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युवा पीढ़ी को पेड़-पौधों और चिड़ियों से जोड़ा - श्रीमन नारायणन
Fri, 17 May 2019 01:40 PM IST
दीपाली अग्रवाल
अमर उजाला साहित्य डेस्क, नई दिल्ली
अमर उजाला साहित्य डेस्क, नई दिल्ली
Published by: दीपाली अग्रवाल
Updated Fri, 17 May 2019 01:40 PM IST
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जब भी मैं अपनी आंखें बंद करता हूं, मेरे सामने बचपन के वे दिन सामने आ जाते हैं, जब सुबह पक्षियों के कलरव से मेरी आंखें खुलती थीं। और नाश्ते के समय मां के साथ मैं गोरैयों और दूसरे पक्षियों को रोटी के टुकड़े और फल खिलाता था। मैं गांव के बजाय शहर में पला-बढ़ा। इसके बावजूद पेड़-पौधे और पक्षियों से बचपन से ही मेरा जिस तरह जुड़ाव रहा, उसके लिए मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं, क्योंकि आज प्रकृति के वे दृश्य शहरों और कस्बों में तो नहीं दिखते।
अजीब संयोग है कि शहरों में अपना पूरा जीवन बिता चुकने के बाद बुढ़ापे में मैं गांव में रहने लगा हूं। मैं केरल में एर्नाकुलम जिले के मुपथ्थाडम गांव में रहता हूं। यह वही गांव है, जिसे छोड़कर मेरे पिता शहर चले गए थे। मैं जब इस गांव में आया था, तो यहां वैसी हरियाली नहीं दिखी, जैसी केरल के गांवों में अमूमन दिखती है। यहां तक कि गांव में पानी के सोते भी कम हैं। जो बात मुझे खटकी, वह यह कि हरियाली और पानी के अभाव में पक्षियां मेरे गांव में आते ही नहीं थे।
बचपन में परिवार के साथ जब गांव आता था, तो एक-दो तालाबों के अलावा थोड़ी दूर पर एक छोटी-सी नदी भी थी। आज पानी के वे सारे स्रोत सूख चुके हैं। गांव में बसने के साथ ही मैंने कुछ अनूठा करने के बारे में सोचा। मैंने दस हजार पौधे खरीदकर पूरे गांव में बंटवा दिए। मैंने गांव के युवाओं को मेरे अभियान से जोड़ लिया है उनके साथ पूरे गांव में घूम-घूमकर मैंने पौधे लगवाए और इसकी भी व्यवस्था की कि उन पौधों को लगातार पानी मिलता रहे। मेरे तीन बेटे हैं, जो नौकरी करते हैं और शहर में रहते हैं।
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नौकरी से रिटायर होने के बाद मेरा अपना रेस्टोरेंट और लॉटरी का व्यवसाय है, जिससे पर्याप्त आमदनी हो जाती है। चूंकि बेटों की जिम्मेदारी मैंने पूरी कर दी है, इसलिए अपने अभियान में मुझे पैसे की कमी नहीं होती। उल्टे जिन युवाओं को मैंने अपने साथ जोड़ा है, उनमें से कुछ की मैं आर्थिक सहायता करता रहता हूं।
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अजीब संयोग है कि शहरों में अपना पूरा जीवन बिता चुकने के बाद बुढ़ापे में मैं गांव में रहने लगा हूं। मैं केरल में एर्नाकुलम जिले के मुपथ्थाडम गांव में रहता हूं। यह वही गांव है, जिसे छोड़कर मेरे पिता शहर चले गए थे। मैं जब इस गांव में आया था, तो यहां वैसी हरियाली नहीं दिखी, जैसी केरल के गांवों में अमूमन दिखती है। यहां तक कि गांव में पानी के सोते भी कम हैं। जो बात मुझे खटकी, वह यह कि हरियाली और पानी के अभाव में पक्षियां मेरे गांव में आते ही नहीं थे।
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बचपन में परिवार के साथ जब गांव आता था, तो एक-दो तालाबों के अलावा थोड़ी दूर पर एक छोटी-सी नदी भी थी। आज पानी के वे सारे स्रोत सूख चुके हैं। गांव में बसने के साथ ही मैंने कुछ अनूठा करने के बारे में सोचा। मैंने दस हजार पौधे खरीदकर पूरे गांव में बंटवा दिए। मैंने गांव के युवाओं को मेरे अभियान से जोड़ लिया है उनके साथ पूरे गांव में घूम-घूमकर मैंने पौधे लगवाए और इसकी भी व्यवस्था की कि उन पौधों को लगातार पानी मिलता रहे। मेरे तीन बेटे हैं, जो नौकरी करते हैं और शहर में रहते हैं।
