'ईश्वर ने मुझे हमेशा सच कहने का साहस दिया'

रोजा पार्क्स Updated Thu, 08 Mar 2018 04:51 AM IST
Rosa Parks
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जब मैं छोटी थी, तो मैं यह नहीं समझ पाती थी कि अश्वेत लोगों के साथ ठीक से व्यवहार क्यों नहीं किया जाता है। पर जब मुझे इसके बारे में पता चला, तो मेरे मन में आक्रोश पैदा हुआ। मुझे वे लोग अच्छे नहीं लगते, जो जाति या नस्ल के कारण दूसरों से घृणा करते हैं। सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार करना ही जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव दूर करने का तरीका है।
गुलामी की प्रथा खत्म होने के बाद मेरा जन्म हुआ और मुझे पढ़ने-लिखने की आजादी थी। मेरी मां एक शिक्षिका थीं और वही मुझे बचपन में पढ़ाती थीं। साल में पांच महीने ही हम स्कूल जाते थे, बाकी समय हमें खेतों पर काम करना पड़ता था। जब मेरी दादी बीमार पड़ी, तो मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा।

उनकी मृत्यु के बाद मेरी मां बीमार हो गईं,तो फिर मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। मैंने हाई स्कूल की पढ़ाई शादी होने के बाद पूरी की। एक बार जब मैं बस में यात्रा कर रही थी, तो मुझे श्वेत व्यक्ति के लिए सीट छोड़ने के लिए कहा गया, लेकिन मैंने इन्कार कर दिया। नतीजतन मुझे गिरफ्तार कर लिया गया।

लेकिन मेरे इस विरोध ने अन्य लोगों को अन्याय और भेदभाव का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। लोगों को अपने दिमाग से नस्लीय पूर्वाग्रह को निकाल देना चाहिए और स्वतंत्रता व समानता के मूल्यों में विश्वास करना चाहिए। ईश्वर ने मुझे हमेशा यह साहस दिया कि मैं कह सकूं कि सच क्या है। हम इस धरती पर मिल-जुलकर रहने और दुनिया को और सुंदर बनाने के लिए हैं, ताकि सभी स्वतंत्रता का आनंद ले सकें। मैं सबके लिए स्वतंत्रता, समानता, न्याय और समृद्धि की पक्षधर हूं।
-अमेरिकी नागरिक अधिकार कार्यकर्ता

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