{"_id":"58248bea4f1c1ba16fb39712","slug":"an-issue-of-untouchable","type":"story","status":"publish","title_hn":"एक और अछूत अंक की ओर!","category":{"title":"Literature","title_hn":"साहित्य ","slug":"literature"}}
एक और अछूत अंक की ओर!
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
Updated Thu, 10 Nov 2016 08:32 PM IST
विज्ञापन
हिंदी साहित्य
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ऐसे समय में जब दलित उत्पीड़न की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। दलित समुदाय अपने शोषण के खिलाफ एकजुट हो रहा है। लेखिका चारु गुप्ता की किताब 'द जेंडर ऑफ कास्ट' पाठकों को जातियों के इतिहास पर पुनर्विचार करने के लिए आमंत्रित करती है। इस किताब के माध्यम से दलितों की स्थिति, उनसे जुड़े तमाम मुद्दों और इतिहास में उनके योगदान को बेबाकी से दर्ज किया गया है। जानकारी के अभाव में जो इतिहास एक गलतफहमी की तरह हमारे दिमाग में दर्ज है, उसकी परतें भी इस किताब में खुलती नजर आती हैं।
विज्ञापन
किताब की शुरुआत मई, 1927 में उत्तर भारत से प्रकाशित हिंदी पत्रिका के विशेष 'अछूत अंक' के एक उदाहरण से होती है। इसमें अत्यधिक गरीबी से जूझ रही दो बहनों की भयावह स्थिति के माध्यम से महिलाओं की दयनीय दशा और धर्मांतरण होने के पीछे के कारणों पर प्रकाश डाला गया है। गरीबी और शोषण से त्रस्त यौन उत्पीड़कों के अधीन रहने को मजबूर इन दो बहनों के माध्यम से दलित शोषण की मूक पीड़ा को शब्द दिए गए हैं।
विज्ञापन
वहीं भारत में इस्लाम और ईसाई पंथ की वृद्धि के कारण के मूल में दलित शोषण को एक अहम कारण के तौर पर दर्शाया गया है। इसके बाद होने वाले धर्मांतरण को दलित उत्पीड़न से आजादी, शिक्षा और समाज में सम्मान के साथ बराबरी का दर्जा पाने जैसी उनकी बेहतरी के लिए उठे कदम के तौर पर देखा गया है। लेखिका ने इस किताब में दलित शोषण से जुड़ी घटनाओं, विरोध-प्रदर्शनों को शामिल कर शबरी, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और रोहित वेमुला के उदाहरण देकर इसे आज के संदर्भ से जोड़ दिया है। किताब का ज्यादातर हिस्सा उत्तर प्रदेश के दलित वर्ग पर केंद्रित है।
विज्ञापन
इसमें 'दलित' शब्द को निम्न जाति के पुरुष और महिलाओं को सम्मानजनक तौर पर संबोधित करने के रूप में देखा गया है। साथ ही करीब डेढ़ सौ साल के दलित इतिहास व पत्र-पत्रिकाओं में दर्ज लेखों और इतिहास के उद्धरणों के माध्यम से दलितों की दशा व पीड़ा पर गहरी अन्तर्दृष्टि डाली गई है। कुल मिलाकर यह किताब एक बार फिर नये सिरे से विचार विमर्श की जरूरत को दर्शाती है। वहीं समय-समय पर इस समुदाय की दशा में आए बदलाव और स्थिति की तरफ भी ध्यानाकर्षित करती है।