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नौकरी से रिटायर होने के बाद मेरा अपना रेस्टोरेंट और लॉटरी का व्यवसाय है, जिससे पर्याप्त आमदनी हो जाती है। चूंकि बेटों की जिम्मेदारी मैंने पूरी कर दी है, इसलिए अपने अभियान में मुझे पैसे की कमी नहीं होती। उल्टे जिन युवाओं को मैंने अपने साथ जोड़ा है, उनमें से कुछ की मैं आर्थिक सहायता करता रहता हूं।
चूंकि बेटों की जिम्मेदारी मैंने पूरी कर दी है, इसलिए अपने अभियान में मुझे पैसे की कमी नहीं होती। उल्टे जिन युवाओं को मैंने अपने साथ जोड़ा है, उनमें से कुछ की मैं आर्थिक सहायता करता रहता हूं। चूंकि प्राकृतिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना बड़ा काम है, इसलिए गर्मियों में पक्षियों को पानी पिलाने के लिए मैंने काम शुरू किया। इसके तहत मैंने कुल दस हजार से भी अधिक मिट्टी के बर्तन खरीदे।
फिर अपने गांव में अलग-अलग उन बर्तनों को रखने के अलावा मैंने शहरों की सोसाइटियों में भी वे बर्तन बांटे। मैंने यह अभियान पूरे जिले में फैलाया, जिसमें मेरे कई लाख रुपये खर्च हुए। गांवों में रखे गए कुछ बर्तन तो इतने बड़े हैं कि उनमें सौ चिड़ियां एक साथ पानी पी सकती हैं। जिले के सभी गांवों में मैंने युवाओं को वॉलंटियर्स तैनात किया है, जो नियमित रूप से पौधों और पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करते हैं।
चूंकि यह पर्यावरण से जुड़ा काम है, इसलिए सभी जगहों में मेरे इस अभियान को भरपूर समर्थन मिला है। अनेक महिलाएं और बुजुर्ग खुशी-खुशी यह काम एक मिशन के तहत करते हैं। हाल ही में मैंने पूरे जिले में पचास हजार पौधे बांटें हैं। मेरे गांव में अब सुबह से ही पक्षियों का कलरव सुनाई पड़ता है सघन पौधरोपण के कारण हरियाली भी खूब दिखने लगी है। जल्दी ही मैं गांव के दो पुराने तालाबों के जीर्णद्धार का काम शुरू करने वाला हूं, जिसमें स्थानीय लोगों के साथ-साथ जिला प्रशासन ने भी सहयोग करने का आश्वासन दिया है।
- विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
फिर अपने गांव में अलग-अलग उन बर्तनों को रखने के अलावा मैंने शहरों की सोसाइटियों में भी वे बर्तन बांटे। मैंने यह अभियान पूरे जिले में फैलाया, जिसमें मेरे कई लाख रुपये खर्च हुए। गांवों में रखे गए कुछ बर्तन तो इतने बड़े हैं कि उनमें सौ चिड़ियां एक साथ पानी पी सकती हैं। जिले के सभी गांवों में मैंने युवाओं को वॉलंटियर्स तैनात किया है, जो नियमित रूप से पौधों और पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करते हैं।
चूंकि यह पर्यावरण से जुड़ा काम है, इसलिए सभी जगहों में मेरे इस अभियान को भरपूर समर्थन मिला है। अनेक महिलाएं और बुजुर्ग खुशी-खुशी यह काम एक मिशन के तहत करते हैं। हाल ही में मैंने पूरे जिले में पचास हजार पौधे बांटें हैं। मेरे गांव में अब सुबह से ही पक्षियों का कलरव सुनाई पड़ता है सघन पौधरोपण के कारण हरियाली भी खूब दिखने लगी है। जल्दी ही मैं गांव के दो पुराने तालाबों के जीर्णद्धार का काम शुरू करने वाला हूं, जिसमें स्थानीय लोगों के साथ-साथ जिला प्रशासन ने भी सहयोग करने का आश्वासन दिया है।
- विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।