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चिट्ठियां: अपने तन, मन और धन के साधन

Sun, 04 Feb 2018 02:46 PM IST
अभियान डेस्क/ अमर उजाला
अभियान डेस्क/ अमर उजाला Updated Sun, 04 Feb 2018 02:46 PM IST
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Readers views- Rule of our society and rule of government
चिट्ठी 1- इस बजट में आम आदमी कहां?
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बजट भाषण देश के नाम एक संदेश भी है। इस संदेश से लोगों को यह भी पता चलता है कि सरकार की सोच क्या है? लेकिन 2018 के बजट से सरकार की मंशा नौकरीपेशा लोगों के दिल तक नहीं पहुंच पाई। भले ही आर्थिक विशेषज्ञ बजट को संतुलित बता रहे हों, लेकिन एक सामान्य आदमी बजट में कहां है?

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ‘बजट में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए अच्छे स्वास्थ्य की देखभाल का प्रावधान, वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल, बुनियादी ढांचा सृजन और देश में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार पर ध्यान दिया गया है।’ लेकिन बजट भाषण में प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छ भारत मिशन जैसे प्रमुख योजनाओं के लिए आवंटन का कोई जिक्र नहीं है।
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रोजगार सृजन पर सरकार की रणनीति भी स्पष्ट नहीं है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की सबसे बड़ी योजना ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ (मनरेगा) पर भी सरकार की क्या सोच रही, यह बात भी सामने न आ पाई।
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देश की मूलभूत आवश्यकताओं िश्‍ाक्षा और स्वास्‍थ्य पर वित्त मंत्री ने कहा, ‘शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने में प्रौद्योगिकी सबसे बड़ी संचालक होगी। हम शिक्षा में डिजिटल तीव्रता को बढ़ाने और ‘ब्लैकबोर्ड’ से धीरे-धीरे ‘डिजिटल बोर्ड’ की ओर बढ़ने का प्रस्ताव करते हैं। लेकिन अपने देश में कई सारे इलाके ऐसे हैं, जहां स्कूल अपने भवन में नहीं चलते हैं। स्कूल में बिजली नहीं है। बुनियादी सुविधाओं से वंचित स्कूलों में डिजिटल ब्लैकबोर्ड तो बहुत दूर की बात है।

ज्यादातर माध्यमिक विद्यालयों का भी यही हाल है। उनकी स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है। माध्यमिक शिक्षा प्रबंधन सूचना प्रणाली (एसईएमआईएस) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015-16 में केवल 40 फीसदी माध्यमिक विद्यालयों में कंप्यूटर व इंटरनेट और 31 फीसदी में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) प्रयोगशालाएं थीं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना (एनएचपीएस), जिसे दुनिया के सबसे बड़े सरकारी वित्त पोषित स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम के रूप में उद्धृत किया गया है, उसे बढ़ावा मिला है।

अधिक-से-अधिक रोगियों वाले गरीब राज्यों में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मजबूत स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी एकमात्र व्यवस्था हो सकती है। लेकिन इस योजना पर बहस की जरूरत है। यदि इस योजना का दूरगामी प्रभाव देखना है, तो सावधानीपूर्वक लक्ष्यीकरण सुनिश्चित करने, जागरूकता और विनियमन बढ़ाने पर ध्यान देने की आवश्यकता होगी।

शिमला से मंत्रेश त्रिपाठी

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चिट्ठी 2- हर बात पर चुप रहना अच्छी बात नहीं होती!

उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में गणतंत्र दिवस के मौके पर जो कुछ हुआ, वह सद्भावना में यकीन रखने वाले लोगों को दुखी ही किया है। सिर्फ एक व्यक्ति की मौत होने की बात कहकर हम इस घटना को छोटा कहकर आंखें बंद नहीं कर सकते हैं। देश के नागारिक जब गणतंत्र दिवस मना रहे हों और खासकर आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस बार गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि हों, तब एक जिले में इस प्रकार की सांप्रदायिक झड़पें होना दुखद है। हालांकि, बाद में पुलिस ने घटना पर काबू पा लिया और कुछ उपद्रवी तत्वों को हिरासत में भी लिया, लेकिन इतना किया जाना ही काफी नहीं है। सरकार की जो जिम्मेदारी है, उसे सरकार देखे, लेकिन समाज की जो जिम्मेदारी है, उसे तो हम और आप ही देखेंगे न। हमें यह समझना होगा कि अगर इस तरह की घटनाओं को रोका नहीं गया या उसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो देश की छवि को खराब होते देर नहीं लगेगी। ‘पद्मावत' फिल्म के रिलीज होने पर कानून व्यवस्था की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। अब सवाल यह है कि हम इन घटनाओं को क्यों नहीं रोक पा रहे? वह सिर्फ इसलिए कि हम सब कुछ सरकार और समाज पर छोड़कर मूकदर्शक बने रहते हैं और गिनती के कुछ लोग उपद्रव फैलाते रहते हैं।

लखनऊ से चंद्रमोहन राजपूत
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