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‘राग दरबारी’ ने प्रकाशन के 50 वर्ष पूरे किए, ऐसे मनाया गया भव्य जश्न
अभियान डेस्क, अमर उजाला
Updated Sun, 25 Mar 2018 04:10 PM IST
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हिंदी साहित्य के पास बहुत कम ही कृतियां ऐसी हैं, जिन्होंने साहित्यिक श्रेष्ठता के साथ ही लोकप्रियता का भी इतिहास रचा हो। लेकिन श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ की प्रतियों को आप आज भी पुस्तक मेलों में, मांग के मुकाबले कम पड़ते देख सकते हैं। अब तक इसकी लगभग पांच लाख से अधिक प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
हालांकि, खुद श्रीलाल जी बताया करते थे कि किस प्रकार लिख लेने के बाद इसे प्रकाशित कराने के लिए उन्हें काफी मुश्किलें उठानी पड़ी थीं, क्योंकि वह सरकारी सेवा में थे। प्रकाशन के बाद इसको लेकर आलोचकों की राय भी बहुत अच्छी नहीं बन सकी थी, लेकिन इस कृति ने जो कीर्तिमान हासिल किए, उनसे ये सारी बातें आज बेमानी-सी लगने लगीं।
‘राग दरबारी’ ने प्रकाशन के 50 वर्ष पूरे किए, तो इसके लेखक के नगर लखनऊ में भव्य जलसा भी हुआ। लेखक-समीक्षक और कुछ दूसरे क्षेत्रों के लोग भी जुटे। राजकमल प्रकाशन और इफको के इस आयोजन में कई सत्रों में चर्चाएं हुईं। कृति के साथ ही राजनीति और शिवपालगंज पर भी सत्र हुए, तो श्रीलाल शुक्ल के संस्मरण भी खूब सुनाए गए।
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वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने ‘राग दरबारी’ की भाषा की बात की और उसे काव्यात्मकता से जोड़ा। एक दूसरे वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी ने कृति को लेकर आरंभ में आई आलोचनाओं की फांस की बात की। उन्होंने कहा कि ‘राग दरबारी’ को भी फिर से पढ़ने और विचार करने की जरूरत है। अच्छी कृति एक नई आलोचना लेकर आती है।
चर्चा में आलोचकों ने कई बातें कीं। वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि इतने वर्षों बाद भी आज ‘राग दरबारी’ की लोकप्रियता का कारण यह है कि श्रीलाल शुक्ल ने संस्थाओं का नहीं, जमीनी स्तर के समाज का व्यंग्य इसमें किया है। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह का कहना था कि आज के समाज में जो भ्रष्टाचार, गबन हो रहा है, उसके सूत्र ‘राग दरबारी’ में मिलते हैं।
उपन्यास में वर्णित भ्रष्टाचार का स्वरूप आज कई गुना बढ़ गया है। बात ‘राग दरबारी’ के गांव शिवपालगंज की भी आई। कथाकार-उपन्यासकार शिवमूर्ति ने कहा कि आज के गांव शिवपालगंज से काफी आगे जा चुके हैं। आज गांवों में किसी को मृत बताकर उसकी संपत्ति हड़प लेना आम बात है।
पत्रकार-लेखक अनिल कुमार यादव ने कहा कि शिवपालगंज की आत्मा कपटी, तिकड़मी गांव की आत्मा थी, लेकिन एक बदलाव यह भी हुआ है कि अब गांव सिकुड़ रहे हैं। श्रीलाल शुक्ल के जीवन और व्यक्तित्व को लेकर कई आत्मीय संस्मरण भी सुनाए गए।
‘तद्भव’ के संपादक अखिलेश ने कहा कि पश्चिमी आधुनिकता के साथ ही खांटी देसी बातें उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थीं और लेखन का भी। उन्होंने कहा कि विरोधाभास श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व को समग्रता देते थे। उनकी शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि थी, लेकिन वे मारधाड़ की मुंबइया फिल्में भी खूब देखते थे।
वंदना मिश्र ने कहा कि वे जीवन को भरपूर ढंग से जीने वाले व्यक्ति थे। उन्हें अक्सर परंपरावादी माना जाता है, लेकिन उनकी पत्नी जब तक स्वस्थ्य थीं, किसी भी कार्यक्रम में उन्हें बिना पत्नी के जाते नहीं देखा गया।
बेटे आशुतोष शुक्ल ने कहा कि पिता अपने व्यंग्य लेखन के लिए चर्चित थे, लेकिन मैंने जीवन में उन्हें कभी किसी पर व्यंग्य करते नहीं देखा। प्रशासनिक अधिकारी मुकेश मेश्राम बताते हैं कि वे जहां भी जिलाधिकारी रहे, पहली बैठक में अधिकारियों से पूछते हैं कि क्या आपने ‘राग दरबारी’ पढ़ा है?
