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अंतर्ध्वनि : शिरीष के फूल फक्कड़ाना मस्ती से ही उपज सकते हैं
Thu, 06 Jun 2019 12:46 AM IST
Avdhesh Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Thu, 06 Jun 2019 12:46 AM IST
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हजारी प्रसाद द्विवेदी
- फोटो : Social Media
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जब उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है, एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भांति जीवन की अजेयता का मंत्रप्रचार करता रहता है। यद्यपि कवियों की भांति हर फूल-पत्ते को देखकर मुग्ध होने लायक हृदय विधाता ने मुझे नहीं दिया है, पर नितांत ठूंठ भी नहीं हूं। शिरीष के पुष्प मेरे मानस में थोड़ा हिल्लोल जरूर पैदा करते हैं। शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना।
जब धरती और आसमान जलते रहते हैं, तब भी वह हजरत न जाने कहां से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं।एक वनस्पतिशास्त्री ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है, जो वायुमंडल से अपना रस खींचता है। जरूर खींचता होगा। नहीं तो भयंकर लू के समय इतने कोमल तंतुजाल और ऐसे सुकुमार केसर को कैसे उगा सकता था? अवधूतों के मुंह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएं निकली है। कबीर बहुत कुछ इस शिरीष के समान ही थे, मस्त और बेपरवाह, पर सरस और मादक। कालिदास भी जरूर अनासक्त योगी रहे होंगे।
शिरीष के फूल फक्कड़ाना मस्ती से ही उपज सकते हैं और 'मेघदूत' का काव्य उसी प्रकार के अनासक्त अनाविल उन्मुक्त हृदय में उमड़ सकता है। जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है? मैं कहता हूं कि कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो। शिरीष की मस्ती की ओर देखो।
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लेकिन अनुभव ने मुझे बताया है कि कोई किसी की सुनता नहीं। शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भांति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है, जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं। शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिंदी के दिवंगत साहित्यकार
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जब धरती और आसमान जलते रहते हैं, तब भी वह हजरत न जाने कहां से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं।एक वनस्पतिशास्त्री ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है, जो वायुमंडल से अपना रस खींचता है। जरूर खींचता होगा। नहीं तो भयंकर लू के समय इतने कोमल तंतुजाल और ऐसे सुकुमार केसर को कैसे उगा सकता था? अवधूतों के मुंह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएं निकली है। कबीर बहुत कुछ इस शिरीष के समान ही थे, मस्त और बेपरवाह, पर सरस और मादक। कालिदास भी जरूर अनासक्त योगी रहे होंगे।
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शिरीष के फूल फक्कड़ाना मस्ती से ही उपज सकते हैं और 'मेघदूत' का काव्य उसी प्रकार के अनासक्त अनाविल उन्मुक्त हृदय में उमड़ सकता है। जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है? मैं कहता हूं कि कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो। शिरीष की मस्ती की ओर देखो।
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लेकिन अनुभव ने मुझे बताया है कि कोई किसी की सुनता नहीं। शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भांति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है, जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं। शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिंदी के दिवंगत साहित्यकार