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अपनी भाषा में मिले मौलिक शिक्षा

Thu, 28 Apr 2016 07:11 PM IST
विनय कुमार पाठक
विनय कुमार पाठक Updated Thu, 28 Apr 2016 07:11 PM IST
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Fundamental education must be in own languages
विनय कुमार पाठक

अगर हम देश में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा के पूरे परिदृश्य को देखें, तो आज हम बहुत कम नई तकनीक विकसित कर पा रहे हैं। जबकि हमारा देश ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में बहुत पहले से ही आगे रहा है। पर जब ग्रामीण अंचल के अधिकांश छात्र, खासकर लड़कियां विज्ञान की शिक्षा से दूर हों, तो एक विरोधाभास भी नजर आता है। प्रतिभाशाली ग्रामीण छात्रों से गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा अब भी दूर है। हमारे पास ऐसा तंत्र नहीं, जो उन तक बेहतर शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित कर सके। फंडामेंटल साइंस में रिसर्च कम हो रहे हैं और जो फंडामेंटल तकनीकें हैं, वे भी कम हो रही हैं। छात्रों को जो पढ़ाया जा रहा है, वह ज्ञान और रचनात्मकता की दृष्टि से काफी कम है। फंडामेंटल साइंस और तकनीक की शिक्षा को प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों को बेहतर ढंग से पढ़ाना चाहिए।

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हमारी स्कूली शिक्षा में रटने को महत्व दिया जाता है, समझने का महत्व कम है, रचनात्मकता की जगह तो और भी कम है। हम बच्चों की नींव बेहतर नहीं बना पा रहे, जिस कारण 12वीं पास करने के बाद वे कोचिंग की तरफ भागते हैं। कोचिंग के बिना छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षा पास करना कठिन है। एसोचैम के मुताबिक, देश में कोचिंग इंडस्ट्री का वार्षिक राजस्व एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और यह 35 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रहा है। इस तरह की परिस्थितियां हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्‍था को कठघरे में खड़ा कर रही हैं। स्थिति यह है कि प्राथमिक शिक्षा माध्यमिक से मेल नहीं खाती और माध्यमिक शिक्षा उच्च शिक्षा से मेल नहीं खाती। मेरा मानना है कि शिक्षा के तीन स्तर होने चाहिए-पहली से पांचवीं, छठी से दसवीं और ग्यारहवीं से पंद्रहवीं। इन तीनों स्तरों पर हमें शिक्षा के साथ कौशल को जोड़ना चाहिए।
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पढ़ाई मुख्यतः विश्लेषणात्मक और रचनात्मक, दो स्तरों पर केंद्रित होती है। एक तरफ विश्लेषणात्मक पहलू पर जोर दिया जाता है, तो दूसरी ओर कुछ सृजन करने को महत्व दिया जाता है। आज हमारे विश्वविद्यालयों या फिर आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्‍थानों की पढ़ाई प्रोडक्ट ओरिएंटेड न होकर पेपर ओरिएंटेड रह गई है। हमें पेपर ओरिएंटेशन से प्रोडक्ट ओरिएंटेशन की तरफ जाना चाहिए। अंग्रेजों से मिली शिक्षा पद्धति की विरासत का पीछा करते हुए हमने मौलिकता को काफी पीछे छोड़ दिया है। दूसरी ओर, हमारे जो प्रतिष्ठित शिक्षण संस्‍थान हैं, उन जैसे दूसरे मॉडल हम खड़े नहीं कर पा रहे। इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या बढ़ रही है, पर वे बहुत अच्छे नहीं चल रहे, विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी, तो उनकी गुणवत्ता कम हो गई। हम डिग्रियां तो बांट रहे हैं, पर उनसे रोजगार नहीं मिलता। हम कुंठाग्रस्त पीढ़ियां तैयार कर रहे हैं। इस तंत्र में पढ़े-लिखे लोग कठिन मेहनत नहीं करना चाहते। सबको वातानुकूलित कमरे में बैठकर काम करने वाला रोजगार चाहिए, जो संभव नहीं है।
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इस देश के शिक्षण संस्‍थान हर साल हजारों युवाओं को प्रशिक्षित करते हैं। फिर भी कॉरपोरेट जगत की शिकायत रहती है कि उन्हें नौकरी देने के लिए जरूरी कौशल एवं प्रतिभा नहीं मिल पाती। कुछ समय पूर्व आई 'अस्पाइरिंग माइंड्स नेशनल एम्प्लॉइअबिलिटी रिपोर्ट' में अस्सी प्रतिशत इंजीनियरिंग ग्रेजुएटों को रोजगार के लिए अयोग्य बताया गया था। अपने छात्रों को हमें उन्नत शिक्षण एवं प्रशिक्षण मुहैया कराने की जरूरत है। हमारे यहां हर साल करीब चार लाख इंजीनियर निकलते हैं। इनमें से लगभग डेढ़ लाख को ही नौकरी मिल पाती है। बड़ी संख्या में खुल रहे इंजीनियरिंग संस्‍थान छात्रों को इंजीनियर बनने का सपना दिखाते हैं और अंततः उन्हें संघर्ष करने के लिए छोड़ देते हैं। मांग और आपूर्ति में काफी अंतर है। बाजार में उतनी मांग नहीं है, जितने इंजीनियर हर साल निकल रहे हैं। दूसरी ओर, बहुत तेजी से संस्‍थान खुल और बंद हो रहे हैं, उनके पास कोई बुनियादी ढांचा नहीं होता, न ही छात्रों को उचित प्रशिक्षण मिल पाता है। इस तरह की चीजों का नियमन जरूरी है, ताकि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ न हो सके। छात्रों को भी समझना होगा कि यदि आप गलत संस्थान में दाखिला लेंगे, तो उससे आपका भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? हमें निजी विश्वविद्यालयों को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है। हमारी चिंता तो उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता को लेकर होनी चाहिए।