बॉक्स- आज के समाज में जो भ्रष्टाचार, गबन हो रहा है, उसके सूत्र ‘राग दरबारी’ में मिलते हैं।
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हालांकि, खुद श्रीलाल जी बताया करते थे कि किस प्रकार लिख लेने के बाद इसे प्रकाशित कराने के लिए उन्हें काफी मुश्किलें उठानी पड़ी थीं, क्योंकि वह सरकारी सेवा में थे। प्रकाशन के बाद इसको लेकर आलोचकों की राय भी बहुत अच्छी नहीं बन सकी थी, लेकिन इस कृति ने जो कीर्तिमान हासिल किए, उनसे ये सारी बातें आज बेमानी-सी लगने लगीं।
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‘राग दरबारी’ ने प्रकाशन के 50 वर्ष पूरे किए, तो इसके लेखक के नगर लखनऊ में भव्य जलसा भी हुआ। लेखक-समीक्षक और कुछ दूसरे क्षेत्रों के लोग भी जुटे। राजकमल प्रकाशन और इफको के इस आयोजन में कई सत्रों में चर्चाएं हुईं। कृति के साथ ही राजनीति और शिवपालगंज पर भी सत्र हुए, तो श्रीलाल शुक्ल के संस्मरण भी खूब सुनाए गए।
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वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने ‘राग दरबारी’ की भाषा की बात की और उसे काव्यात्मकता से जोड़ा। एक दूसरे वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी ने कृति को लेकर आरंभ में आई आलोचनाओं की फांस की बात की। उन्होंने कहा कि ‘राग दरबारी’ को भी फिर से पढ़ने और विचार करने की जरूरत है। अच्छी कृति एक नई आलोचना लेकर आती है।
चर्चा में आलोचकों ने कई बातें कीं। वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि इतने वर्षों बाद भी आज ‘राग दरबारी’ की लोकप्रियता का कारण यह है कि श्रीलाल शुक्ल ने संस्थाओं का नहीं, जमीनी स्तर के समाज का व्यंग्य इसमें किया है। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह का कहना था कि आज के समाज में जो भ्रष्टाचार, गबन हो रहा है, उसके सूत्र ‘राग दरबारी’ में मिलते हैं।
उपन्यास में वर्णित भ्रष्टाचार का स्वरूप आज कई गुना बढ़ गया है। बात ‘राग दरबारी’ के गांव शिवपालगंज की भी आई। कथाकार-उपन्यासकार शिवमूर्ति ने कहा कि आज के गांव शिवपालगंज से काफी आगे जा चुके हैं। आज गांवों में किसी को मृत बताकर उसकी संपत्ति हड़प लेना आम बात है।
पत्रकार-लेखक अनिल कुमार यादव ने कहा कि शिवपालगंज की आत्मा कपटी, तिकड़मी गांव की आत्मा थी, लेकिन एक बदलाव यह भी हुआ है कि अब गांव सिकुड़ रहे हैं। श्रीलाल शुक्ल के जीवन और व्यक्तित्व को लेकर कई आत्मीय संस्मरण भी सुनाए गए।
‘तद्भव’ के संपादक अखिलेश ने कहा कि पश्चिमी आधुनिकता के साथ ही खांटी देसी बातें उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थीं और लेखन का भी। उन्होंने कहा कि विरोधाभास श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व को समग्रता देते थे। उनकी शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि थी, लेकिन वे मारधाड़ की मुंबइया फिल्में भी खूब देखते थे।
वंदना मिश्र ने कहा कि वे जीवन को भरपूर ढंग से जीने वाले व्यक्ति थे। उन्हें अक्सर परंपरावादी माना जाता है, लेकिन उनकी पत्नी जब तक स्वस्थ्य थीं, किसी भी कार्यक्रम में उन्हें बिना पत्नी के जाते नहीं देखा गया।
बेटे आशुतोष शुक्ल ने कहा कि पिता अपने व्यंग्य लेखन के लिए चर्चित थे, लेकिन मैंने जीवन में उन्हें कभी किसी पर व्यंग्य करते नहीं देखा। प्रशासनिक अधिकारी मुकेश मेश्राम बताते हैं कि वे जहां भी जिलाधिकारी रहे, पहली बैठक में अधिकारियों से पूछते हैं कि क्या आपने ‘राग दरबारी’ पढ़ा है?
बॉक्स- आज के समाज में जो भ्रष्टाचार, गबन हो रहा है, उसके सूत्र ‘राग दरबारी’ में मिलते हैं।