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा प्रकाशित इस वर्ष के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में पाकिस्तान दो स्थान नीचे गिरकर 180 देशों में से 152वें नंबर पर पहुंच गया है। सूचकांक में पाकिस्तान को दुनिया में पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश बताया गया है, जहां हर साल तीन से चार हत्याएं होती हैं। पत्रकारों की स्वतंत्रता की वकालत करने वाले इस्लामाबाद स्थित फ्रीडम नेटवर्क की हालिया रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान में 2012 से 2022 के बीच 53 पत्रकार मारे गए। इनमें सर्वाधिक 16 हत्याएं दक्षिणी सिंध प्रांत में और 14 पंजाब प्रांत में हुईं। इन 53 में से सिर्फ दो मामलों में दोषसिद्ध हुआ, लेकिन उन्हें भी बाद में पलट दिया गया। वहीं, 96 फीसदी मामलों में न्याय प्रणाली न्याय देने में विफल रही।
पाकिस्तान में 2024 का अंत फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफआईए) द्वारा 24 नवंबर को पीटीआई के विरोध प्रदर्शन को कवर करने वाले अनेक पत्रकारों और ब्लॉगरों पर कानूनी कार्रवाई के साथ हो रहा है, जिसमें उनके खिलाफ इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम अधिनियम (पीईसीए) के तहत मुकदमे दर्ज किए गए हैं। यह और कुछ नहीं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने का प्रयास है, क्योंकि पत्रकारों को राजनीतिक घटनाक्रमों की रिपोर्ट करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। अंग्रेजी दैनिक द डॉन ने जरूर पत्रकारों का तगड़ा समर्थन किया है, जिसने कहा कि यह कानून लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास को खत्म करता है तथा पत्रकारों और नागरिकों के लिए समान रूप से भय का माहौल निर्मित करता है। ‘पाकिस्तान के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए जोशपूर्ण, निडर प्रेस की जरूरत है, जो बिना किसी मुकदमे के डर के रिपोर्टिंग कर सके और पीईसीए के अंकुश को भी खत्म होना चाहिए।’