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झीनी-झीनी बीनी चदरिया

Sun, 06 Mar 2016 06:53 PM IST
देव प्रकाश
देव प्रकाश Updated Sun, 06 Mar 2016 06:53 PM IST
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classical music story
करघे का संगीत हो या साज से उपजा सुर, चंदेरी ध्रुपद में ही सांस लेता है। इसे बैजु बावरा की परंपरा का विस्तार कह लें या विरासत को सहेजने की कोशिश, इस शहर में ध्रुपद जैसी कठिन विधा पर बात करने वाले आपको बड़ी आसानी से मिल जाएंगे। यह बात अलग है कि ध्रुपद व्याकरण की कसौटी पर बातचीत में असहमति का सुर निकल आए, फिर भी इस बात पर चंदेरी को गर्व होना ही चाहिए कि बैजु बावरा की याद को संभालते और सहेजते हुए संगीत की एक सुखद यात्रा दशकों से जारी है।
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इसी यात्रा के एक पड़ाव में गुंदेजा बंधु यानी मशहूर ध्रुपद गायक रमाकन्त गुंदेजा और उमाकांत गुंदेजा का गायन था, जो बैजु बावरा की पुण्य तिथि (13 फरवरी) के अवसर पर आयोजित हुआ था। करीब एक घंटा तक चले गायन में गुंदेजा बंधुओं ने ′कुंजन ने रचयो रास...′ के अलावा निराला और कबीर को गाया। इस अवसर पर प्रथम बैजु बावरा स्मृति सम्मान भी गुंदेजा बंधुओं को दिया गया। कार्यक्रम श्री अचलेश्वर महादेव मंदिर फांउडेशन की ओर से आयोजित था और इस दौरान ध्रुपद सुनते हुए, बैजु बावरा को याद करते हुए कुछ कलाकारों ने पेंटिंग भी बनाई।
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इस मौके पर गुंदेजा बंधुओं की किताब ′सुनता है गुरु ज्ञानी′ का विमोचन भी हुआ। इससे पहले दोपहर में ‘विरासत का अर्थ’ नाम से आयोजित एक व्याख्यान में शास्त्रीय गायक रमाकांत गुंदेजा और उमाकांत गुंदेजा, मशहूर कलाविद अशोक वाजपेयी और सुपरिचित संगीत समीक्षक मंजरी सिन्हा ने अपनी-अपनी बात कही। गुंदेजा बंधुओं ने इस बात पर जोर दिया कि परंपरा और विरासत को सही अर्थ में समझने की जरूरत है...क्योंकि घराने का गायक अगर अपने से पहली पीढ़ी के गायक को गाता है, तो वह परंपरा और बाहर का कोई व्यक्ति गाए तो नकल...ऐसा क्यों?
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बातचीत को आगे बढ़ाते हुए कलाविद अशोक वाजपेयी ने कहा कि हम अपनी विरासत को तब तक नहीं समझ सकते और संभाल सकते जब तक कि हम प्रश्न करने को अपनी आदत का एक हिस्सा न मान लें...क्योंकि प्रश्न करना आखिरकार उत्तरदायित्व की भावना का एक रूप है। इसके बाद संगीत समीक्षक मंजरी सिन्हा ने विरासत की बात को आगे बढ़ाया। शाम में बैजु बावरा की समाधि पर दीप जलाने के बाद गुंदेजा बंधओंु ने अपना गायन शुरू किया था। इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने के बाद इतना तो कहा ही जा सकता है कि बुनकरों के इस ऐतिहासिक शहर को उनके ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ की याद लंबे समय तक रहेगी।
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