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सन 67 की अलख ज्योति जलाए रखें

Sat, 04 Jul 2020 10:05 AM IST
pradeep kumar प्रदीप कुमार
Updated Sat, 04 Jul 2020 10:05 AM IST
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1962 india china war, sino indian war 1962
1962 india china war: sino indian war 1962 - फोटो : social media

भारत को आए दिन 1962 की याद दिलाने वाला चीन खुद 58 साल पहले के हालात से जरूरी सबक नहीं सीख पा रहा। किसी भी देश को विजय या पराजय की ओर ले जाने में एक बड़ा निर्णायक तत्व होता है उसके नेतृत्व की गुणवत्ता। ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकत के खिलाफ महात्मा गांधी, उनके शीर्ष सहयोगियों-जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य ने विराट जनांदोलन खड़ा करने की प्रक्रिया में लाठियां खाई थीं, जेलें भरी थीं और ब्रिटिश सत्ता को बार-बार लुंज-पुंज किया था।


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इन नेताओं की अखिल भारतीय पार्टी, कांग्रेस अहिंसक आंदोलनों की अभ्यस्त थी। उसके पास लाखों लोगों को सड़कों पर लाने की क्षमता तो थी, मगर सामरिक चिंतन नहीं था। अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे ज्यादा समझ रखने वाले नेहरू शह-मात का खेल खेलने में दक्ष नहीं थे। 1962 में यह था भारत का नेतृत्व। द्वितीय विश्व युद्ध में भाग ले चुके फौजी अफसरों की भूमिका भी निराशाजनक रही।

देखते हैं, चीन का नेतृत्व कैसा था। माओ त्से तुंग, चाउ एन लाइ, लिव शाओ ची, लिन पियाव, चू तेह और अन्य नेता कई युद्धों की भट्ठी से तप कर निकले थे। कम्युनिस्ट पार्टी और सेना, दोनों का वे कुशल नेतृत्व करते थे। मार्शल चियांग काई शेक की नौ लाख की सेना से भिड़ना उन्हें आता था।

अपने समय की सबसे ताकतवर, जापानी फौजी मशीन से भी उन्होंने हार नहीं मानी थी। यही वह नेतृत्व था, जो 1950 में कोरिया के मैदान में कूद पड़ा था। बहुत बाद में ज्ञात हुआ कि कोरिया में अपने सामरिक उद्देश्य पूरे कर पाने में विफल अमेरिका ने चीन पर एटम बम छोड़ने की योजना बना ली थी।

लेकिन माओ को तो पहले ही यकीन हो चुका था कि 'साम्राज्यवाद कागजी शेर' है। इस नेतृत्व ने 1962 में भारत पर हमला किया था। 2020 में दोनों देशों का नेतृत्व बुनियादी तौर पर बदला हुआ है। चीन में युद्धों में तपे-तपाए नेताओं की पीढ़ी कब की जा चुकी है। चीन में पूंजीवाद आया है, तो उसके साथ ही पूंजीवादी शासन से पैदा होने वाली बुराइयां भी। कम्युनिस्ट पार्टी और शासन के कई वरिष्ठ अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जा चुके हैं। मार्क्सवादी-लेनिनवादी शब्दावली में कहें, तो आज के चीनी नेताओं का वर्ग चरित्र माओकालीन नेताओं से भिन्न है।

कुल मिलाकर वे नौकरशाह हैं। 1962 आते-आते नेहरू के साथ कांग्रेस भी थकने लगी थी। भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवाद के शेर की सवारी करके सत्ता में आई है। संघ परिवार की समग्र शक्ति मोदी के पीछे है। सेना की स्थिति क्या है? माओ के जुझारू सैनिकों के पास खोने को बहुत कुछ नहीं था। वे उबले चावल खाकर लड़ा करते थे। आज का चीनी सैनिक सुविधाओं का आदी है। उसे दुनिया की सबसे बड़ी सेना और आधुनिक सैन्य तंत्र पर भी गुमान होगा।

