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चीन का चाऊमिन, हमारा चाऊमिन

Sun, 06 Nov 2016 01:03 PM IST
अर्धेंदु सेन/ अमर उजाला
अर्धेंदु सेन/ अमर उजाला Updated Sun, 06 Nov 2016 01:03 PM IST
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China chaumin, our Chaumin
- फोटो : social media

अभी-अभी चीन से लौटकर आया हूं। हमारे देश के बच्चे-बूढ़े-औरतें जब चीनी उत्पादों के बहिष्कार में व्यस्त हैं, तब चीन की यात्रा क्यों? यह सवाल मुझसे पूछे जाने पर मैं भी करन जौहर की तरह कह सकता हूं कि मैंने जब चीन का टिकट खरीदा था, तब दो देशों के रिश्ते में इतनी खटास नहीं आई थी। बिना किसी दुविधा के कह सकता हूं कि मैं अब कभी चीन नहीं जाऊंगा, अपने पैसे से तो नहीं ही। चीन की यात्रा करते हुए मेरे मन में दुविधा नहीं रही हो, यह नहीं कह सकता। लेकिन चीन से लौटकर जब मैंने देखा कि कालीपूजा में चीनी पटाखों की बिक्री में कोई कमी नहीं आई है, तब मुझे महसूस हुआ कि चीन जाकर मैंने कोई गलती नहीं की।

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हमारी प्रतिबद्धताओं में थोड़ी-बहुत बेईमानी रहती ही है। राज ठाकरे को लगने लगा था कि देश के लोग देश से नए तरीके से प्रेम करने लगे हैं। एक बार कहने की देर है, वे पाक अभिनेता-अभिनेत्रियों का बिना किसी दुविधा के बहिष्कार करने लगेंगे। लेकिन नहीं। यह भारतवर्ष है। उनकी योजना पूरी तरह परवान नहीं चढ़ पाई। तब ठाकरे और उनके लोग सिनेमा हॉलों में तोड़-फोड़ के काम में उतरे। हमारे देश के विद्वान द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर थीसिस जमा करने के लिए सिर पर दही का टीका लगाकर जाते हैं। हमारे वैज्ञानिक भगवान में यकीन करते हैं, हम भी करते हैं। लेकिन हम सरस्वती पूजा के लिए इकट्ठा किए गए चंदे से सिगरेट पीते हुए संकोच नहीं करते। इसलिए बहिष्कार करते हुए भी हम बहिष्कार नहीं करते।
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पर ध्यान दीजिए, समस्या सिर्फ पाकिस्तान नहीं है, उसके साथ चीन भी है। भारत ने पाक आतंकी सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दबाव बनाया था। लेकिन चीन ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसी कारण चीन के सामान की बहिष्कार की मांग उठी। चूंकि यह सारा माहौल दिवाली से पहले बना था, इसलिए सोचा गया, क्यों न चीनी पटाखों का बहिष्कार हो। चीन की पूरी अर्थव्यवस्था ही निर्यात निर्भर है। क्या इससे वह नहीं डरेगा?
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चीन में प्रतिव्यक्ति आय हमसे दोगुनी है। उसी अनुपात में उसका खर्च भी है। विलासिता के चिह्न वहां के शहरों में ही नहीं, गांवों में भी खूब देखने को मिले। बीजिंग का विस्तीर्ण इलाका और पूरा शंघाई शहर न्यूयॉर्क के मैनहटन की तरह दिखता है। इन दोनों जगहों पर हर घर पूरी रात रोशनी में नहाया रहता है। पेरिस समझौते पर दोनों ही देशों ने दस्तखत किए हैं, लेकिन ऊर्जा की फिजूलखर्ची किसी ने बंद नहीं की। लेकिन चीन में प्रदूषण इतना ज्यादा है कि बगैर रोशनी के शायद कुछ दिखाई ही न दे।

बीजिंग और शंघाई में बीच-बीच में गरीबों के घर भी दिखते हैं। टूरिस्ट गाइड से पूछने पर पता चला कि गरीबी एक बड़ी समस्या है। उदाहरण के लिए, किसी का बेटा बीमार है, लेकिन इलाज के पैसे नहीं हैं। कोई बूढ़ा इसलिए चिंतित है कि उसके पास जमा पूंजी नहीं है। कुछ जगहों पर हमें जेबकतरों से सावधान रहने के लिए भी कहा गया। कुछ समय तक साम्यवाद के रास्ते पर चलने के बाद चीन ने दूसरी राह पकड़ ली है। यह अलग बात है कि थ्येनआनमन चौक पर माओ त्से तुंग की एक बड़ी तस्वीर अभी तक टंगी है।

शंघाई शहर की आबादी दो करोड़ चालीस लाख है। ऑफिस टाइम में यह बढ़कर करीब तीन करोड़ हो जाती है। इकतालीस रूटों पर ट्रेन चलती है, जबकि बस रूटों की संख्या एक हजार से अधिक है। परिवहन के इतने विशाल नेटवर्क को संभालना कोई आसान काम नहीं है। परिवहन के मोर्चे पर पिछड़ा भारत इस मामले में चीन से बहुत कुछ सीख सकता है। शहरों को साफ-सुथरा रखने में उनकी कोशिशों का भी कोई जवाब नहीं है। बेशक वे हमेशा सफल नहीं होते, लेकिन इसमें क्या शक कि वे मेहनत करते हैं। बीजिंग की कुछ पुरानी बस्तियों में अब भी एक कमरे में एक परिवार रहता है। वहां पांच-छह परिवारों के लिए कॉमन बाथरूम हैं। पर उन बस्तियों की छोटी-छोटी गलियों को भी साफ-सुथरा रखने में वे सफल हैं।

लेकिन चीन की यात्रा में क्या लूं, क्या न लूं, इस बारे में ठोस निर्णय करना आसान काम नहीं है। इस नाजुक समय में चीनी सामान खरीदकर भारत लौटने के अपने खतरे हैं। पर चीनी सामान का बहिष्कार करने या भारत-चीन दोस्ती की पहल करने के बारे में मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता, क्योंकि वह मेरा काम नहीं है। हां, एक बात जरूर कह सकता हूं। मैंने सुना था कि चीन जाने वाले भारतीयों को वहां के चिकन चिली या चाऊमिन में वह स्वाद नहीं आता, जो भारत में आता है। चीन जाकर मुझे इसकी सच्चाई पता चली। बहुत ढूंढने पर भी मुझे चीन में हमारे यहां के चाऊमिन और चिकन चिली के दर्शन नहीं हुए। जाहिर है कि ये दोनों डिश हमारे अपने हैं, चीन के साथ सिर्फ इनका नाम जुड़ा है। इसलिए चीनी सामान के विरोध के इस समय में मेरा यह विनम्र सुझाव है कि चाऊमिन खाना नहीं छोड़ना चाहिए।

                                                                                                    
पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य सचिव और फिलहाल यादवपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर

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