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अंतर्ध्वनि: शांति तन और मन, दोनों की होनी ही चाहिए, आखिर शांति ही तो चाहता हूं
Fri, 13 Sep 2019 04:03 AM IST
Nilesh Kumar
अमृतलाल नागर
अमृतलाल नागर
Published by: Nilesh Kumar
Updated Fri, 13 Sep 2019 04:03 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
स्वप्न कभी-कभी स्फूर्तिदायक होते हैं। समय-समय पर कागज पर अंकित, एकांत क्षणों में मेरे अच्छे और बुरे विचार मुझे अपने जीवन की समालोचना करने का अवसर देते हैं। मेरा अंतःकरण भी निष्पाप और निष्कलंक है। विश्व के इतिहास में बुद्धि का विकास, सामाजिक चेतना और एकात्मता का ज्ञान पहले कभी भी इस ऊंचाई पर नहीं पहुंचा था, जहां आज है। फिर भी इतिहास अपने पुराने ढर्रे पर ही करवट ले, यह तो कुछ समझ में नहीं आता। मगर समझ को तस्वीर का दूसरा रुख भी देखना पड़ता है।
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प्रस्तर युग से एटम युग तक मानवी कमजोरियां आज इकट्ठी होकर एक बड़ा ढेर और बड़ी शक्ति हो गई हैं। युग की समाप्ति के साथ जब तक ये नहीं जाएंगी-आगे का जमाना भी झूठी प्रगतिशीलता का ही जामा ओढ़कर आएगा। व्यक्तिगत स्वार्थ, व्यक्तिगत सत्ता की ससीमता अपनी सामाजिक असीमता को देखकर डर रही है।
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समाज की व्याख्या, धार्मिक समाज, सांप्रदायिक समाज, अमीर समाज, गरीब समाज, राजनीतिक समाज के दायरे में नहीं जा सकती-हरगिज नहीं। प्रांतीयता, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता की दीवारों में भी समाज नहीं बंध सकता। पुरानी चीजों को तोड़ना ही होगा। उनसे बचने का एकमात्र उपाय है कि इस अराजकता को सत्य और न्याय की बुद्धि के जबर्दस्त प्रहार से खत्म कर देना चाहिए। जिस दिन अपने साहित्य द्वारा मैं देश की सेवा कर सकूं-अपने को धन्य समझूंगा।
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सचमुच, मेरा उद्देश्य यही है कि मैं अपने साहित्य द्वारा हिंदी साहित्य और अपने देश की सेवा कर सकूं। बेकारी, झूठी प्रतिष्ठा, दलित वर्ग की करुण कहानी सीधी-सादी भाषा में पुरअसर तरीके से अपने देशवालों को सुनाता चलूं। हर आदमी प्रसिद्धि का भूखा होता है; पर मुझमें यह कमजोरी नहीं है। शांति तन और मन, दोनों की चाहिए। आखिर शांति ही तो चाहता हूं! फिर उसे अपनाने का प्रयत्न क्यों नहीं? यह शत्रु उतना बलवान नहीं, जितना दिखता है।
(दिवंगत हिंदी साहित्यकार)