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अंतर्ध्वनि : बचपन से ही मुझे चिड़ियों, सीपियों और जंगलों से प्रेम रहा है
Mon, 01 Jul 2019 06:35 AM IST
Gaurav Pandey
पाब्लो नेरुदा
पाब्लो नेरुदा
Published by: Gaurav Pandey
Updated Mon, 01 Jul 2019 06:35 AM IST
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पाब्लो नेरूदा
- फोटो : सोशल मीडिया
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अपने बचपन से ही मुझे चिड़ियों, सीपियों, जंगलों और पेड़-पौधों से प्रेम रहा है। समुद्री सीपियों की खोज में मैं कई जगह गया और उनका एक बड़ा संग्रह मेरे पास है। मैंने ‘पक्षियों की कला’ नाम से एक पुस्तक लिखी है। मैंने ‘बेस्तिअरी’, ‘सी-क्वेक’ और ‘रोज ऑफ एवालरियो’ भी लिखी हैं, जो कि फूलों, शाखाओं और वानस्पतिक विकास के संबंध में है।
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मैं प्रकृति से अलग होकर रह नहीं सकता। होटलों में कुछ दिन गुजार सकता हूं और एकाध घंटे के लिए हवाई जहाज में रहना भी अच्छा लगता है, लेकिन प्रसन्नता मुझे जंगलों में, रेत पर या नाव खेते हुए ही मिलती है, जहां कहीं आग, धरती, पानी और हवा से सीधा संपर्क हो सके। मेरे लिए समुद्र, मछली और चिड़ियों का एक भौतिक अस्तित्व है। मैं उनका उल्लेख उसी तरह करता हूं, जैसे धूप का करता हूं।
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जो दौर मेरी जिंदगी में आए हैं, वे मेरी कविता में भी आए हैं: एकाकी बचपन और दूरदराज सबसे कटे हुए देशों में बीती किशोरावस्था से मैंने एक विराट मानव समूह में शरीक होने तक की यात्रा है। इससे मुझे पूर्णता हासिल हुई। मैंने अपनी जिंदगी जनता के कल्याण के लिए समर्पित की है और मेरे घर में जो कुछ है–यानी किताबें–वह मेरे अपने अस्तित्व का नतीजा है।
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जिस तरह के उलाहने मुझे मिलते हैं, वैसे उन लेखकों को नहीं मिलते, अमीरी जिनका जन्मसिद्ध अधिकार है। कला की तरह जिंदगी में भी आप हरेक को खुश नहीं रख सकते, और यह एक ऐसी स्थिति है, जो हमेशा बनी रहती है। आपको हमेशा चुंबन और चांटे मिल रहे हैं, दुलार और दुलत्तियां मिल रही हैं, और यही एक कवि की जिंदगी है। जिस बात से मुझे परेशानी होती है, वह है: आपकी कविता या जिंदगी की घटनाओं की तोड़-मरोड़कर की गई व्याख्या।
-चिली के मशहूर नोबेल पुरस्कार विजेता कवि