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अंतर्ध्वनि : लिखने और तितलियां पकड़ने से बड़ा मेरे लिए कोई सुख नहीं
Thu, 25 Jul 2019 10:05 PM IST
अमर शर्मा
व्लादीमिर नबोकोव
व्लादीमिर नबोकोव
Published by: अमर शर्मा
Updated Thu, 25 Jul 2019 10:05 PM IST
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तितली
मेरा कभी किसी साहित्यिक गुट से कोई ताल्लुक नहीं रहा। किसी स्वीकृत मत या समूह का मेरे ऊपर कभी कोई प्रभाव नहीं रहा। राजनीतिक उपन्यास और समाज कल्याण के उद्देश्य से लिखे गए साहित्य से ज्यादा ऊब मुझे किसी चीज से नहीं होती। एक कलात्मक कृति का समाज के लिए कोई महत्व नहीं है। यह सिर्फ उस शख्स के लिए महत्व रखती है, जो इसके संपर्क में आता है और मेरे लिए भी वही शख्स महत्वपूर्ण है। मुझे नहीं लगता कि एक कलाकार को अपने चाहनेवालों के लिए व्याकुल होना चाहिए। उसका सबसे बड़ा चहेता तो वह शख्स है, जो हर सुबह उससे हजामत बनाते हुए आईने में मिलता है। मुझे मूर्खता, दमन, अपराध, क्रूरता और सुगम संगीत पसंद नहीं। लिखने और तितलियां पकड़ने से बड़ा मेरे लिए कोई सुख नहीं। तुम किसी चीज के बारे में ज्यादा से ज्यादा जान सकते हो, लेकिन उसके बारे में सबकुछ नहीं जान सकते : सबकुछ जान लेने की इच्छा ही हताश करती है।
तुम जितना किसी 'स्मृति' को प्यार करोगे, वह अपने तईं तुम्हें उतनी ही पुरअसर और अजनबी मालूम पड़ेगी। मैं विज्ञानी जुनून और काव्यात्मक धैर्य का
मुरीद हूं। एक कलात्मक कृति में कविता की क्षिप्रता और विज्ञान की उत्तेजना, दोनों का विलय हो जाता है। केवल टुच्चे, महत्वाकांक्षी और मीडियोकर अपने अधलिखे की नुमाइश करते हैं। यह किसी को बलगम के नमूने दिखाने जैसा है। मेरे लिए लेखन हमेशा उदासी और उत्साह, यंत्रणा और मनबहलाव जैसी मिली-जुली मनोदशा में मुमकिन होता रहा। एक लेखक को दूसरे लेखकों के काम को, यहां तक कि ऊपर बिराजे खुदा की इबारत को भी ध्यान से पढ़ना चाहिए। तुम किसी लेखक की कृति दिल से नहीं पढ़ते और न अकेले दिमाग से ही, इसके लिए दिमाग और एक तनी हुई रीढ़ की दरकार है।
-रूस के चर्चित अंग्रेजी लेखक
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तुम जितना किसी 'स्मृति' को प्यार करोगे, वह अपने तईं तुम्हें उतनी ही पुरअसर और अजनबी मालूम पड़ेगी। मैं विज्ञानी जुनून और काव्यात्मक धैर्य का
मुरीद हूं। एक कलात्मक कृति में कविता की क्षिप्रता और विज्ञान की उत्तेजना, दोनों का विलय हो जाता है। केवल टुच्चे, महत्वाकांक्षी और मीडियोकर अपने अधलिखे की नुमाइश करते हैं। यह किसी को बलगम के नमूने दिखाने जैसा है। मेरे लिए लेखन हमेशा उदासी और उत्साह, यंत्रणा और मनबहलाव जैसी मिली-जुली मनोदशा में मुमकिन होता रहा। एक लेखक को दूसरे लेखकों के काम को, यहां तक कि ऊपर बिराजे खुदा की इबारत को भी ध्यान से पढ़ना चाहिए। तुम किसी लेखक की कृति दिल से नहीं पढ़ते और न अकेले दिमाग से ही, इसके लिए दिमाग और एक तनी हुई रीढ़ की दरकार है।
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-रूस के चर्चित अंग्रेजी लेखक