फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Literature ›   Out of the darkness, people are drinking the clean water

मंजिलें और भी हैं : अंधेरे से बाहर निकला गांव, लोग पी रहे हैं साफ पानी

Wed, 03 Jul 2019 06:53 AM IST
Avdhesh Kumar अश्विनी पाराशर
अश्विनी पाराशर Published by: Avdhesh Kumar Updated Wed, 03 Jul 2019 06:53 AM IST
विज्ञापन
Out of the darkness, people are drinking the clean water
अश्विनी पाराशर - फोटो : Amar Ujala
मैं राजस्थान के धौलपुर का रहने वाला हूं। मैंने जयपुर के सवाई मानसिंग मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई की है। राजघाट गांव मेरे शहर धौलपुर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है। मैं दीपावली की छुट्टियों में घर आया हुआ था। मैंने सोचा कि क्यों न इस बार की दीपावली गांव जाकर मनाई जाए। कुछ ऐसे लोगों के साथ खुशियां बांटी जाएं, जिन्हें सबकुछ उतनी आसानी से नहीं मिला, जैसे हमें मिला है। 
विज्ञापन


इसके बाद मैंने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर पैसे इकट्ठे किए, कुछ मिठाइयां, कपड़े, पटाखे और किताबें साथ लीं। इसके बाद राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर चंबल के बीहड़ में बसे गांव राजघाट जा पहुंचा। हमने जब साथ लाए पैकेट बांटना शुरू किया तो लोग लगभग छीना-झपटी करने लगे।
विज्ञापन


यहां आकर जो स्थिति देखी, वह कल्पना से परे थी। विकास की सैकड़ों योजनाएं होने के बावजूद यह गांव मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर था। लोग पीने के पानी के लिए चंबल नदी पर निर्भर थे, जिसमें अक्सर जानवरों और आदमियों की लाशें बहकर आती थीं और लोगों को उन्हें हटाकर पानी लेना पड़ता था। चूंकि राजघाट घड़ियाल अभयारण्य के इलाके में आता है, तो किनारे से दूर जाकर पानी भरने में घड़ियालों और मगरमच्छों का भी खतरा था। गांव के कई नौजवान मगरमच्छों का शिकार हो भी चुके थे।
विज्ञापन
विज्ञापन


इसके अलावा पढ़ाई की सुविधा के लिए राजघाट में महज एक कमरे और एक शिक्षक वाला प्राथमिक विद्यालय था। न ही स्वास्थ्य के लिए कोई सुविधा, न ही राशन की दुकान। पिछड़ेपन का आलम यह था कि गांव के ज्यादातर लोग शराब की लत के शिकार थे। गांव में 20 वर्षों में बस दो शादियां हुईं थीं, क्योंकि कोई भी सुविधाओं की कमी के चलते इस पिछड़े गांव में रिश्ता नहीं करना चाहता था। 
 

उसी दिन मैंने किसी भी कीमत पर इस गांव की स्थिति बदलने की ठान ली। मैंने जिले के प्रशासनिक अधिकारियों से मिलकर बात की, पर ये कोशिशें नाकाम रहीं। कोई कहता कि नगर परिषद के पास फंड नहीं है, तो कोई कहता ये गांव 'नो कंस्ट्रक्शन जोन' में आता है। मैंने वापस सवाल किया कि अगर ये नो कंस्ट्रक्शन जोन है, तो फिर स्कूल की बिल्डिंग कैसे बनाई। इसके बाद मैंने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर गांव का हाल बताया। जब प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब में मुख्य सचिव के नाम संदेश आया, तो बिलकुल फिल्मी सीन था। एक साथ कई सरकारी गाड़ियां गांव में जा पहुंची थीं। अब तक जो 
गांव वाले सोच रहे थे कि ये अकेला बच्चा क्या कर पाएगा, उन्हें अब मुझ पर भरोसा हो आया था। 

मुझे भी उम्मीद थी कि अब चीजें बदल जाएंगी, लेकिन मैं गलत था। इसके बाद मैंने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर सोशल मीडिया पर ‘राजघाट बचाओ’ अभियान शुरू किया। साथ ही हाई कोर्ट में गांव के हालात को सुधरवाने के लिए याचिका डाली। 

हाई कोर्ट का फैसला ग्रामीणों के पक्ष में आया। कोर्ट के आदेश के बाद गांव में विकास का काम शुरू हुआ। ‘राजघाट बचाओ’ अभियान को न सिर्फ अपने देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली। कई संस्थाओं की मदद से मैं गांव में वाटर-फिल्टर और कई घरों में सोलर पैनल लगवाने में कामयाब हो पाया। इसके बाद मिली मदद से इस गांव में ट्रांसफॉर्मर लगा, और सदियों बाद, इस गांव की रातें रोशन हुई और अब यहां बच्चे कभी भी पढ़ सकते हैं। 

मेरे प्रयासों के चलते गांव में अधिकांश लोगों ने शराब पीनी छोड़ दी है। ज्यादातर बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। मैं इस मुहिम को और आगे ले जाना चाहता हूं, ताकि राजस्थान के अन्य पिछड़े गांवों में भी काम किया जाए।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed