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अंतर्ध्वनि : ईश्वर की मूर्ति प्रेम है, जिसका केवल अनुभव किया जा सकता है
Fri, 07 Jun 2019 01:30 AM IST
Avdhesh Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Fri, 07 Jun 2019 01:30 AM IST
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प्रतापनारायण मिश्र -दिवंगत हिंदी साहित्यकार
- फोटो : सोशल मीडिया
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वास्तव में ईश्वर की मूर्ति प्रेम है, पर वह अनिर्वचनीय, परमानंदमय होने के कारण लिखने वा कहने में नहीं आ सकता, केवल अनुभव का विषय है। अत: उसके वर्णन का अधिकार हमको क्या, किसी को भी नहीं है। कह सकते हैं तो इतना ही कह सकते हैं कि हृदय मंदिर को शुद्ध करके उसकी स्थापना के योग्य बनाइए और प्रेम दृष्टि से दर्शन कीजिए तो आप ही विदित हो जाएगा कि वह कैसी सुंदर और मनोहर मूर्ति है।
पर यह कार्य सहज एवं शीघ्र प्राप्य नहीं है। हमारे पूर्व पुरुषों ने ध्यान-धारण इत्यादि साधन नियत कर रखे हैं, जिनका अभ्यास करते रहने से उसके दर्शन में सहारा मिलता है। किंतु है यह भी बड़े ही भारी मस्तिष्कमानों का साध्य। साधारण लोगों से इसका होना भी कठिन है। विशेषत: जिन मतवादियों का मन भगवान के स्मरण में अभ्यस्त नहीं है, वे जब आंखें मूंद के बैठते हैं, तब अंधकार के अतिरिक्त कुछ नहीं देख सकते और उस समय यदि घर गृहस्थी आदि का ध्यान न भी करें, तो भी अपनी श्रेष्ठता और अन्य प्रथावलंबियों की तुच्छता का विचार करते होंगे। कारण इसका यह है कि मनुष्य का मन होता है चंचल।
वह जब तक किसी बहुत ही सुंदर व भयंकर वस्तु अथवा व्यक्ति वा सुख-द़ुखादि की ओर न चला जाए, तब तक एकाग्र कदापि नहीं होता। हां, बड़े-बड़े योगी अभ्यास करते-करते उसे स्वेच्छानुवर्ती बना सकते होंगे, पर अपने सहवर्तियों में तो हम किसी का सामर्थ्य नहीं देखते कि संगीत, साहित्य, सुरा, सौंदर्य इत्यादि की सहायता के बिना कोई मन को एक ओर कर सकता हो। पूजा का अर्थ है सत्कार, और सत्कार उसका किया जाता है जिसे देख सुनके चित्त में प्रेम और प्रसन्नता आवै। अपने पूर्वपुरुषों के साधारण चिह्न के प्रति भी हमें स्वभावत: ममत्व होना चाहिए, यदि हम उनकी संतान हैं।
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प्रतापनारायण मिश्र -दिवंगत हिंदी साहित्यकार
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पर यह कार्य सहज एवं शीघ्र प्राप्य नहीं है। हमारे पूर्व पुरुषों ने ध्यान-धारण इत्यादि साधन नियत कर रखे हैं, जिनका अभ्यास करते रहने से उसके दर्शन में सहारा मिलता है। किंतु है यह भी बड़े ही भारी मस्तिष्कमानों का साध्य। साधारण लोगों से इसका होना भी कठिन है। विशेषत: जिन मतवादियों का मन भगवान के स्मरण में अभ्यस्त नहीं है, वे जब आंखें मूंद के बैठते हैं, तब अंधकार के अतिरिक्त कुछ नहीं देख सकते और उस समय यदि घर गृहस्थी आदि का ध्यान न भी करें, तो भी अपनी श्रेष्ठता और अन्य प्रथावलंबियों की तुच्छता का विचार करते होंगे। कारण इसका यह है कि मनुष्य का मन होता है चंचल।
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वह जब तक किसी बहुत ही सुंदर व भयंकर वस्तु अथवा व्यक्ति वा सुख-द़ुखादि की ओर न चला जाए, तब तक एकाग्र कदापि नहीं होता। हां, बड़े-बड़े योगी अभ्यास करते-करते उसे स्वेच्छानुवर्ती बना सकते होंगे, पर अपने सहवर्तियों में तो हम किसी का सामर्थ्य नहीं देखते कि संगीत, साहित्य, सुरा, सौंदर्य इत्यादि की सहायता के बिना कोई मन को एक ओर कर सकता हो। पूजा का अर्थ है सत्कार, और सत्कार उसका किया जाता है जिसे देख सुनके चित्त में प्रेम और प्रसन्नता आवै। अपने पूर्वपुरुषों के साधारण चिह्न के प्रति भी हमें स्वभावत: ममत्व होना चाहिए, यदि हम उनकी संतान हैं।
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प्रतापनारायण मिश्र -दिवंगत हिंदी साहित्यकार