लेकिन युद्ध में विजय के लिए सिर्फ उतना काफी नहीं होता। अगर यही होता, तो अफगानिस्तान से सोवियत संघ की विश्व-चर्चित लाल सेना को पलायन न करना पड़ता और अब अमेरिका वहीं से निकलने के लिए छटपटाता नहीं। 1979 में वियतनाम पर हमले के बाद चीन की सेना ने कोई जंग नहीं लड़ी है। भारतीय सेना 1962 के बाद 1965, 1971 और कारगिल की जंगें फतह कर चुकी है। ऊंची-ऊंची पहाड़ियों पर अनवरत युद्धों और सैनिक कार्रवाइयों का दुर्लभ अनुभव दुनिया में केवल भारतीय सेना को प्राप्त है। भारतीय सेना 1962 के राष्ट्रीय अपमान के एक अजेय अस्त्र से लैस है। ट्रेनिंग के दौरान 1962 की पढ़ाई अच्छी तरह करने वाले अफसर सीमा पर तैनात हैं। वे उस अपमान को धोने के लिए भी लड़ेंगे।

विस्तारवाद और युद्धोन्माद में सराबोर चीन से पेश आते समय हमें 1967 के इतिहास को अपनी राष्ट्रीय स्मृति में अमर स्थान देना चाहिए। भारत के राजनीतिक नेतृत्व और मनःस्थिति में आए परिवर्तन के निहितार्थ को समझने में चीन चूक कर गया, हालांकि इंदिरा गांधी 1962 में युद्ध के दौरान सेना और जनता का मनोबल बढ़ाने के लिए अपने पिता नेहरू और सुरक्षा बलों की अवहेलना कर तेजपुर तक पहुंच गई थीं। प्रधानमंत्री के नाते इन्हीं इंदिरा गांधी ने विद्रोहियों का दमन करने के लिए ऐजल पर बमबारी करवा दी थी।

1967 में चीन सिलीगुड़ी गलियारे तक पहुंचने के लिए सिक्किम में नाथू ला और  चो ला पर कब्जा करना चाहता था। भारतीय सेना ने नाथू ला की लड़ाई में चीन के 340 सैनिकों को हलाक कर चीनी सेना को तीन किलोमीटर पीछे धकेल दिया था। हमारे 89 सैनिक शहीद हुए थे। चो ला में चीन के 35 सैनिक मारे गए थे और भारत के 15 शहीद हुए थे। नाथू ला और चो ला की विजय ने चीन को कई वर्षों तक शांत रहने के लिए मजबूर कर दिया था। 1962 की पराजित सेना अब नए अवतार में आ चुकी थी। बारूद की गंध से जिनके दिल बैठने लगते हैं, उनकी पलायनवादी आवाजें भी सुनाई पड़ने लगी हैं। बेशक युद्ध तबाही लाता है। आर्थिक विकास अवरुद्ध होता है।

सैनिक हताहत होते हैं। लेकिन जब युद्ध थोपा जाए, जमीन हथियाई जाए और नाजी जर्मनी की तरह नई-नई मांगों के साथ अल्टीमेटम दिए जाएं, तो आप क्या करेंगे? मुल्क की इज्जत बचाने के लिए मुंहतोड़ जवाब देंगे या नहीं? सरकार सार्वजनिक प्रतिबद्धता व्यक्त कर चुकी है कि चीन को मई से पहले की स्थिति बहाल करनी पड़ेगी। सफल युद्ध सिर्फ सरकार और सेना नहीं लड़तीं। राष्ट्र की समस्त जनता लड़ती है। इसलिए पूरे देश को मानसिक तौर पर संकल्पबद्ध करने की जरूरत है।

चीन भारत के माफिक हालात पैदा करे, सेनाएं अप्रैल के अंत वाली रेखा तक लौट जाएं और युद्ध का खतरा दूर हो जाए, तब भी भारत को उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। नेहरू से लेकर मोदी तक भरोसा कई बार किया जा चुका है। अब अगले मोर्चे की तैयारी करनी चाहिए। अगर चीन को यह विश्वास हो जाए कि भारत उसे विजय से वंचित ही नहीं, बल्कि हरा भी सकता है, तो युद्ध की आशंका अपने आप खत्म हो जाएगी। इस समय अंतरराष्ट्रीय शक्ति समीकरण चीन के प्रतिकूल है। लेकिन भारत के इतना अनुकूल भी नहीं कि वह प्रतिरोधक राजनय पर अमल कर सके। कीमत जो भी हो, भारत को भरोसेमंद और प्रतिरोधक शक्ति समीकरण पैदा करने लिए जुटना पड़ेगा।

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