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अंतर्ध्वनि : भारतीय परंपरा में मनुष्य की आत्मचेतना ही उसका स्वधर्म है

Fri, 14 Jun 2019 12:47 AM IST
Avdhesh Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Avdhesh Kumar Updated Fri, 14 Jun 2019 12:47 AM IST
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Interpolation: In Indian tradition, man's self-consciousness is his religion
Nirmal Verma
मनुष्य का 'मनुष्यत्व' क्या है, यह सिर्फ एक दार्शनिक प्रश्न नहीं रहता, बल्कि उन मूल प्रेरक-शक्तियों की ओर संकेत करता है, जो किसी महाकाव्य के नायकों-इलियड में अगमिमनॉन, महाभारत में अर्जुन, वाल्मीकि रामायण में राम के निर्णयों को संचालित करती है। इन कृतियों में मनुष्य की छवि कैसी उभरकर आती है, यह इस पर निर्भर करता है कि मनुष्य अपने 'आत्म' को केवल दूसरे मनुष्यों से नहीं, बल्कि बाहरी शक्तियों से कैसे जोड़ पाता है...! भारतीय परंपरा में मनुष्य का 'आत्म' उसके अहं (इगो) की तुलना में बहुत बृहत्तर है, जो अपने को जीव-जगत की समस्त सत्ताओं से अंतर्संबंधित पाता है। 
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हर व्यक्ति, अच्छा हो या बुरा, उच्च जाति का हो या निम्न जाति का, राजा हो या प्रजा का साधारण सदस्य-दायित्वों की पूरी शृंखला में बंधा है। वह उस तरह से निजी संकल्प का वाहक नहीं है, जैसे यूरोपीय परंपरा में 'व्यक्ति' की अवधारणा है - अपेक्षाकृत स्वायत्त प्राणी, जो दूसरों के बीच रहता हुआ भी अपना निज सुरक्षित रखता है...एक अहंकेंद्रित जीवात्मा, जो दूसरों से संबंधित होती हुई भी अपने को कहीं बहुत अधूरी और अरक्षित पाती है। पूर्वी संस्कृतियों में मनुष्य को यदि पृथ्वी और प्रकृति की जीव-सत्ताओं से 'ऊपर' माना गया, तो वह उसकी स्व-चेतना के आधार पर, जो उसे समूची सृष्टि में एक विशिष्ट दर्जा देती है। मनुष्य की आत्म-चेतना ही उसका स्वधर्म बन जाती है, ताकि वह प्राकृतिक जगत की चर-अचर सत्ताओं के प्रति अपना दायित्व संपन्न कर सके। 
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पश्चिमी परंपरा में 'संस्कृति' का आविर्भाव ही 'आदिम' शक्तियों को अपदस्थ करने में होता है। प्रकृति की बीहड़ अराजकता और मनुष्य के भीतर दबी आदिम प्रवृत्तियों के बीच अद्भुत समानता दिखाई देती है। प्रकृति उपभोग की वस्तु न होकर एक आंतरिक पवित्रता प्राप्त कर लेती है, जो भारतीय काव्य-परंपरा का प्रमुख लक्षण है। - निर्मल वर्मा -दिवंगत हिंदी साहित्यकार
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