छात्रों को खुद से भी यह सवाल पूछना चाहिए कि उन्होंने जो डिग्री ली है, क्या समाज और इंडस्ट्री उसे स्वीकार कर रहे हैं। आज भी हम रोजगारपरक शिक्षा से काफी दूर हैं। हमारा पाठ्यक्रम बहुत पुराना है। छात्रों को आज के वक्त के मुताबिक तैयार करना है, तो उन्हें अपनी भाषा में शिक्षा देनी होगी। प्रबंधन, इंजीनियरिंग, मेडिकल या फिर कानून की शिक्षा को हमें अपनी भाषा में विकसित करने की जरूरत है। आम आदमी को विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिकी से जोड़ना है, तो रचनात्कता को भाषा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। यदि एक व्यक्ति को कोई एक खास भाषा नहीं आती अथवा परीक्षा में उसके ज्यादा अंक नहीं आए, तो क्या वह रचनात्मक नहीं हो सकता? हमें जिस बौद्धक स्तर के लोग मिलते हैं, हमें उनका ही स्तर सुधारना है। आम तौर पर अंकों के प्रतिशत को छात्रों के बौद्धिक स्तर और रचनात्मकता का पैमाना माना जाता है, जो ठीक नहीं। यह सोच गलत है कि 12वीं में कम अंक लाने वाले छात्रों में रचनात्मकता नहीं होती। क्षमता सबमें होती है। समस्या यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था रचनात्मक लोगों की मदद नहीं करती। शिक्षा में रोजगार प्राप्त करने योग्य मानव संसाधन तैयार करना, आधुनिक तकनीक तथा शोध को बढ़ावा देना तथा तकनीक की मदद से सामाजिक समस्याओं के हल तलाशने का मकसद निहित होना चाहिए। शिक्षा में कौशल के अलावा मूल्य भी बेहद जरूरी हैं।

-डॉ. अब्दुल कलाम आजाद प्राविधिक विवि, लखनऊ के कुलपति

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